शनिवार व्रत कथा

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शनिवार व्रत कथा का संबंध न्याय के देवता भगवान शनि देव की आराधना से है। मान्यता के अनुसार शनिवार का व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से शनि दोष, साढ़ेसाती और ढैया के अशुभ प्रभावों को कम करने में सहायता मिलती है तथा जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है।

इस पोस्ट में आप शनिवार व्रत कथा, पूजा विधि, व्रत के नियम, शनिवार व्रत का महत्व, व्रत के लाभ तथा शनि देव से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के बारे में विस्तार से जानेंगे। यदि आप अन्य व्रतों की विधि और कथाओं की जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो व्रत एवं पूजा श्रेणी के आर्टिकल्स भी पढ़ सकते हैं।

इस दिन शनि देव भगवान् की पूजा होती है। काला तिल, काले वस्त्र, तेल, उड़द शनि को बहुत प्रिय है। इसलिए इनके द्वारा शनि की पूजा होती है।

धार्मिक मान्यता है कि शनिवार के दिन हनुमान जी के मंगलवार के व्रत से जुड़े नियमों का पालन करने तथा हनुमान जी की आराधना करने से भी शनि देव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

शनि की दशा को दूर करने के लिए यह व्रत किया जाता है। शनिवार व्रत कथा के पाठ के साथ साथ शनि स्त्रोत का पाठ भी विशेष लाभदायक सिद्ध होता है।

शनिवार व्रत कथा shanivar vrat katha

शनिवार का महत्व

शनिवार व्रत भगवान शनि देव की कृपा प्राप्त करने के लिए रखा जाता है। शनि देव को न्याय का देवता माना गया है, जो प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक शनिवार का व्रत रखने, शनि देव की पूजा करने तथा शनिवार व्रत कथा का पाठ करने से शनि की अशुभ दशा का प्रभाव कम होता है और जीवन में सुख-शांति का संचार होता है।

जो लोग शनि की साढ़ेसाती, ढैया या कुंडली में शनि संबंधी दोषों से परेशान रहते हैं, वे श्रद्धा और नियमपूर्वक शनिवार का व्रत रखते हैं। इस दिन तिल का तेल, काला तिल, उड़द, काले वस्त्र तथा जरूरतमंदों को दान देने का भी विशेष महत्व बताया गया है।

शनिवार व्रत की पूजा विधि

  1. शनिवार प्रातः स्नान करके स्वच्छ या काले अथवा गहरे नीले रंग के वस्त्र धारण करें।
  2. भगवान शनि देव की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाएं।
  3. तिल के तेल का दीपक अर्पित करें तथा काला तिल, उड़द और नीले या काले पुष्प अर्पित करें।
  4. शनि मंत्र, शनि चालीसा या शनि स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
  5. शनिवार व्रत कथा का श्रवण या पाठ करें।
  6. गरीब, जरूरतमंद या दिव्यांग व्यक्तियों को यथाशक्ति दान करें।
  7. अंत में शनि देव की आरती करके परिवार के सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।

शनिवार व्रत के नियम

  • पूरे दिन सात्त्विक आचरण रखें और क्रोध से बचें।
  • झूठ, छल, कपट और किसी का अपमान न करें।
  • यदि संभव हो तो उपवास या फलाहार करें।
  • पीपल के वृक्ष के नीचे तिल के तेल का दीपक जलाना शुभ माना जाता है।
  • कौए, काले कुत्ते अथवा जरूरतमंदों को भोजन कराना पुण्यदायी माना जाता है।
  • शनि देव की पूजा श्रद्धा, संयम और नियमपूर्वक करें।

शनिवार व्रत कथा

एक समय सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहू और केतु इन ग्रहों का आपस में झगड़ा हो गया कि हम सब मे सबसे बड़ा कौन है?

सब अपने आपको बड़ा कहते थे। जब आपस में कोई निर्णय न हो सका तो सब के सब आपस में झगड़ते हुए इंद्र के पास गए और कहने लगे कि आप देवताओं के राजा हैं, इसलिए आप हमारा न्याय करके बताइए कि हम नव ग्रहों मे सबसे बड़ा कौन है?

