माता गणगौर व्रत की कहानी Gangaur Vrat Katha In Hindi

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Gangaur Vrat Katha हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखती है। गणगौर का व्रत माता पार्वती और भगवान शिव को समर्पित होता है। इस दिन महिलाएं अखंड सौभाग्य, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। यहाँ पढ़ें गणगौर व्रत की सम्पूर्ण कथा, महत्व और गणगौर पूजा का पारंपरिक गीत।

हिंदू धर्म के अन्य प्रमुख व्रतों, उनकी पूजा विधि, नियम और धार्मिक महत्व के बारे में विस्तार से जानने के लिए व्रत एवं पूजा: संपूर्ण जानकारी, महत्व और नियम भी पढ़ें।

व्रत गणगौर व्रत
तिथि चैत्र शुक्ल तृतीया
समर्पित भगवान शिव और माता पार्वती
उद्देश्य अखंड सौभाग्य एवं सुखी दांपत्य जीवन

 

गणगौर व्रत की कहानी Gangaur Vrat Katha In Hindi – यह व्रत चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया को होता है। इस पावन दिन सुहागिन स्त्रियां व्रत रखती हैं। गणगौर (Gangaur) शब्द गण (Gan) और गौर (Gaur) दो शब्दों से बना है। गण का अर्थ शिव और गौर का मतलब पार्वती होता है।

कहा जाता है कि इस दिन भगवान् शिव जी ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती का तथा पार्वती ने तमाम स्त्रियों को सौभाग्य वर दिया था।

इस दिन पूजा करते समय मिट्टी की गौरी माँ यानि गौर (Gaur) बनाकर उस पर चूडी, धूप-दीप, अक्षत, चंदन, पुष्प और नैवेद्य से पूजन किया जाता है, गणगौर की कहानी (Gangaur Vrat Katha) और साथ ही सुहाग सामग्री चढ़ाकर भोग भी लगाया जाता है।

Gangaur Vrat Katha In Hindi

ऐसी शुभ मान्यता है कि इस व्रत को करने वाली स्त्रियों को गौर (Gaur) पर चढ़े सिंदूर को अपनी मांग में लगाना चाहिए और गणगौर व्रत की कहानी (Gangaur Vrat Ki Kahani) सुननी चाहिए।

Gangaur Vrat Katha In Hindi

एक समय की बात है जब भगवान् शिव नारदजी और पार्वती जी को साथ में लेकर पृथ्वी पर घूमने फिरने चल दिये।

भ्रमण करते हुए वह तीनों एक गाँव में जा पहुंचे। उस दिन चैत्र मास की शुक्ल तृतीया थी।

गाँव के लोगों को जब शिव जी के आने की सूचना मिली तो धनी स्त्रियां उनके पूजन के लिए नाना प्रकार के रुचिकर भोजन बनाने में लग गई।

इसी कारण से उन धनी स्त्रियों को काफी देर हो गई। दूसरी ओर निर्धन घर की स्त्रियों ने जैसे बैठी थी वैसे ही थाल में हल्दी, चावल, जल लेकर शिवजी और पार्वती जी की पूजा अर्चना की।

अपार श्रद्धा भक्ति में देखकर उन स्त्रियों को पार्वती जी ने पहचाना तथा उनकी भक्ति पूर्वक दी गई वस्तुओं को स्वीकार भी किया और उन सबके ऊपर सुहाग रूपी हल्दी छिड़क दी।

इस प्रकार गौरी माँ से आशीर्वाद तथा मंगल कामनाएँ प्राप्त कर वे स्त्रियां अपने अपने घर चली गई।

इसके बाद धनी स्त्रियां सोलह शृंगार, छप्पन प्रकार के व्यंजन सोने के थाल में सजाकर आयीं।

तब शिवजी ने शंका व्यक्त करते हुए कहा – पार्वती! तुमने सारा सुहाग प्रसाद तो साधारण स्त्रियों में बांट दिया अब इन सबको क्या दोगी?

