जानिए कैसे शरद पूर्णिमा का व्रत अमृत प्रदान करता है? Sharad Purnima Vrat Katha

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जानिए कैसे शरद पूर्णिमा का व्रत अमृत प्रदान करता है? Sharad Purnima Vrat Katha In Hindi

शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima) का पर्व आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को बड़े हर्ष और उल्लास से देश भर में मनाया जाता है। इसे कहीं कहीं कौमुदी व्रत(Kaumudi Vrat) , कोजागरी पूर्णिमा (Kojagari Purnima) या रास पूर्णिमा (Ras Purnima) भी कहते हैं। ◉ कोजागरी/कौमुदी परंपरा — स्रोत

धार्मिक मान्यता के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात्रि चंद्रमा को अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण माना जाता है। ◉ चंद्रमा की सोलह कलाएँ — संदर्भ

आश्विन मास में शरद पूर्णिमा के अलावा राधा अष्टमी  जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व भी श्रद्धापूर्वक मनाए जाते हैं।

यदि आप वर्षभर आने वाली पूर्णिमा, व्रत, पूजा-विधि और प्रमुख हिन्दू पर्वों की विस्तृत जानकारी पढ़ना चाहते हैं, तो व्रत एवं पूजा अवश्य पढ़ें।

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ऐसा माना जाता है कि इसी दिन श्री कृष्ण जी ने महारास रचाया था। और रात्रि में आकाश में चंद्रमा से अमृत टपकता है। इसलिए लोग इस दिन दूध से बनी खीर रात को अपनी छत पर रखते हैं ताकि उसमें अमृत लिया जा सके और इसे ग्रहण कर दीर्घायु प्राप्त कर सके। ◉ शरद पूर्णिमा की खीर परंपरा — शोध स्रोत

Sharad Purnima Vrat Katha

Sharad purnima 2026 date25 October 2026

इस दिन सुबह सुबह स्नान आदि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर अपने आराध्य देव और कुल देवता की पूजा अर्चना की जाती है। इसी दिन भगवान् शिव जी के पुत्र कार्तिकेय जी की भी पूजा की जाती है।

इसी प्रकार भगवान विष्णु को समर्पित अनन्त चतुर्दशी व्रत भी भक्तों को संकटों से मुक्ति और सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है।

शरद पूर्णिमा की पूजा कैसे करें? (Sharad Purnima Puja vidhi In Hindi)

  • एक पटरे पर जल से भरा हुआ लोटा और एक गिलास में गेहूं भरकर रखें।
  • गिलास पर रोली से स्वास्तिक का चिह्न बनाए और उस पर चावल एवं दक्षिणा आदि अर्पित करें।
  • तिलक लगाकर गेहूं के 13 दाने लेकर शरद पूर्णिमा की कथा कहानी (Sharad Purnima Vrat Katha) सुनें।
  • गेहूं से भरा गिलास बाद में किसी भी ब्राह्मण महिला को दे दे।
  • लोटे के जल को रात्रि में चंद्रमा निकलने पर अर्ध्य दे।
  • रात के समय गाय के दूध में गाय का घी, चीनी या मिश्री मिलाकर उसे छत पर चांद निकलने के बाद रख दें।
  • आधी रात तक छत पर ही भजन कीर्तन करें।
  • आधी रात को छत पर रखा गाय का दूध भोग लगाकर सभी ज़न ग्रहण करें।

विवाह के बाद पूर्णमासी के व्रत (Puranmasi Ka Vrat) रखना चाहे तो इसे शरद पूर्णिमा से ही शुरू करना चाहिए। कार्तिक का व्रत भी शरद पूर्णिमा से ही प्रारम्भ करना चाहिए।

कार्तिक मास की शुरुआत के साथ आने वाले धार्मिक अनुष्ठानों में कार्तिक पूर्णिमा का विशेष महत्व है, जिसे स्नान, दान और दीपदान के लिए अत्यंत शुभ माना गया है।

शरद पूर्णिमा व्रत का उद्यापन कैसे करे? (Sharad Purnima Vrat Katha Ka Udyapan)

यदि आप शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima Ka Vrat) का व्रत रखते हैं तो 13 पूर्णिमा पूरी होने के बाद इसका उद्यापन (Udyapan) कर देना चाहिए। एक चांदी के लोटे में मेवा भरकर उसका रोली, चावल और तिलक लगाकर इसकी पूजा करें।

कुछ रुपये चढ़ाए। फिर सास के पैर छूकर सब सामन और रुपये उन्हें दे दें। यदि चुनड़ पुनों के दिन व्रत रखा है तो इसी तरह से एक पुन्यो के बाद सास को चुनरी दे दें। 13 पून्यो को करने के बाद एक चूड़ा सास को और 13 वृद्ध ब्राह्मण महिलाओ को दे दे।

शरद पूर्णिमा व्रत कथा (Sharad Purnima Vrat Katha In Hindi)

बहुत पुरानी बात है कि एक जमीदार के दो बेटियां थी। पहली पुत्री शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima) का व्रत पूरा किया करती थी जबकि दूसरी पुत्री इस व्रत को अधूरा ही करती थी।

यही कारण था कि दूसरी पुत्री के जो सन्तान हुआ करती थी वह मर जाती थी। उसने कई ज्योतिषियों और ब्राह्मणों से पूछा कि उसकी औलाद जीवित क्यों नहीं रह पाती हैं? ब्राह्मणों ने बताया कि तुम्हारे पूर्णिमा के दिन के शरद पूर्णिमा व्रत (Sharad Purnima Ka Vrat) को अधूरा करने के कारण तुम्हारी संताने जीवित नहीं रह पाती हैं।