राजा इन्द्र इनका प्रश्न सुनकर घबरा गये और कहने लगे कि मुझमे यह सामर्थ्य नहीं है जो किसी को बड़ा या छोटा बताऊं। मैं अपने मुख से कुछ नहीं कह सकता हूं। हां, एक उपाय हो सकता है।

इस समय पृथ्वी पर राजा विक्रमादित्य दूसरों के दुखों का निवारण करने वाले हैं। इसलिए तुम सब मिलकर उन्हों के पास जाओ, वही तुम्हारे दुखों का निवारण करेंगे।

ऐसा वचन सुनकर सभी ग्रह देवता चलकर भूलोक में राजा विक्रमादित्य की सभा में जाकर उपस्थित हुए और अपना प्रश्न राजा के सामने रखा। राजा उनकी बात सुनकर बड़ी चिंता में पड़ गये कि मैं अपने मुख से किसको बड़ा और किसको छोटा बतलाऊं।

जिसको छोटा बतलाऊं वही क्रोध करेगी। परन्तु उनका झगड़ा निपटाने के लिए उपाय सोचा कि सोना, चांदी, कांसा, शीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक और लोहा नव धातुओं के नौ आसन बनवाए।

सब आसनों को क्रम से जैसे सोना सबसे पहले और लोहा सबसे पीछे बिछाये गये। इसके पश्चात राजा ने सब ग्रहो से कहा कि आप सब अपने अपने आसनों पर बैठिए।

जिसका आसन सबसे आगे है वह सबसे बड़े और जिसका आसन सबसे पीछे वह सबसे छोटा जानिये। क्योंकि लोहा सबसे पीछे था और शनिदेव का आसन था इसलिये शनिदेव ने समझ लिया कि राजा ने मुझको सबसे छोटा बना दिया है।

इस पर शनि को बड़ा क्रोध आया और कहा कि राजा तू मेरे पराक्रम को नहीं जानता। सूर्य एक राशि पर एक महीना, चंद्रमा सवा दो दिन, मंगल डेढ़ महीना, बृहस्पति तेरह महीने, बुध और शुक्र एक महीने परन्तु मैं एक राशि पर ढाई अथवा साढ़े सात साल तक रहता हूं।

बड़े बड़े देवताओं को भी मैंने भीषण दुख दिया है। राजन सुनो! राम जी को साढ़े साती आयी तो वनवास हो गया और रावण पर आयी तो राम और लक्ष्मण ने सेना लेकर लंका पर चढ़ायी कर दी।

रावण कुल का नाश कर दिया। हे राजा! अब तुम सावधान रहना। राजा कहने लगा जो कुछ भाग्य में होगा देखा जायेगा। उसके बाद अन्य ग्रह तो प्रसन्नता के साथ चले गए किन्तु शनिदेव बड़े क्रोध के साथ वहां से सिधारे।

कुछ काल व्यतीत होने पर जब राजा को साढ़े साती की दशा आयी तो शनिदेव घोड़ों के सौदागर बनकर अनेक सुन्दर घोड़ों के सहित राजा की राजधानी में आये।

जब राजा ने सौदागर के आने की बात सुनी तो अपने अश्वपाल को अच्छे अच्छे घोड़े खरीदने की आज्ञा दी। अश्वपाल ऐसी अच्छी नस्ल के घोड़े देखकर उनका मूल्य सुनकर चकित हो गया। और तुरन्त ही राजा को खबर दी।

राजा उन घोड़ों को देखकर एक अच्छा सा घोड़ा चुनकर सवारी के लिए चढ़ा। राजा के घोड़े की पीठ पर चढ़ते ही घोड़ा जोर से भागा। घोड़ा बहुत दूर एक जंगल में जाकर भटकता फिरता रहा।

बहुत देर पश्चात्‌ राजा ने भूख और प्यास से व्याकुल देखकर पानी पिलाया। राजा की उंगली मे एक अंगुठी थी। वह उसे निकालकर ग्वाले को दे दी और शहर की ओर चल दिया।

राजा शहर में पहुंचकर एक सेठ की दुकान में जाकर बैठ गया और अपने आप को उज्जैन का रहने वाला तथा अपना नाम वीका बतलाया। सेठ ने उसको एक कुलीन मनुष्य समझकर जल आदि पिलाया।

भाग्यवश उस दिन सेठ की दुकान पर बिक्री बहुत अधिक हुई, तब सेठ उसको भाग्यशाली पुरुष समझकर भोजन कराने के लिए अपने साथ ले गया।

भोजन करते समय राजा ने आश्चर्य की बात देखी कि खूंटी पर हार लटक रहा है और वह खूंटी उस हार को निगल रही है। भोजन के पश्चात कमरे में आने पर जब सेठ को कमरे में हार न मिला तो सबने यही निश्चय किया कि सिवाय वीका के कोई उस कमरे में नहीं आया अतः अवश्य ही उसी ने हार चोरी किया है।