पार्वती जी ने कहा – आप कृपया उनकी बात छोड़ दें। उन्हें ऊपरी पदार्थों से निमित्त रस दिया है इसलिए उनका सुहाग धोती से रहेगा।

लेकिन इन लोगों को मैं अपनी उंगली चीरकर रक्त सुहाग रस दूंगी जो मेरे ही समान बन सौभाग्यशाली बन जाएंगी।

जब धनी स्त्रियां शिव और गौरी जी की पूजा कर चुकी तो पार्वती जी ने अपनी उंगली चीरकर उसके रक्त को उनके ऊपर छिड़क दिया और कहा कि तुम सब वस्त्राभरणों का परित्याग कर माया मोह से रहित हो तथा तन, मन, धन से पति की सेवा करना। प्रणाम करके कुलीन स्त्रियां भी अपने अपने घर लौट आयी तथा पति परायणा बन गई।

छिड़का खून जिसके ऊपर जैसा पड़ा था उसने वैसा ही सौभाग्य प्राप्त किया। इसके बाद पार्वती जी ने पति की आज्ञा से नदी में जाकर स्नान किया।

बालू का महादेव बनाकर पूजन किया, भोग लगाया तथा प्रदक्षिणा कर दो कणों का प्रसाद खाकर, पार्वती ने मस्तक पर टीका लगाया।

उसी समय उस पार्थिव लिंग से शिवजी प्रकट हुए तथा पार्वती को वरदान दिया कि आज के दिन जो भी स्त्री मेरी पूजा और तुम्हारा व्रत करेगी उनके पति चिरंजीव रहेंगे और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी।

भगवान् शिव पार्वती जी को यह वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए।

इसके बाद पार्वती जी नदी तट से चलकर उस स्थान पर आयी जहां पर वह पतिदेव और ऋषि नारदजी को छोड़कर गई थी।

शिवजी ने विलंब का कारण पूछा तो पार्वती जी ने उत्तर दिया कि मेरे भाई भाभी नदी के किनारे मिल गए थे उन्होंने मुझसे दूध भात खाने तथा ठहरने का आग्रह किया इसी कारण से मुझे आने में देर लग गई।

ऐसा सुनकर अन्तर्यामी शिव स्वयं दूध भात खाने के लिए चल दिये। पार्वती जी ने जब यह जाना कि अब तो पोल खुल जाएगी तब वह अधीर होकर पति से प्रार्थना करती हुई पति के पीछे पीछे चल पड़ी।

पार्वती जी ने जब नदी की ओर देखा तो पाया कि एक सुन्दर सा महल बना हुआ है। उसमें पार्वती जी के भाई भाभी विद्यमान थे।

ये लोग जब वहां पहुंचे तो उन लोगों ने उनका सप्रेम स्वागत-सत्कार किया। दो दिन तक तीनों ने उनका आतिथ्य स्वीकार किया।

तीसरे दिन सुबह पार्वती जी के द्वारा चलने के आग्रह को ठुकरा दिया। इससे देवी काफी नाराज हुई और अकेले ही चल पड़ी।

मजबूर होकर महादेव को उनका अनुसरण करना पड़ा। नारदजी भी साथ में थे। तीनों व्यक्ति चलते-चलते काफी दूर निकल आए।

शाम होने पर शिवजी ने बहाना बनाया कि मैं तो तुम्हारे मायके में अपनी माला ही भूल आया।

इस पर पार्वती जी माला लाने को तैयार हुई किन्तु शिवजी की आज्ञा से न जा सकीं।

नारदजी वहां गए। वह जाकर देखते हैं कि न तो वहां पर कोई महल है और न ही पार्वती जी के भाई भाभी। न ही वहां किसी भी चीज़ का नामोनिशान है। और न ही कहीं पर माला दिखाई पड़ रही है।

बल्कि घोर अंधकार में नरसंहार हिंसक पशु विचरण कर रहे हैं। इस अंधकार पूर्ण भयावह वातावरण को देखकर नारदजी बहुत ही चकित हुए।

अचानक बिजली चमकने की चमक से वृक्ष पर टंगी हुई माला नारदजी को दिखाई पड़ी। वह भयभीत होकर जल्दी से शिवजी के पास पहुंचे और उन्हें सारा वृतांत कह सुनाया।

इस प्रसंग को सुनकर हंसते हुए शिव ने नारदजी से उसका आदिमूल कारण बताया कि हे मुनि! आपने जो कुछ भी दृश्य देखा वह सब पार्वती की अनोखी माया का प्रतिफल है।

वे अपने पार्थिव पूजन की बात को गुप्त रखना चाहती थीं इसलिए उन्होंने झूठा बहाना बनाया था।

फिर उस असत्य को सत्य करने के लिए उन्होंने अपने पतिव्रत धर्म की शक्ति से झूठे महल की रचना की। अपितु सच्चाइ को उभारने के लिए ही मैंने माला लाने के लिए तुम्हें दुबारा उस स्थान पर भेजा था।

