अमालकी एकादशी व्रत कथा और पूजा विधि (Amalaki Ekadashi Vrat Katha Puja)- हमारे देश में असंख्य लोग एकादशी का व्रत रखते हैं जिसमें अमालकी एकादशी परम स्थान रखती है।
यह व्रत फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाता है। अमालकी एकादशी व्रत का सम्बंध आंवले से है।
भगवान् विष्णु ने सृष्टि सृजन के लिए जब ब्रह्मा जी को जन्म प्रदान किया था तभी उन्होंने आंवले के वृक्ष को भी जन्म दिया था।
आंवले के वृक्ष में भगवान् का निवास होने के कारण से इसका पूजन किया जाता है।
इस अमालकी एकादशी का व्रत परम कल्याण और सर्व कार्य सिद्धि दायक माना गया है।
स्वर्ग और मोक्ष प्राप्ति की कामना रखने वाले इस व्रत को करते हैं।

परम अमालकी एकादशी व्रत पूजन सामग्री
- तिल ।
- कुश।
- जल।
- गाय का गोबर।
- कलश।
- सुगंधी।
- पंच रत्न।
- पंच पल्लव।
- दीप।
- श्रीखंड चंदन।
- वस्त्र।
- भगवान् परशुराम जी की मूर्ति या चित्र।
- ब्राह्मण भोजन।
- ब्राह्मण दक्षिणा।
अमालकी एकादशी व्रत पूजा विधि (Vrat Puja Vidhi)
- प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान कर लें। फिर भगवान् विष्णु जी के चित्र के सामने आसन बिछा कर बैठ जाए और हाथ में तिल, कुश और रुपये और जल लेकर व्रत का संकल्प लें। नियमित पूजन करें।
- कहीं पर भी जहां आंवले का वृक्ष हो उसके चारों ओर साफ सफाई कर लें और चारों ओर की जगह गाय के गोबर से लीप दें।
- वृक्ष के सामने एक वेदी बनाकर उस पर कलश रखें। अगर वेदी बनानी नहीं आती हो तो रोली हल्दी से स्वस्तिक बना सकते हैं।
- कलश में सुगंध और पंच रत्न रखें। ध्यान करके कलश में सभी देवी देवताओं, तीर्थो और नदियों को आमंत्रित करें।
- फिर कलश के उपर पंच पल्लव रख दीजिए। फिर दीप प्रज्वलित कीजिए और कलश पर रख दीजिए।
- कलश के उपर चंदन घिस कर बनाया गया लेप लगाएं और वस्त्र पहनाएं। कलश के सन्मुख श्री परशुराम भगवान् का चित्र रखकर विधिवत पूजन करें।
- अमालकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) सुननी चाहिए।
- पूरे दिन व्रत रखें। और रात्री में भजन कीर्तन करें। द्वादशी के दिन एक ब्राह्मण को भोजन करायें और पूरी श्रद्धा के साथ उसे परशुराम भगवान् का चित्र और पूजन वाला कलश मय दक्षिणा भेंट करें। इसके बाद व्रती को अन्न जल ग्रहण करना चाहिए।
अमालकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha)
प्राचीन काल में भारत देश में चित्रसेन नामक राजा राज्य करते थे। उनके राज्य में एकादशी व्रत का बहुत महत्व था।
समस्त लोग एकादशी व्रत को किया करते थे। एक दिन वह राजा जंगल में शिकार खेलते-खेलते काफी दूर निकल गए।
तभी कुछ जंगली जातियों ने उन्हें आकर घेर लिया। उन्होंने राजा के ऊपर अस्त्र शस्त्रों का कठिन प्रहार किया मगर उन्हें कोई कष्ट न हुआ।
यह देखकर वे सब आश्चर्यचकित रह गए।
जब उन जंगली जातियों की संख्या देखते ही देखते बहुत बढ़ गई तो राजा संज्ञा हीन हो कर पृथ्वी पर धराशायी हो गए।
उसी समय उनके शरीर से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई जो उन समस्त राक्षसों को मारकर अदृश्य हो गई।
जब राजा की चेतना लौटी तो उन्होंने देखा कि समस्त म्लेच्छ मरे पड़े हैं।
अब वे इस उधेरबुन में पड़ गए कि इन्हें किसने मारा?
तभी आकाश वाणी से यह सुनायी पड़ा कि हे राजन! ये समस्त आक्रामक तुम्हारे पिछले जन्म की आमल एकादशी के व्रत के प्रभाव से मर गए हैं।
यह सुनकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ तथा समस्त राज्य में इस एकादशी के महात्म्य को कह सुनाया।
म्लेच्छों के विनाश से समस्त प्रजा सुख चैन की बंसी बजाने लगी।