यह सब जानकर अब द्वितीय पुत्री विधि विधान से शरद पूर्णिमा का व्रत करने लगी। कुछ दिनों के बाद उसके एक पुत्र हुआ और होते ही वह मर गया।

वह अपनी बहन के पास गयी और उसे साथ लेकर वापिस आयी। वो जैसे ही बैठने लगी उसके स्पर्श से बच्चा जीवित हो उठा और तुरंत रोना शुरू कर दिया।

बच्चे के रोने की आवाज सुनते ही छोटी बहन कहने लगी कि बहन! ये तेरे भाग्य से ही जीवित हुआ है क्योंकि तू शरद पूर्णिमा का व्रत पूरा विधि विधान से रखा करती थी और मैं अधूरा।

यही कारण था कि मुझे व्रत का दोष लग गया और मेरी संतानें मर जाया करती थी। उसने अपने गाँव में सभी को सूचित करा दिया कि जो कोई भी शरद पूर्णिमा का व्रत करे उसे पूरा करे आधा अधूरा न करे। जो कोई भी इस Sharad Purnima Vrat Katha को सुनता है या सुनाता है उसे दीर्घायु प्राप्त होती है।

शरद पूर्णिमा का धार्मिक महत्व

सनातन धर्म में शरद पूर्णिमा का अत्यंत विशेष महत्व माना गया है। मान्यता है कि इस रात्रि चन्द्रमा अपनी सोलहों कलाओं से पूर्ण होता है और उसकी शीतल किरणों में अमृततुल्य ऊर्जा का संचार होता है। इसलिए इस दिन चन्द्रदेव की पूजा, अर्घ्य तथा चन्द्रमा की रोशनी में रखी गई खीर का सेवन शुभ माना जाता है।

शास्त्रों के अनुसार यह तिथि माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए भी अत्यंत फलदायी मानी गई है। जो श्रद्धालु इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत, पूजा और रात्रि जागरण करते हैं, उनके जीवन में सुख, समृद्धि और मानसिक शांति का वास होता है।

शरद पूर्णिमा पर खीर रखने की परंपरा क्यों है?

लोकमान्यता के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्रमा की किरणों में विशेष औषधीय एवं अमृतमय गुण होते हैं। इसी कारण गाय के दूध, चावल और मिश्री से बनी खीर को खुले आकाश के नीचे चन्द्रमा की रोशनी में रखा जाता है। इसके बाद भगवान को भोग लगाकर परिवार के सभी सदस्य प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

यद्यपि यह एक धार्मिक मान्यता है, फिर भी श्रद्धालु इसे भगवान की कृपा और शुभता का प्रतीक मानकर आज भी इस परंपरा का पालन करते हैं।

शरद पूर्णिमा व्रत के लाभ

  • माता लक्ष्मी और चन्द्रदेव की कृपा प्राप्त होती है।
  • घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।
  • परिवार के सदस्यों की दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य की कामना पूर्ण होती है।
  • मन की नकारात्मकता दूर होकर मानसिक शांति प्राप्त होती है।
  • पूर्ण श्रद्धा से व्रत और पूजा करने पर पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

शरद पूर्णिमा से जुड़े सामान्य प्रश्न (FAQ)

शरद पूर्णिमा की खीर कब खानी चाहिए?

रात्रि में चन्द्रमा की रोशनी में कुछ समय रखने के बाद भगवान को भोग लगाकर खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण करना चाहिए।

क्या शरद पूर्णिमा पर व्रत रखना आवश्यक है?

व्रत रखना श्रद्धा और सामर्थ्य पर निर्भर करता है। अनेक श्रद्धालु इस दिन उपवास रखकर भगवान की पूजा और रात्रि जागरण करते हैं।

शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा क्यों कहा जाता है?

मान्यता है कि इस रात्रि माता लक्ष्मी भ्रमण करती हैं और जागकर उनका स्मरण एवं पूजा करने वाले भक्तों पर अपनी विशेष कृपा बरसाती हैं। इसी कारण इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। ◉ कोजागरी एवं लक्ष्मी पूजा — संदर्भ

क्या शरद पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा को अर्घ्य देना चाहिए?

हाँ, अनेक स्थानों पर इस दिन चन्द्रदेव को अर्घ्य देकर सुख, समृद्धि और आरोग्य की कामना की जाती है।

शरद पूर्णिमा के स्रोत एवं संदर्भ

शरद पूर्णिमा से संबंधित धार्मिक एवं लोक परंपराओं के अध्ययन के लिए निम्न शोध एवं संदर्भ स्रोत उपयोगी हैं:

नोट: इन स्रोतों में धार्मिक एवं लोक परंपराओं का वर्णन/documentation मिलता है। चंद्रमा की किरणों से खीर में वास्तविक “अमृत” बनने जैसे दावों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

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PUNIT NAGAR
पुनीत नागर JSBJM.org के संस्थापक और लेखक हैं। वे मेहंदीपुर बालाजी धाम, मंदिर से जुड़ी धार्मिक परंपराओं, दर्शन, अर्जी-दरखास्त, हनुमान भक्ति और सनातन धर्म से संबंधित विषयों पर हिंदी में लेख लिखते हैं। उनका प्रयास उपलब्ध आधिकारिक एवं विश्वसनीय स्रोतों, शोध सामग्री, पुस्तकों तथा संबंधित धार्मिक और स्थानीय परंपराओं के संदर्भ में जानकारी को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है। जहाँ किसी जानकारी का आधार धार्मिक मान्यता या स्थानीय परंपरा होता है, उसे उसी संदर्भ में स्पष्ट करने का प्रयास किया जाता है।

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