परन्तु वीका ने कहा हार मैंने नहीं लिया है। इस पर पांच सात आदमी इकट्ठे होकर उसको फौजदारी के पास लाये। फौजदार ने उसको राजा के सामने उपस्थित कर दिया। और कहा कि ये आदमी तो भला प्रतीत होता है, चोर मालूम नहीं होता, परन्तु सेठ का कहना है कि इसके सिवाय और कोई घर में आया ही नहीं, अवश्य ही इसी ने चोरी की है।

तब राजा ने आज्ञा दी कि इसके हाथ पैर काटकर चौरंगिया किया जाये। राजा की आज्ञा का तुरन्त पालन किया गया और वीका के हाथ पैर काट दिये गये।

इस प्रकार कुछ काल व्यतीत होने पर एक तेली उसको अपने घर ले गया और कोल्हू पर उसको बिठा दिया। वीका उस पर बैठा हुआ अपनी ज़बान से बैल हांकता रहा।

शनि की दशा समाप्त हो गई और एक रात्रि को वर्षा ऋतु के समय वह मल्हार राग गाने लगा। उसका गाना सुनकर उस शहर के राजा की कन्या उस राग पर मोहित हो गयी और दासी को खबर लाने को भेजा कि शहर में कौन गा रहा है?

दासी सारे शहर में फिरती फिरती क्या देखती है कि तेली के घर में चौरंगिया राग गा रहा है। दासी ने महल में आकर राजकुमारी को सब वृतांत सुना दिया। बस उसी क्षण राजकुमारी ने अपने मन में यह प्रण कर लिया कि चाहे कुछ भी हो, मुझे इस चौरंगिया के साथ विवाह करना है।

प्रातः काल होते ही जब दासी ने राजकुमारी को जगाना चाहा तो राजकुमारी अनशन व्रत लेकर पड़ी रही। तब दासी ने रानी के पास जाकर राजकुमारी के न उठने का वृतांत कहा।

रानी ने तुरंत ही वहां पर आकर राजकुमारी को जगाया और उसके दुख का कारण पूछा, तो राजकुमारी ने कहा कि माताजी मैंने प्रण कर लिया है कि तेली के घर में जो चौरंगिया है उसी के साथ विवाह करूंगी।

माता ने कहा, पगली! यह बात क्या कह रही है? तेरा किसी देश के राजा के साथ विवाह किया जायेगा। कन्या कहने लगी कि माताजी मैं अपना प्रण कभी नहीं तोड़ूंगी। माता ने चिंतित होकर यह बात राजा को बतायी।

जब महाराज ने भी आकर समझाया कि मैं अभी देश देशान्तर मे अपने दूत भेजकर सुयोग्य, रूपवान एवं बड़े से बड़े गुणी राजकुमार के साथ तुम्हारा विवाह करूंगा, ऐसी बात तुमको कभी नहीं विचारनी चाहिये।

कन्या ने कहा, पिताजी! मैं अपने प्राण त्याग दूंगी परन्तु दूसरे से विवाह नहीं करूंगी। इतना सुनकर राजा ने क्रोध से कहा यदि तेरे भाग्य में ऐसा ही लिखा है तो जैसी तेरी इच्छा हो वैसा ही कर।

राजा ने तेली को बुलाकर कहा कि तेरे घर में जो चौरंगिया है उसके साथ मैं अपनी कन्या का विवाह करना चाहता हूं। तेली ने कहा कि यह कैसे हो सकता है, कहां आप हमारे राजा और कहां मैं एक नीच तेली?

परन्तु राजा ने कहा कि भाग्य लिखे को कोई टाल नहीं सकता, अपने घर जाकर विवाह की तैयारी करो। राजा ने उसी समय तोरणा और वंदनवार लगवाकर अपनी राजकुमारी का विवाह चौरंगिया विक्रमादित्य के साथ कर दिया।

रात्री को जब विक्रमादित्य और राजकुमारी महल में सोये तो आधी रात के समय शनिदेव ने विक्रमादित्य को स्वप्न दिया कि राजा कहो, मुझको छोटा बताकर तुमने दुख उठाया? राजा ने क्षमा मांगी।

