सकट चौथ व्रत विधि Sakat Chauth Vrat Katha – प्रतिवर्ष हिन्दू पंचांग के अनुसार माघ मास के कृष्ण पक्ष की चौथ यानि चतुर्थी तिथि को गणेश चौथ का व्रत किया जाता है। इस व्रत को संकष्ट चतुर्थी या सकट चौथ भी कहते हैं।
भविष्य पुराण में ऐसा कहा गया है कि जब जब मनुष्य भारी कष्ट या मुसीबत में हो या निकट भविष्य में किसी अनिष्ट की आशंका हो तो उसे सकट चौथ का व्रत करना चाहिए।
यदि आप विभिन्न हिन्दू व्रतों, उनकी पूजा विधि, नियम, उद्यापन और धार्मिक महत्व के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं, तो व्रत एवं पूजा: संपूर्ण जानकारी, महत्व और नियम अवश्य पढ़ें।
इससे इस लोक और परलोक दोनों में सुख की प्राप्ति होती है । इस व्रत को करने से व्रती के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। मनुष्य वांक्षित फल पा कर अन्त में गणपति को पा जाता है। यहां तक कि इस व्रत को करने से विद्यार्थी को विद्या और रोगी को आरोग्य की प्राप्ति भी होती है।

| विषय | जानकारी |
|---|---|
| व्रत | सकट चौथ |
| समर्पित | भगवान गणेश |
| तिथि | माघ कृष्ण चतुर्थी |
| मुख्य प्रसाद | तिलकुट |
| व्रत खोलना | चंद्र दर्शन के बाद |
सकट चौथ व्रत विधि (Sakat Chauth Vrat Vidhi)
सकट चौथ व्रत की आवश्यक सामग्री
| 01 | मेहंदी |
| 02 | सफेद तिल |
| 03 | गुड़ |
| 04 | एक पटरा |
| 05 | जल का लोटा |
| 06 | रोली |
| 07 | चावल |
| 08 | रुपये |
| 09 | एक कटोरी |
- व्रत वाले दिन सुबह सुबह सिर धोकर नहा लें।
- हाथों में मेहंदी लगाएं और सफेद तिल और गुड़ के तिलकुट बनाए।
- एक पटरे पर जल का लोटा, रोली, चावल, एक कटोरी में तिलकुट और रुपये रखें।
- जल के लोटे पर रोली से सतिया बनाकर 13 टिक्की करें।
- चौथ और गणेश जी की कहानी सुनें। इस दौरान थोड़ा सा तिलकुट हाथ में ले लें।
- कहानी सुनने के बाद एक कटोरी में तिलकुट और रुपये रखकर सासू जी के पैर छूकर इसे दे दें।
- जल का लोटा और हाथ में रखे तिल उठाकर रख दें।
- रात को चांद को देखकर इसी जल से अर्ध्य देकर व्रत खोल लें।
- जो कहानी सुनाए उसे कुछ रुपये और तिलकुट देवे।
- व्रत खोलते समय तिलकुट अवश्य खायें।
सकट चौथ व्रत कथा (Sakat Chauth Vrat Katha)
एक साहूकार और एक साहूकारनी थे। वह धर्म पुण्य को नहीं मानते थे। इसके कारण उनके सन्तान नहीं हुई। एक दिन उनकी पड़ोसन सकट चौथ की कहानी (Sakat Chauth Vrat Katha) सुन रही थी।
तब साहूकारनी उनके पास जाकर बोली, “तुम क्या कर रही हो? चौथ का व्रत करने से क्या होता है?”
