जो स्त्रियां जीवितपुत्रिका का व्रत करती हैं उनका उद्देश्य अपने पुत्र-पुत्री की रक्षा करना यानि उनकी दीर्घायु की कामना करना प्रमुख होता है। इस व्रत को करने से बच्चों का मरण दोष दूर हो जाता है। इस व्रत का अन्य नाम जितिया का व्रत (Jitiya Ka Vrat) भी है। अन्य अपभ्रंश भाषा में इसे कहीं कहीं Jutiya ka Vrat भी कहते हैं। यह व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को किया जाता है।

यदि आप हिंदू धर्म के अन्य प्रमुख व्रतों, उनकी पूजा विधि, नियम और धार्मिक महत्व के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं, तो व्रत एवं पूजा: संपूर्ण जानकारी, महत्व और नियम भी अवश्य पढ़ें।
जीवितपुत्रिका (जितिया) व्रत का महत्व
जीवितपुत्रिका व्रत, जिसे Jitiya Ka Vrat भी कहा जाता है, संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से रखा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से माताओं द्वारा अपनी संतान की रक्षा और उनके उज्ज्वल भविष्य की मंगलकामना के लिए किया जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से जितिया व्रत करने पर संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं तथा परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाने वाला अहोई अष्टमी व्रत भी माताओं के प्रमुख व्रतों में से एक है। दोनों व्रतों का उद्देश्य संतान के कल्याण और परिवार की मंगलकामना करना है।
जितिया व्रत कब मनाया जाता है?
जितिया या जीवितपुत्रिका व्रत प्रत्येक वर्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। यह पर्व तीन दिनों तक चलता है जिसमें नहाय-खाय, निर्जला व्रत और पारण का विशेष महत्व होता है।
मुख्य रूप से जीवितपुत्रिका का पर्व तीन दिनों तक चलता है। पहले दिन को नहाई-खाई कहते हैं। नहाई-खाई के दिन माताएं स्नान करने के बाद ही भोजन लेती हैं। दूसरे दिन जितिया का व्रत रखा जाता है। यह व्रत निर्जल यानी कि बिना पानी के रखा जाता है।
Jitiya Vrat ki Jankari in Hindi
| 01 | अन्य नाम | जीवितपुत्रिका व्रत | ||
| 02 | जितिया (Jitiya ka vrat) का व्रत 2026 कब है? | वर्ष 2026 में 02 अक्टूबर से 04 सितंबर तक। 2 अक्टूबर 2026 - नहाई-खाई 3 सितंबर 2026 - निर्जल व्रत 4 सितंबर 2026 - व्रत समापन | ||
| 03 | जितिया का व्रत किस तिथि को रखा जाता है? | मुख्य उपवास आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को किया जाता है। | ||
| 04 | जितिया व्रत (Jitiya Vrat) का उद्देश्य | सन्तान की दीर्घायु एवं कल्याण | ||
| 05 | जितिया व्रत कितने दिन का होता है? | तीन दिन का - 1. पहले दिन माताएं स्नान के बाद ही भोजन ग्रहण करती हैं। 2. दूसरे दिन बिन पानी पिए उपवास रखती हैं। 3. तीसरे दिन व्रत का समापन भोजन के साथ होता है जो कि दिन का पहला भोजन होता है जिसे पारन कहा जाता है। | ||
| 06 | पारन में क्या क्या होता है? | पारन में मुख्य रूप से करी चावल, नोनी का साग और मडुआ की रोटी, और तोरी की सब्जी होती है। | ||
