Home Vrat Aur Tyohar जितिया|जीवितपुत्रिका|व्रत कथा एवं विधि – Jitiya ka Vrat, Katha, Vidhi In Hindi

जितिया|जीवितपुत्रिका|व्रत कथा एवं विधि – Jitiya ka Vrat, Katha, Vidhi In Hindi

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जो स्त्रियां जीवितपुत्रिका का व्रत करती हैं उनका उद्देश्य अपने पुत्र-पुत्री की रक्षा करना यानि उनकी दीर्घायु की कामना करना प्रमुख होता है। इस व्रत को करने से बच्चों का मरण दोष दूर हो जाता है। इस व्रत का अन्य नाम जितिया का व्रत (Jitiya Ka Vrat) भी है। अन्य अपभ्रंश भाषा में इसे कहीं कहीं Jutiya ka Vrat भी कहते हैं। यह व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को किया जाता है।

jivitputrika jitiya ka vrat katha vidhi जीवितपुत्रिका जितिया का व्रत कथा विधि

मुख्य रूप से जीवितपुत्रिका का पर्व तीन दिनों तक चलता है। पहले दिन को नहाई-खाई कहते हैं। नहाई-खाई के दिन माताएं स्नान करने के बाद ही भोजन लेती हैं। दूसरे दिन जितिया का व्रत रखा जाता है। यह व्रत निर्जल यानी कि बिना पानी के रखा जाता है।

Jitiya Vrat ki Jankari in Hindi

01अन्य नाम जीवितपुत्रिका व्रत
02जितिया (Jitiya ka vrat) का व्रत 2019 कब है? वर्ष 2019 में 21 सितंबर से 23 सितंबर तक।
21 सितम्बर 2019 - नहाई-खाई
22 सितंबर 2019 - निर्जल व्रत
23 सितंबर 2019 - व्रत समापन
03जितिया का व्रत किस तिथि को रखा जाता है? मुख्य उपवास आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को किया जाता है।
04जितिया व्रत (Jitiya Vrat) का उद्देश्य सन्तान की दीर्घायु एवं कल्याण
05जितिया व्रत कितने दिन का होता है? तीन दिन का -
1. पहले दिन माताएं स्नान के बाद ही भोजन ग्रहण करती हैं।
2. दूसरे दिन बिन पानी पिए उपवास रखती हैं।
3. तीसरे दिन व्रत का समापन भोजन के साथ होता है जो कि दिन का पहला भोजन होता है जिसे पारन कहा जाता है।
06पारन में क्या क्या होता है? पारन में मुख्य रूप से करी चावल, नोनी का साग और मडुआ की रोटी, और तोरी की सब्जी होती है।
07जीवितपुत्रिका व्रत में किस भगवान् की पूजा होती है? भगवान् सूर्य नारायण की।
08क्या करें, क्या न करें? 1.बाजरा और चने से बने पदार्थ भोग में लगाए ✔️
2.काटे हुए फल और सब्जियां नहीं खानी चाहिये और न ही काटे।

तीसरे दिन व्रत का समापन पारन के साथ होता है जो कि दिन का पहला भोजन होता है। इसमें मुख्य रूप से करी चावल, नोनी का साग और मडुआ की रोटी, और तोरी की सब्जी होती है।

जितिया व्रत विधि (Jitiya Vrat Vidhi)

यह व्रत रखने के लिए यह आवश्यक है कि स्वयं के स्नान करने के पश्चात्‌ भगवान् सूर्य नारायण की मूर्ति को स्नानादि कराने के पश्चात्‌ उन्हें भोग लगाएं और आचमन कराकर धूप एवं दीप से उनकी आरती उतारे। भोग को प्रसाद के रूप में सभी ज़न को बांट दे।

इस दिन बाजरा और चने से बने पदार्थ भोग में लगाए जाते हैं तथा काटे हुए फल और सब्जियां नहीं खानी चाहिये और न ही काटे। इस दिन सूर्य भगवान् की पूजा की जाती है।

जिनके पुत्र तो होते हो परन्तु जीवित नहीं रहते, जीवितपुत्रिका का व्रत (Jitiya Ka Vrat) करने से उनके पुत्र जीवित रहने लगते हैं। इसके साथ ही बच्चों का मरण दोष भी दूर हो जाता है।

जीवितपुत्रिका व्रत की कथा (Jitiya Vrat Ki Katha)

बहुत पहले भगवान् कृष्ण द्वारिकापुरी में रहते थे। उन्हीं दिनों एक ब्राह्मण भी इसी द्वारिकापुरी में रहता था। उसके सात पुत्र थे,जो काल के ग्रास में बचपन में ही समा चुके थे। इस वज़ह से वह ब्राह्मण बहुत दुखी रहता था।

एक दिन वह ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्ण जी के पास गया और उनसे बोला, भगवन्! आपके राज्य में आपकी कृपा से मेरे सात पुत्र हुए लेकिन उनमे से कोई भी जीवित नहीं रह सका। कृपया, आप मुझे इसका कारण बताये?

भगवान् श्री कृष्ण जी महाराज बोले, हे ब्राह्मण! सुनो इस बार तुम्हारे जो सन्तान होगी उसकी आयु तीन वर्ष होगी। उसकी उम्र बढ़ाने के लिए तुम भगवान् सूर्य नारायण की पूजा अर्चना करो और जीवितपुत्रिका (Jitiya Ka Vrat) व्रत को धारण करो। इससे तुम्हारे पुत्र की आयु बढ़ जाएगी।

उस ब्राह्मण ने भगवान् श्री कृष्ण की बातों का अनुसरण किया। एक दिन जब वह सपरिवार हाथ जोड़ और खड़े होकर इस प्रकार विनती कर ही रहा था –

सूर्यदेव विनती सुनो, पाऊँ दुख अपार।

उम्र बढ़ाओ पुत्र की कहता बारंबार॥

उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान् सूर्य देव का रथ वहीं रुक गया। ब्राह्मण की विनती से प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यदेव ने अपने गले से एक माला ब्राह्मण पुत्र के गले में डाल दी और आगे चल दिये।

थोड़ी ही देर बाद यमराज उस ब्राह्मण पुत्र के प्राण हरने आ गए। यमराज को देखकर ब्राह्मण और उसकी पत्नी श्री कृष्ण जी को झूठा कहने लगे। भगवान् श्री कृष्ण इसे अपना अपमान समझकर तुरन्त ही सुदर्शन चक्र लेकर आ गए और बोले, इस माला को यमराज के उपर डाल दो।

यह सुनकर ब्राह्मण ने माला उतारी तो यमराज जी वहां से डर कर भाग गए लेकिन यमराज की छाया वहीं रह गई। उस फूल की माला को यमराज की छाया के उपर फेंकने से वह छाया शनि के रूप में आकर भगवान् श्री कृष्ण जी से प्रार्थना करने लगी।

भगवान् कृष्ण जी को शनि के उपर दया आ गयी और उसे पीपल के वृक्ष पर रहने के लिए कहा। तब से शनि की छाया पीपल के वृक्ष पर निवास करने लगी।

इस प्रकार भगवान् श्री कृष्ण ने उस ब्राह्मण के पुत्र की आयु बढ़ा दी। इसलिए भगवन्! जिस प्रकार से आपने ब्राह्मण के पुत्र की उम्र बढ़ायी उसी प्रकार सभी की उम्र बढ़ाना।

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