रमा एकादशी व्रत कथा (Rama Ekadashi Vrat Katha In Hindi) – हमारे देश में लोग एकादशी का व्रत रखते हैं। क्या आपको पता है कि प्रत्येक वर्ष कितनी एकादशी आती हैं?
आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें कि साल भर में इसकी कुल संख्या 24 hoti है लेकिन अधिकमास या मलमास के आ जाने के कारण इनकी संख्या बढ़कर 24 से 26 हो जाती है।
कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रमा एकादशी (Rama Ekadashi) कहा जाता है।
इस रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से समस्त पाप दूर हो जाते हैं और यहां तक कि ब्रह्म हत्या जैसे बड़े महापाप भी नष्ट हो जाते हैं और रमा एकादशी व्रत (Rama Ekadashi Vrat) को करने वाला व्यक्ति सीधे बैकुंठ धाम को प्राप्त होता है।
रमा एकादशी व्रत कब किया जाता है? (Rama Ekadashi Tithi)
भारत वर्ष में उत्तर के प्रदेशों में रमा एकादशी व्रत (Rama Ekadashi Vrat) दीपावली पर्व के चार दिन पहले एकादशी तिथि को रखा जाता है।
यानि कि कार्तिक के महीने में जब कृष्ण पक्ष आता है तब आने वाली एकादशी को यह व्रत (Rama Ekadashi Vrat) किया जाता है।
इस व्रत के अन्य नाम रम्भा एकादशी (Rambha Ekadashi) और कार्तिक कृष्ण एकादशी भी है। कहीं कहीं इसे कार्तिक की ग्यारस भी कहते हैं।

रमा एकादशी व्रत की पूजा विधि क्या है? (Rama Ekadashi Vrat Puja Vidhi At A Glance)
- एकादशी तिथि के दिन सुबह नहा धोकर संकल्प लेकर व्रत रखें।
- व्रत में कुछ नहीं खाना होता है।
- परिवार में जो लोग एकादशी का व्रत नहीं रखते हैं उनके लिए भी चावल वर्जित माना गया है अर्थात एकादशी के दिन घर में चावल न बनाए।
- रमा एकादशी व्रत के दिन भगवान् केशव की पूजा की जाती है।
- भगवान् केशव और माता लक्ष्मी का पुष्प, फल, अक्षत, नैवेद्य, रोली से पूजन करे और कपूर से आरती उतारे।
- चरणामृत मे तुलसी के पत्ते डालकर तैयार करें और प्रसाद मे वितरित करें।
- ब्राह्मण को भोजन करा कर द्वादशी के दिन व्रत पूर्ण करें। साथ ही दक्षिणा भी दें।
रमा एकादशी व्रत कथा (Rama Ekadashi Vrat Katha In Hindi)
प्राचीन समय में मुचकुन्द नाम का एक राजा था। उसे रमा एकादशी व्रत (Rama Ekadashi Vrat) का पूर्ण विश्वास था।
वह प्रत्येक एकादशी को व्रत करता था। वह राज्य की प्रजा पर भी यही नियम (Niyam) लागू करता था।
राजा मुचकुन्द के एक कन्या थी जिसका नाम चंद्रभागा था। वह भी पिता से अधिक इस व्रत पर विश्वास किया करती थी।
उसका विवाह राजा चन्द्रसेन के पुत्र शोभन के साथ हुआ जो राजा मुचकुन्द के साथ ही रहता था।
एकादशी के दिन सभी व्यक्तियों ने व्रत किए। शोभन ने भी एकादशी का व्रत किया किन्तु अत्यन्त कमजोर होने से भूख से व्याकुल हो वह मृत्यु को प्राप्त हो गया।
इससे राजा रानी और उनकी पुत्री बहुत दुखी हुए। शोभन को व्रत के प्रभाव से मन्दरांचल पर्वत पर धन धान्य से युक्त एवं शत्रुओं से रहित एक उत्तम देव नगर में आवास मिला।
वहां उसकी सेवा में रम्भा आदि अप्सराएं तत्पर थी। अचानक एक दिन राजा मुचकुन्द मन्दरांचल पर टहलते हुए पहुंचा तो वहां पर अपने दामाद को देखा और घर आकर सब वृतांत पुत्री को सुनाया।
पुत्री भी समाचार सुनकर पति के पास चली गई और दोनों सुख पूर्वक पर्वत पर ही रम्भादिक अप्सराओं से सेवित निवास करने लगे।
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