| 07 | जीवितपुत्रिका व्रत में किस भगवान् की पूजा होती है? | भगवान् सूर्य नारायण की। | ||
| 08 | क्या करें, क्या न करें? | 1.बाजरा और चने से बने पदार्थ भोग में लगाए ✔️ 2.काटे हुए फल और सब्जियां नहीं खानी चाहिये और न ही काटे। |
तीसरे दिन व्रत का समापन पारन के साथ होता है जो कि दिन का पहला भोजन होता है। इसमें मुख्य रूप से करी चावल, नोनी का साग और मडुआ की रोटी, और तोरी की सब्जी होती है।
जितिया व्रत विधि (Jitiya Vrat Vidhi)
यह व्रत रखने के लिए यह आवश्यक है कि स्वयं के स्नान करने के पश्चात् भगवान् सूर्य नारायण की मूर्ति को स्नानादि कराने के पश्चात् उन्हें भोग लगाएं और आचमन कराकर धूप एवं दीप से उनकी आरती उतारे। भोग को प्रसाद के रूप में सभी ज़न को बांट दे।
इस दिन बाजरा और चने से बने पदार्थ भोग में लगाए जाते हैं तथा काटे हुए फल और सब्जियां नहीं खानी चाहिये और न ही काटे। इस दिन सूर्य भगवान् की पूजा की जाती है।
जिनके पुत्र तो होते हो परन्तु जीवित नहीं रहते, जीवितपुत्रिका का व्रत (Jitiya Ka Vrat) करने से उनके पुत्र जीवित रहने लगते हैं। इसके साथ ही बच्चों का मरण दोष भी दूर हो जाता है।
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जीवितपुत्रिका व्रत की कथा (Jitiya Vrat Ki Katha)
बहुत पहले भगवान् कृष्ण द्वारिकापुरी में रहते थे। उन्हीं दिनों एक ब्राह्मण भी इसी द्वारिकापुरी में रहता था। उसके सात पुत्र थे,जो काल के ग्रास में बचपन में ही समा चुके थे। इस वज़ह से वह ब्राह्मण बहुत दुखी रहता था।
एक दिन वह ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्ण जी के पास गया और उनसे बोला, भगवन्! आपके राज्य में आपकी कृपा से मेरे सात पुत्र हुए लेकिन उनमे से कोई भी जीवित नहीं रह सका। कृपया, आप मुझे इसका कारण बताये?
भगवान् श्री कृष्ण जी महाराज बोले, हे ब्राह्मण! सुनो इस बार तुम्हारे जो सन्तान होगी उसकी आयु तीन वर्ष होगी। उसकी उम्र बढ़ाने के लिए तुम भगवान् सूर्य नारायण की पूजा अर्चना करो और जीवितपुत्रिका (Jitiya Ka Vrat) व्रत को धारण करो। इससे तुम्हारे पुत्र की आयु बढ़ जाएगी।
उस ब्राह्मण ने भगवान् श्री कृष्ण की बातों का अनुसरण किया। एक दिन जब वह सपरिवार हाथ जोड़ और खड़े होकर इस प्रकार विनती कर ही रहा था –
सूर्यदेव विनती सुनो, पाऊँ दुख अपार।
उम्र बढ़ाओ पुत्र की कहता बारंबार॥
उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान् सूर्य देव का रथ वहीं रुक गया। ब्राह्मण की विनती से प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यदेव ने अपने गले से एक माला ब्राह्मण पुत्र के गले में डाल दी और आगे चल दिये।
थोड़ी ही देर बाद यमराज उस ब्राह्मण पुत्र के प्राण हरने आ गए। यमराज को देखकर ब्राह्मण और उसकी पत्नी श्री कृष्ण जी को झूठा कहने लगे। भगवान् श्री कृष्ण इसे अपना अपमान समझकर तुरन्त ही सुदर्शन चक्र लेकर आ गए और बोले, इस माला को यमराज के उपर डाल दो।
यह सुनकर ब्राह्मण ने माला उतारी तो यमराज जी वहां से डर कर भाग गए लेकिन यमराज की छाया वहीं रह गई। उस फूल की माला को यमराज की छाया के उपर फेंकने से वह छाया शनि के रूप में आकर भगवान् श्री कृष्ण जी से प्रार्थना करने लगी।