शनिदेव ने प्रसन्न होकर विक्रमादित्य को हाथ पैर दिये। तब राजा ने कहा महाराज! मेरी प्रार्थना स्वीकार करें कि जैसा दुख आपने मुझे दिया है ऐसा और किसी को न दें। शनिदेव ने कहा कि तुम्हारी यह प्रार्थना स्वीकार है, जो मनुष्य मेरी कथा सुनेगा या कहेगा उसको मेरी दशा में कभी किसी प्रकार का दुख नहीं होगा और जो नित्य ही मेरा ध्यान करेगा या चीटियों को आटा डालेगा उसके सब मनोरथ पूर्ण होंगे। इतना कहकर शनिदेव अपने धाम चले गए।

राजकुमारी की आंख खुली और उसने राजा के हाथ पांव देखे तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसको देखकर राजा ने अपना समस्त हाल कहा कि मैं उज्जैन का राजा विक्रमादित्य हूं। यह बात सुनकर राजकुमारी अत्यंत प्रसन्न हुई।

प्रातः काल राजकुमारी से उसकी सखियों ने पूछा तो उसने अपने पति का समस्त वृतांत कह सुनाया। तब उसने प्रसन्नता प्रकट की और कहा कि ईश्वर ने आपकी मनोकामना पूर्ण कर दी।

जब उस सेठ ने यह सुना तो वह विक्रमादित्य के पास आया और राजा विक्रमादित्य के पैरों में गिरकर क्षमा मांगने लगा कि आप पर मैंने चोरी का झूठा आरोप लगाया। अतः आप मुझको जो चाहे दण्ड दे।

राजा ने कहा, मुझ पर शनिदेव का कोप था। इस कारण यह सब दुख मुझको प्राप्त हुआ, इसमे तुम्हारा कोई दोष नहीं है तुम अपने घर जाकर अपना कार्य करो। सेठ बोला कि मुझे तभी शांति मिलेगी जब आप मेरे घर चलकर प्रीति पूर्वक भोजन करेंगे।

राजा ने कहा कि जैसी आपकी मर्जी हो वैसा ही करें। सेठ ने अपने घर जाकर अनेक प्रकार के सुन्दर भोजन बनवाए और राजा विक्रमादित्य को प्रीतिभोज दिया। जिस समय भोजन कर रहे थे, एक अत्यंत आश्चर्य की बात सबको दिखाई दी कि जो खूंटी पहले हार निगल गयी थी वह अब हार उगल रही है।

जब भोजन समाप्त हो गया तो सेठ ने हाथ जोड़कर बहुत सी मोहरे राजा को भेंट की और कहा कि मेरे श्रीकंवरी नामक एक कन्या है, उसका पाणिग्रहण आप करें।

इसके बाद सेठ ने अपनी कन्या का विवाह राजा के साथ कर दिया और बहुत सा दान दहेज आदि दिया। इस प्रकार कुछ दोनों तक वहां निवास करने के पश्चात विक्रमादित्य ने शहर में राजा से कहा कि अब मेरी उज्जैन जाने की इच्छा है।

फिर कुछ दिनों बाद विदा लेकर राजकुमारी मनभावनी, सेठ की कन्या श्रीकंवरी तथा अनेक दास, दासी रथ और पालकी सहित विक्रमादित्य उज्जैन की तरफ चले। जब शहर के निकट पहुंचे पुरवासियों ने राजा के आने का संवाद सुना तो समस्त उज्जैन की प्रजा अगवानी के लिए आयी।

तब बड़ी प्रसन्नता से राजा अपने महल में पधारे। सारे शहर में बड़ा भारी महोत्सव मनाया गया और रात्रि को दीपमाला की गई। दूसरे दिन राजा ने शहर में यह घोषणा करायी कि शनि देवता सब ग्रहों मे सर्वोपरि हैं।

मैंने इनको छोटा बतलाया इसी से मुझको यह दुख प्राप्त हुआ। इस कारण सारे शहर में सदा शनि देव की पूजा और शनिवार व्रत कथा होने लगी।

राजा और प्रजा अनेक प्रकार के सुख भोगते रहे। जो कोई शनि देव की इस शनिवार व्रत कथा को पढ़ता या सुनता है शनि देव की कृपा से उसके सब दुख दूर हो जाते हैं। शनिवार व्रत कथा को व्रत के दिन अवश्य पढ़ना चाहिए।