तब वह बोली कि इससे अन्न, धन, धान्य, सुहाग और बेटा होता है। तब साहूकारनी बोली कि यदि मेरे गर्भ ठहर जाए तो सवा सेर तिलकुट करूंगी और Sakat Chauth Ka Vrat भी करूंगी।
अगर गर्भ रह गया तो वह आगे बोली कि मेरे लड़का हो जाए तो मैं ढाई सेर का तिलकुट करूंगी। उसके लड़का हो गया तो वह बोली कि हे! चौथ माता! मेरे बेटे का विवाह हो जाएगा तो सवा पांच सेर का तिलकुट करूंगी।
जब बेटे का विवाह तय हो गया तो वह विवाह करने चले गए। तब गणेश जी ने सोचा कि जब से इसके गर्भ रहा है तब से रोज तिलकुट बोलती जा रही है।
अब तो बेटे का विवाह भी हो रहा है तब भी तिल का एक दाना भी नहीं दिया इसने।
अगर हम इसको प्रपंच नहीं दिखाएं तो अपने को कलियुग में कोई नहीं मानेगा। हम इसके बेटे को फेरों में से ले लेंगे।
जब उसने तीन फेरे लिए तो चौथ माता गरजती हुई आयी और उसको उठाकर पीपल पर बिठा दिया।
हाहाकार मच गया और सब उसको ढूंढने लगे। परन्तु वह कहीं नहीं मिला।
लड़कियां गणगौर पूजने गाँव से बाहर दूब लेने जाती थी। तब वह एक लड़की को देखकर कहता, “आ मेरी अर्द्धब्याही!”
यह बात सुनकर वह लड़की सूखकर कांटा हो गई। तब लड़की की मां बोली, “मैं तुझे अच्छा खिलाती हूं और अच्छा पहनाती हूं फिर भी तू क्यों सूखती जा रही है?”
तो वह बोली कि जब मैं दूब लेने जाती हूँ तो पीपल में से एक आदमी बोलता है कि आ मेरी अर्द्ध ब्याही। और उसने मेहंदी लगा रखी है और सेहरा बाँध रखा है।
तो उसकी मां उठी और देखा कि वह तो उसका जमाई है। तब वह अपने जमाई से बोली कि यहाँ क्यों बैठा है? मेरी बेटी तो अर्द्ध ब्याही कर दी और अब क्या लेगा?
तब वह बोला कि मेरी मां ने चौथ माता का तिलकुट बोला था। उसने नहीं किया और चौथ माता नाराज हो गई। और मुझे यहां बिठा दिया।
वह वहां गई और साहूकारनी से बोली कि तुमने सकट चौथ का कुछ बोला है क्या? तब साहूकारनी बोली कि मैंने तिलकुट बोला था।
फिर साहूकारनी बोली कि अगर मेरा बेटा आ जाए तो ढाई मन का तिलकुट करूंगी। गणेश चौथ राजी हो गई और उसके बेटे को फेरों मे लाकर बिठा दिया।
बेटे का विवाह हो गया तब उन लोगों ने ढाई मन का तिलकुट कर दिया और बोली कि हे चौथ माता! तेरे आशीर्वाद से मेरे बेटे बहू घर आए हैं जिससे मैं हमेशा तिलकुट करके sakat chauth ka vrat करूंगी।
सारे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि सब तिलकुट करके चौथ का व्रत करना।
हे चौथ माता! जैसा उसके बहू बेटे को मिलवाया वैसा सबको मिलवाना। कहते सुनते सब परिवार का भला करना।
सकट चौथ का उद्यापन (Sakat Chauth Ka Udyapan)
अगर आपका इसी साल मे बेटा हो या बेटे का विवाह हो तो चौथ माता का उद्यापन होता है। एक सेर सफेद तिल, एक सेर गुड़ मिलाकर तिलकुट करे।
और एक चम्मच से तिलकुट की 13 कुढ़ी करे और उस पर एक तीयल रख इच्छानुसार रुपये रखकर हाथ फेरकर रोली चावल मिनसकर बाद में सासु जी के पैर छूकर दे दें।
चौथ माता की कहानी सुनें और सिर्फ चौथ का उद्यापन करें। एक थाली में 13 जगह चार char जगह हलवा रखे और एक तीयल, रुपये रखकर सास को पैर छूकर दें।
ब्राह्मणी जिमाए। उन्हें एक कुढ़ा, हलवा पूरी दे दें। तिलक लगा कर दक्षिणा दें।
