आशा भगोती का व्रत, विधि, कहानी (Asha Bhagoti Ka Vrat Vidhi Kahani) – आशा भगोती का व्रत श्राद्ध |पितृ पक्ष की अष्टमी से प्रारम्भ होकर आठ दिनों तक चलता है।

आशा भगोती व्रत की जानकारी (Asha Bhagoti Vrat Ki Jankari)
| 01 | आशा भगोती व्रत (Asha Bhagoti Vrat) कब शुरू होता है? | आशा भगोती व्रत श्राद्ध में अष्टमी तिथि से शुरू होता है। |
| 02 | अन्य नाम | aas mata ki kahani, asha bhagwati ki kahani, asha devi ki katha, asha poonam ki katha, आशा चौथ की कहानी, आस माता की कहानी, आशा माता की कहानी, |
| 03 | यह व्रत कितने दिन चलता है? | 8 दिन। |
| 04 | aas mata vrat date 2019 | 22 सितंबर 2019 अष्टमी तिथि से प्रारम्भ। |
| 05 | आशा भगोती व्रत की सामग्री | दूध, 8 रुपये, 8 रोली की छींटे, 8 मेहंदी के छींटे, 8 काजल की टिकिया और एक एक सुहाली |
आशा भगोती व्रत विधि (Asha Bhagoti Vrat Kaise karein)
आशा भगोती व्रत के दिन गोबर से आठ कोने रसोई के पोतें, आशा भगोती की कहानी (Asha Bhagoti Ki Kahani) सुनकर आठों कोनों पर दूध, 8 रुपये, 8 रोली की छींटे, 8 मेहंदी के छींटे, 8 काजल की टिकिया और एक एक सुहाली चढ़ा दें।
एक दीपक जलाये। एक एक फल, एक सुहाग पिटारी सबसे आखिरी दिन चढ़ाए। आठ दिन इसी तरह से पूजा करे और आखिरी दिन व्रत करे। व्रत करके आठ सुहाली का बायना निकालें।
8 वर्ष तक इसी व्रत के साथ पूजा करें और 9 वे वर्ष इस आशा भगोती व्रत का उद्यापन कर देना चाहिए। आठ दिन तक आशा भगोती की पूजा करने के पश्चात् नवे में उद्यापन करे तब तक उसी प्रकार पूजा करें।
8 सुहाग पिटारी में सुहाग की सारी चीजे डाल दे। 8 सुहाग पिटारी में 8 सुहाली भी डाल दे और पैर छूकर दक्षिणा दे। आशा भगोती की पूजा करने के पश्चात् कहानी सुननी चाहिए।
आशा भगोती की कहानी (Asha Bhagoti Ki Kahani)
प्राचीन समय में हिमाचल में एक राजा रहता था। उसकी दो पुत्रियां थी। एक का नाम गौरा और दूसरी का नाम पार्वती था। एक दिन राजा ने अपनी दोनों लड़कियों को बुलाकर पूछा कि तुम किसके भाग का खाती हो?
तब पार्वती जी बोलीं कि मैं तो अपने भाग का खाती हूं। गौरा से पूछने पर उन्होंने बताया कि मैं तो तुम्हारे भाग का खाती हूं। राजा ने ब्राह्मण को बुलाकर कहा कि पार्वती के लिए भिखारी का वर ढूंढना और गौरा के लिए राजकुमार वर ढूंढना।
ब्राह्मण ने गौरा के लिए सुन्दर राजकुमार और पार्वती के लिए बूढे भिखारी का वर ढूंढ कर दे दिया। भिखारी का रूप धारण करके शिवजी बैठे थे। राजा ने पार्वती जी की शादी के लिए कुछ भी तैयारी नहीं की तथा गौरा के लिए बहुत सी विवाह की तैयारी की।
जब गौरा की बारात आयी तो बारात की बहुत खातिर की गई और बड़े ही धूमधाम से शादी संपन्न की गई। लेकिन जब पार्वती जी की बारात आयी तो कुछ भी नहीं दिया और कन्यादान कर दिया।
शिवजी पार्वती जी को कैलाश पर्वत पर लेकर चले गए। जब पार्वती जी जाने लगीं तो जहां पर पांव रखती वहीं से दूब जल जाती। शंकर जी ने ब्राह्मणों को बुलाकर पूछा कि ऐसा क्या दोष है कि जहां भी पार्वती जी पांव रखती है वही पर से दूब जल जाती है?