भगवान् कृष्ण जी को शनि के उपर दया आ गयी और उसे पीपल के वृक्ष पर रहने के लिए कहा। तब से शनि की छाया पीपल के वृक्ष पर निवास करने लगी।
इस प्रकार भगवान् श्री कृष्ण ने उस ब्राह्मण के पुत्र की आयु बढ़ा दी। इसलिए भगवन्! जिस प्रकार से आपने ब्राह्मण के पुत्र की उम्र बढ़ायी उसी प्रकार सभी की उम्र बढ़ाना।
परिवार और संतान की मंगलकामना से जुड़े प्रमुख व्रतों में वट सावित्री व्रत का भी विशेष महत्व माना जाता है, जिसे विवाहित महिलाएं श्रद्धापूर्वक करती हैं।
जीमूतवाहन की कथा
जीमूतवाहन एक दयालु राजकुमार थे। एक दिन उन्हें पता चला कि नागराज वासुकि के आदेश से शंखचूड़ नाम का एक नाग युवक गरुड़ का भोजन बनने जा रहा है। शंखचूड़ अपनी वृद्ध माता का इकलौता पुत्र था।
जीमूतवाहन को उसकी पीड़ा देखकर बहुत दुख हुआ। उन्होंने शंखचूड़ की जगह स्वयं गरुड़ के सामने जाने का निश्चय किया। वे बलि-शिला पर जाकर लेट गए और गरुड़ उन्हें नाग समझकर उठा ले गया।
गरुड़ जब उन्हें खाने लगा, तब भी जीमूतवाहन अपने निर्णय से पीछे नहीं हटे। इसी बीच शंखचूड़ वहाँ पहुँचा और उसने गरुड़ को बताया कि जीमूतवाहन नाग नहीं हैं और वे उसकी जगह अपना जीवन देने आए हैं।
जीमूतवाहन के इस त्याग से गरुड़ प्रभावित हुआ। अंत में उसने नागों को अपना भोजन न बनाने का वचन दिया और पहले मारे गए नागों को भी अमृत के प्रभाव से जीवित कर दिया।
📜 कथासरित्सागर — जीमूतवाहन कथा
जितिया व्रत के लाभ
- संतान की दीर्घायु की कामना की जाती है।
- बच्चों के सुख, स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना की जाती है।
- परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
- भगवान सूर्य नारायण की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है।
- मातृत्व और पारिवारिक स्नेह का यह महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है।
जितिया व्रत से जुड़े सामान्य प्रश्न (FAQ)
जितिया व्रत कौन रखता है?
मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत रखती हैं।
क्या जितिया व्रत निर्जला होता है?
हाँ, अधिकांश परंपराओं में यह निर्जला व्रत माना जाता है।
जितिया व्रत कितने दिन का होता है?
यह पर्व तीन दिनों तक चलता है—नहाय-खाय, मुख्य व्रत और पारण।
जितिया और जीवितपुत्रिका में क्या अंतर है?
दोनों एक ही व्रत के अलग-अलग नाम हैं।
धार्मिक सूचना
इस पोस्ट में दी गई जानकारी विभिन्न धार्मिक मान्यताओं, लोक परंपराओं और प्रचलित व्रत कथाओं पर आधारित है। अलग-अलग क्षेत्रों में जितिया व्रत की पूजा विधि और परंपराओं में कुछ अंतर हो सकता है। श्रद्धालु अपने परिवार की परंपरा अथवा स्थानीय विद्वान के मार्गदर्शन का पालन करें।
स्रोत एवं संदर्भ
सोमदेव भट्ट — कथासरित्सागर
जीमूतवाहन, शंखचूड़ और गरुड़ की कथा कथासरित्सागर में वर्णित है। कथा में जीमूतवाहन शंखचूड़ की जगह स्वयं गरुड़ के सामने जाते हैं और अपने त्याग के कारण नागों की रक्षा होती है।