यदि आप भगवान श्री गणेश को समर्पित अन्य महत्वपूर्ण व्रत के बारे में जानना चाहते हैं, तो बुधवार व्रत कथा भी अवश्य पढ़ें। इस व्रत में भगवान गणेश की पूजा, व्रत कथा, पूजा विधि, नियम और धार्मिक महत्व का विस्तृत वर्णन किया गया है।
निष्कर्ष
सकट चौथ व्रत भगवान श्री गणेश की कृपा प्राप्त करने और जीवन के संकटों को दूर करने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। श्रद्धापूर्वक व्रत, पूजा और सकट चौथ व्रत कथा का श्रवण करने से परिवार में सुख, समृद्धि और मंगल की प्राप्ति होती है। यदि आप भगवान गणेश से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण व्रत के बारे में जानना चाहते हैं, तो गणेश चतुर्थी व्रत कथा भी अवश्य पढ़ें।
सकट चौथ व्रत से जुड़ी सामान्य जानकारी
सकट चौथ व्रत भगवान श्री गणेश को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। हिन्दू धर्म में यह व्रत विशेष रूप से संतान की सुख-समृद्धि, परिवार की मंगलकामना और जीवन के संकटों को दूर करने के लिए रखा जाता है।
मान्यता है कि सकट चौथ व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण करने और विधि-विधान से पूजा करने पर भगवान गणेश प्रसन्न होते हैं तथा भक्त के सभी विघ्नों का नाश करते हैं। इस दिन तिल और गुड़ से बने तिलकुट का विशेष महत्व बताया गया है।
व्रत रखने वाले श्रद्धालु चंद्र दर्शन के बाद अर्घ्य देकर व्रत का पारण करते हैं। कई स्थानों पर महिलाएं अपने परिवार की सुख-शांति और संतान की दीर्घायु के लिए यह व्रत करती हैं।
Sakat Chauth Vrat Katha FAQ
सकट चौथ का व्रत कब रखा जाता है?
सकट चौथ का व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है।
सकट चौथ किस भगवान को समर्पित है?
यह व्रत भगवान श्री गणेश को समर्पित माना जाता है।
सकट चौथ में क्या प्रसाद चढ़ाया जाता है?
सकट चौथ पर तिल और गुड़ से बना तिलकुट विशेष रूप से चढ़ाया जाता है।
Sakat Chauth Vrat Katha सुनना क्यों जरूरी है?
मान्यता है कि व्रत कथा सुनने से व्रत पूर्ण माना जाता है और भगवान गणेश की कृपा प्राप्त होती है।
सकट चौथ व्रत में चंद्रमा को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?
सकट चौथ व्रत में चंद्र दर्शन के बाद जल का अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार ऐसा करने से व्रत पूर्ण माना जाता है और भगवान गणेश की कृपा प्राप्त होती है।
सकट चौथ व्रत का पारण कब किया जाता है?
सकट चौथ व्रत का पारण रात्रि में चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य देने के बाद किया जाता है। इसके बाद तिल और गुड़ से बने तिलकुट का प्रसाद ग्रहण कर व्रत पूर्ण किया जाता है।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह लेख धार्मिक ग्रंथों, प्रचलित मान्यताओं और लोक परंपराओं के आधार पर तैयार किया गया है। विभिन्न क्षेत्रों और परिवारों में सकट चौथ व्रत की पूजा-विधि एवं रीति-रिवाजों में कुछ अंतर हो सकता है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान का पालन अपने परिवार की परंपरा अथवा योग्य आचार्य के मार्गदर्शन के अनुसार करें। इस लेख का उद्देश्य केवल सामान्य धार्मिक जानकारी प्रदान करना है।