इस पर ब्राह्मणगण बोले कि पार्वती जी की भाभियां आशा भगोती का व्रत (Asha Bhagoti Ka Vrat) करती थीं और उन्होंने अपने पीहर में जाकर उद्यापन कर दिया।
ये भी अपने पीहर जाकर उद्यापन करेंगी तब इनका दोष मिटेगा। शिवजी बोले, हम वहां धूमधाम से चलकर व्रत का उद्यापन करेंगे, नहीं तो उनको कैसे पता चलेगा कि पार्वती जी इतनी सुखी हैं।
वह वहां से खूब गहने कपड़े पहनकर चले गए। रास्ते में एक राजा की रानी को बच्चा होने वाला था। वह बहुत परेशान थी और भीड़ भी इकट्ठी हो रही थी। पार्वती जी ने पूछा, इतनी भीड़ क्यों हो रही है? लोगों ने उन्हें सब बात बता दी।
तब पार्वती जी ने शिवजी से कहा कि मेरी तो कोख बाँध दो। शिवजी ने बहुत मना किया लेकिन उन्होंने जिद ही पकड़ ली। शिवजी बोले कि औरत की हठ बहुत खराब होती है। शिवजी ने उनकी कोख बांध दी।
गौरा अपनी ससुराल में बहुत दुखी थी। पार्वती जी जब अपने पीहर आयी तब उन्हें कोई पहचान ही नहीं पाया। जब पार्वती जी ने अपना नाम बताया तब सभी लोग काफी प्रसन्न हुए। उसके पिता ने पूछा कि तू किसके भाग का खाती है? दुबारा से पार्वती जी ने कहा कि मैं अपने भाग का खाती हूं तभी तो इतनी खुश हूं।
वहां उसकी भाभियां आशा भगोती का उद्यापन कर रही थी। तब पार्वती जी बोली कि मेरे उद्यापन की तैयारी नहीं है नहीं तो मैं भी उद्यापन कर देती। इस पर भाभियों ने कहा कि तुम्हारे पास किस चीज़ की कमी है। शिवजी तो अपने आप ही सारी तैयारी कर देंगे।
भाभियां दासी से बोली कि शिवजी कुए के पास बैठे हैं, उनको कह कि वे पार्वती जी के आशा भगोती व्रत के उद्यापन की तैयारी कर दें और फिर दासी ने शिवजी से ऐसा ही कहा।
शिवजी ने दासी को अंगुठी दी और कहा कि इससे जो मांगोगी मिल जायेगा। दासी ने अंगुठी ले जाकर पार्वती जी को शिवजी का संदेश सुना दिया। पार्वती जी ने ठीक प्रकार से तैयारी कर ली।
8 सुहाग पिटारी मंगवाई, 8 तिल, 8 गहने, 8 पोली, 8 नथ, सुहाली, चूड़ा, नाल, डाली, रोली, मेहंदी, सिन्दूर, काजल, टीका, शीशा और सुहाग की सभी चीजे डाल दी। एक सुहाग पिटारी सासू जी को देने के लिए अलग से तैयार कर ली।
यह देखकर भाभियां बोली हम तो 8 महीने से तैयारी कर रहे हैं तब भी इतनी तैयारी नहीं हुई और इसने थोड़ी सी देर में ही ढेर सारी तैयारी कर ली। शिवजी ने पार्वती जी से कहा कि अब घर चली।
तब ससुर ने शिवजी को जीमने के लिए बुलाया तो शिवजी खूब गहने पहनकर और छोटा सा रूप बनाकर बड़ी धूमधाम से जीमने गए। जब लोग बोले कि पार्वती जी को भिखारी ढूंढ कर दिया पर पार्वती अपने भाग से खूब राज कर रही है।
शिवजी जीमने लगे तो सारा खाना खत्म कर दिया। पार्वती जी जीमने लगी तो कुछ भी नहीं बचा था। सिर्फ एक सब्जी उबली हुई पड़ी थी तो पार्वती जी वही साग खाकर ठंडा पानी पीकर वहां से चलने लगी।
रास्ते में खूब गर्मी थी और वह एक पेड़ के नीचे बैठ गयी। तब शिवजी ने पूछा कि तुम क्या खाकर आयी हो? तब पार्वती जी बोलीं कि जो तुमने खाया वही मैने खाया है। लेकिन शिवजी सब जानते थे।
शिवजी हंसने लगे और बोले कि तुम तो सब्जी और पानी पीकर आयी हो। पार्वती जी बोली कि आपने तो मेरा पर्दा खोल दिया लेकिन किसी और का मत खोलना। बाद में आगे गए तो जो दूब सूख गई थी वह हरी हो गई।
शिवजी ने सोचा कि दोष तो मिट गए। पार्वती जी बोलीं कि महाराज अब मेरी कोख खोल दो। शिवजी बोले, अब कैसे खोलूं? मैंने तो पहले ही मना कर दिया था। वहां से आगे गए तो वहीं रानी कुआ पूजने जा रही थी।
पार्वती जी ने पूछा कि यह क्या हो रहा है? इस पर शिवजी बोले कि यह वही रानी है जो दुख पा रही थी। अब इसके लड़का हो गया तो इसलिए कुआं पूजने जा रहीं है। पार्वती जी बोलीं, महाराज! मेरी तो कोख खोलो।
तब शिवजी बोले, मैंने तो तुमसे पहले ही मना किया था कि कोख मत बंधवाओ लेकिन तुमने जिद कर ली थी। तब जादू से सारी चीजे निकालकर गणेशजी बनाये तो पार्वती जी ने बहुत सारे नेगचार किए और कुआं पूजन किया।
पार्वती जी बोलीं कि मैं तो सुहाग बाटूंगी तो तो सारे देश मे शोर मचा कि पार्वती जी सुहाग बांट रही है जिसको लेना है ले लो। साधारण मनुष्य तो दौड़कर सुहाग ले गए परन्तु ब्राह्मणी और वैश्य स्त्रियां सुहाग लेने देर से पहुंची।
तब पार्वती जी बोली कि मैंने तो सारा सुहाग बांट दिया। शिवजी बोले कि इनको तो सुहाग देना पड़ेगा। पार्वती जी ने नाखूनों मे से मेहंदी निकाली, मांग में से सिंदूर, बिन्दी में से रोली, आंखो में से काजल और चितली अंगुली का छींटा दे दिया और उन्हें सुहाग मिल गया। सारी नगरी में जय जयकार हो उठी कि पार्वती जी ने सबको सुहाग दिया है।
आशा भगोती के व्रत और उद्यापन (Asha Bhagoti ka Vrat aur Udyapan) को कुंवारी लड़कियां ही करती हैं।
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