व्रत के लाभ

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शनिवार व्रत रखने और श्रद्धापूर्वक शनिवार व्रत कथा का पाठ करने से भगवान शनि देव की कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत व्यक्ति को अच्छे कर्म करने की प्रेरणा देता है तथा जीवन में आने वाली अनेक बाधाओं को दूर करने का माध्यम माना जाता है।

  • शनि देव की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है।
  • शनि की साढ़ेसाती, ढैया और शनि दोष के अशुभ प्रभाव कम होने की धार्मिक मान्यता है।
  • रोजगार, व्यापार और कार्यक्षेत्र में आने वाली बाधाएं दूर होने की प्रार्थना की जाती है।
  • मानसिक तनाव, भय और नकारात्मकता कम करने में आध्यात्मिक सहायता मिलती है।
  • परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहने की कामना की जाती है।
  • धैर्य, अनुशासन और सदाचार का विकास होता है।

व्रत में क्या करें और क्या न करें?

क्या करें?

  • प्रातः स्नान करके शनि देव का विधिपूर्वक पूजन करें।
  • तिल के तेल का दीपक जलाएं और काला तिल तथा उड़द अर्पित करें।
  • शनिवार व्रत कथा, शनि चालीसा या शनि स्तोत्र का पाठ करें।
  • गरीबों, जरूरतमंदों और दिव्यांगों की यथाशक्ति सहायता करें।
  • पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक जलाकर परिक्रमा करें।

क्या न करें?

  • किसी गरीब, मजदूर या असहाय व्यक्ति का अपमान न करें।
  • झूठ, छल, क्रोध और अहंकार से बचें।
  • अनावश्यक विवाद या किसी को कष्ट न दें।
  • नशे और तामसिक भोजन से बचने का प्रयास करें।
  • शनि देव की पूजा केवल भयवश नहीं बल्कि श्रद्धा और सद्भाव से करें।

शनिवार व्रत कथा से जुड़े सामान्य प्रश्न (FAQ)

शनिवार व्रत किस देवता का होता है?

शनिवार का व्रत भगवान शनि देव को समर्पित होता है।

शनिवार व्रत कथा कब पढ़नी चाहिए?

शनिवार के दिन पूजा के समय या शनि आराधना के बाद शनिवार व्रत कथा का पाठ करना शुभ माना जाता है।

शनिवार व्रत में क्या दान करना चाहिए?

काला तिल, उड़द, तिल का तेल, काले वस्त्र तथा जरूरतमंदों को अन्न या दक्षिणा का दान करना शुभ माना जाता है।

क्या महिलाएं शनिवार व्रत रख सकती हैं?

हाँ, श्रद्धा और नियमपूर्वक महिलाएं तथा पुरुष दोनों शनिवार का व्रत रख सकते हैं।

निष्कर्ष

शनिवार व्रत कथा केवल एक धार्मिक कथा नहीं, बल्कि कर्म, न्याय, धैर्य और श्रद्धा का संदेश भी देती है। जो श्रद्धालु नियमपूर्वक शनिवार का व्रत रखते हैं, शनि देव की पूजा करते हैं और कथा का पाठ करते हैं, उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने की धार्मिक मान्यता है।

जो लोग शनि की साढ़ेसाती, ढैया या कुंडली में शनि संबंधी दोषों से परेशान रहते हैं, वे श्रद्धा और नियमपूर्वक शनिवार व्रत रखते हैं। यदि आप सप्ताह के अन्य दिनों में रखे जाने वाले व्रतों के बारे में भी जानना चाहते हैं, तो सोमवार व्रत, बुधवार व्रत, बृहस्पतिवार व्रत, शुक्रवार व्रत तथा रविवार व्रत की जानकारी भी पढ़ सकते हैं।

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PUNIT NAGAR
पुनीत नागर JSBJM.org के संस्थापक और लेखक हैं। वे मेहंदीपुर बालाजी धाम, मंदिर से जुड़ी धार्मिक परंपराओं, दर्शन, अर्जी-दरखास्त, हनुमान भक्ति और सनातन धर्म से संबंधित विषयों पर हिंदी में लेख लिखते हैं। उनका प्रयास उपलब्ध आधिकारिक एवं विश्वसनीय स्रोतों, शोध सामग्री, पुस्तकों तथा संबंधित धार्मिक और स्थानीय परंपराओं के संदर्भ में जानकारी को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है। जहाँ किसी जानकारी का आधार धार्मिक मान्यता या स्थानीय परंपरा होता है, उसे उसी संदर्भ में स्पष्ट करने का प्रयास किया जाता है।

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