ऐसा जानकर महर्षि नारदजी ने माता पार्वती के पति व्रत प्रभाव से उत्पन्न घटना की मुक्त कंठ से प्रशंसा की।

जहां तक उनके पूजन की बात को छिपाने का सवाल है वह भी समीचीन ही जान पड़ता है क्योंकि पूजा छिपकर ही करनी चाहिए।

पार्वती जी के अनुसार जो स्त्रियां इस दिन को गुप्त रूप से पति का पूजन कार्य संपादित करेंगी उनकी कृपा से समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति होगी तथा उनके पति भी चिरंजीव होंगे।

जिस प्रकार पार्वती जी ने व्रत को छिपाकर किया था उसी परंपरा के अनुसार आज भी पूजन के अवसर पर पुरुष उपस्थित नहीं रहते हैं।

गणगौर पूजा का गीत

गौर – गौर गोमती, ईसर पूजे पार्वती ।
पार्वती का आला – गीला, गौर का सोना का टीका,
टीका दे टमका दे रानी, व्रत करयो गौरा दे रानी।

करता-करता आस लायो, मास आयो।
खोरे-खाण्डे लाडू ल्यायो, लाडू ले वीरा न दियो,

वीरो मनै पाल दी, पाल को मैं बरत करयो।
सन-सन सोला कचौला, ईसर गौरा दोन्यू जोड़ा।
जोड़ जवारो गेहूं ग्यारह, रानी पूजे राज ने।

मैं म्हाके सवाग ने, रानी को राज बढ़ते जाए,
म्हाको सवाग बढ़तो जाय।

कीड़ी-कीड़ी कीड़ी ले, कीड़ी थारी जात है।
जात है गुजरात है गुजरात्यां रो पाणी, दे दे थाम्बा ताणी,

ताणी में सिंघाड़ा, बाड़ी में भी जोड़ा।
म्हारो बाई एमल्यो, खेमल्यो, लाडू ल्यो पेड़ा ल्यो सेव ल्यो

सिंघाड़ा ल्यो, झर झरती जलेबी ल्यो,
हरी-हरी दोब ल्यो गणगौर पूजल्यो (यह आठ बार /सोलह बार बोलें)

अंत मैं – एक ल्यो,  दो ल्यो,  तीन ल्यो,  चार ल्यो,  पांच ल्यो,  छह ल्यो,  सात ल्यो,  आठ ल्यो।

फिर हाथ में गेहूं के आखे व जवारे लेकर गणगौर की कहानी (Gangaur Vrat Katha) कहें और सुनें।

अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु के लिए रखे जाने वाले प्रमुख व्रतों में वट सावित्री व्रत का भी विशेष महत्व माना जाता है। इस व्रत में माता सावित्री और सत्यवान की कथा का श्रवण किया जाता है तथा विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन की कामना करती हैं।

गणगौर व्रत का महत्व

गणगौर व्रत मुख्य रूप से माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना के लिए किया जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा और विधि-विधान से करने पर विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य प्राप्त होता है तथा अविवाहित कन्याओं को योग्य वर की प्राप्ति होती है। राजस्थान सहित कई राज्यों में गणगौर का पर्व बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से गणगौर के अलावा हरतालिका तीज व्रत और करवा चौथ व्रत का भी विशेष महत्व माना जाता है।

Gangaur Vrat Katha से जुड़े प्रश्न

गणगौर व्रत कब रखा जाता है?

गणगौर व्रत चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है।

गणगौर व्रत किस देवता को समर्पित है?

यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है।

Gangaur Vrat Katha का क्या महत्व है?

इस व्रत को करने से अखंड सौभाग्य, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

 

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PUNIT NAGAR
पुनीत नागर JSBJM.org के संस्थापक और लेखक हैं। वे मेहंदीपुर बालाजी धाम, मंदिर से जुड़ी धार्मिक परंपराओं, दर्शन, अर्जी-दरखास्त, हनुमान भक्ति और सनातन धर्म से संबंधित विषयों पर हिंदी में लेख लिखते हैं। उनका प्रयास उपलब्ध आधिकारिक एवं विश्वसनीय स्रोतों, शोध सामग्री, पुस्तकों तथा संबंधित धार्मिक और स्थानीय परंपराओं के संदर्भ में जानकारी को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है। जहाँ किसी जानकारी का आधार धार्मिक मान्यता या स्थानीय परंपरा होता है, उसे उसी संदर्भ में स्पष्ट करने का प्रयास किया जाता है।

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