अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा (Anant Chaturdashi Vrat Katha)

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अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा (Anant Chaturdashi Vrat Katha) – अनन्त चतुर्दशी का पर्व हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। अनन्त चतुर्दशी के दिन अनन्त देव की पूजा की जाती है। अनन्त देव उस अन्त न होने वाले सृष्टि कर्ता भगवान् विष्णु का ही रूप माने जाते हैं। अनन्त चतुर्दशी व्रत को विपत्ति से उबारने वाला व्रत कहा जाता है।

भगवान विष्णु को समर्पित अन्य प्रमुख व्रतों में वामन द्वादशी व्रत का भी विशेष महत्व माना जाता है, जिसमें भगवान के वामन अवतार की पूजा की जाती है।

अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा (Anant Chaturdashi Vrat Katha)

यदि आप वर्षभर आने वाले प्रमुख व्रत, उनकी पूजा-विधि, कथा और धार्मिक महत्व के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं, तो व्रत एवं पूजा की संपूर्ण जानकारी भी पढ़ सकते हैं।

अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा (Anant Chaturdashi Vrat Katha)

01अनन्त चतुर्दशी (Anant Chaturdashi) 2026 कब है? 25 सितंबर 2026 को।
02अनन्त चतुर्दशी का व्रत कब किया जाता है? भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है।
03अनन्त चतुर्दशी के व्रत के दिन किस भगवान् की पूजा की जाती है? अनंत देव (भगवान् विष्णु) और शेषनाग जी।
04अनन्त चतुर्दशी व्रत की पूजा किस प्रकार से की जाती है? सबसे पहले स्नान करके कलश की स्थापना करते हैं। उसके बाद इस कलश पर अष्ट दल कमल के समान बने हुए बर्तन में कुशा से निर्मित भगवान् अनन्त जी की स्थापना करते हैं।14 गांठें लगाकर हल्दी से रंगे हुए डोरे को समक्ष रखें और गंध, धूप, दीप, पुष्प, अक्षत और नैवेद्य से इसकी पूजा अर्चना कीजिये। इसके बाद भगवान् अनन्त को याद करते हुए शुद्ध अनन्त को अपनी दाहिनी भुजा मे बाँधना चाहिये।

अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा का महत्व

सनातन धर्म में अनन्त चतुर्दशी का विशेष महत्व बताया गया है। यह व्रत भगवान विष्णु के अनन्त स्वरूप को समर्पित है। शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति श्रद्धा और विधि-विधान से यह व्रत करता है, उसके जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और उसे अनन्त फल की प्राप्ति होती है।
अनन्त चतुर्दशी को गणेश उत्सव का समापन दिवस भी माना जाता है। इसी दिन गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है।

गणेश उत्सव की शुरुआत गणेश चतुर्थी से होती है और अनन्त चतुर्दशी के दिन भगवान गणेश की प्रतिमाओं का विधिपूर्वक विसर्जन किया जाता है।

अनन्त चतुर्दशी व्रत में अनन्त सूत्र (अनन्त धागा) का महत्व

यह सूत्र हर संकट से रक्षा करता है। अनन्त राखी के समान सूत या रेशम के धागे का और लाल कुमकुम से रंगा हुआ तथा इस अनंत सूत्र में 14 गांठें लगायी जाती है जो भगवान् श्री हरि विष्णु जी के द्वारा 14 लोकों की प्रतीक मानी गई है।

इस अनन्त रूपी धागे को पूजा में भगवान् विष्णु पर चढ़ाकर अपने बाजू पर बांधते हैं। पुरूष दाएं और स्त्रियां बाएं हाथ मे इसे बांधते है। यह सूत्र अनन्त फल देने वाला होता है। अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा धन और पुत्रादि की कामना से किया जाता है।

धन, ऐश्वर्य और पारिवारिक समृद्धि की कामना से अनेक श्रद्धालु महालक्ष्मी व्रत भी पूरी श्रद्धा के साथ करते हैं।

इस दिन नए डोरे को धारण करके पुराने का विसर्जन किया जाता है। साथ ही इसी दिन गणेश विसर्जन का पर्व भी मनाया जाता है।

अनन्त चतुर्दशी पूजा में अनन्त सूत्र का विशेष महत्व होता है। यह धागा सूत या रेशम का बनाया जाता है और इसे कुमकुम या हल्दी से रंगा जाता है। अनन्त सूत्र में 14 गांठें लगाई जाती हैं, जो निम्नलिखित चौदह लोकों का प्रतीक मानी जाती हैं—

  • भूः
  • भुवः
  • स्वः
  • महः
  • जनः
  • तपः
  • सत्यलोक
  • अतल
  • वितल
  • सुतल
  • तलातल
  • महातल
  • रसातल
  • पाताल

पूजा के बाद पुरुष इसे दाहिने हाथ में तथा महिलाएं बाएं हाथ में धारण करती हैं।

अनन्त चतुर्दशी व्रत की पूजा का मंत्र

निम्नलिखित मंत्र द्वारा पूजा करनी चाहिए। अनन्त चतुर्दशी व्रत में विष्णु जी और शेषनाग जी दोनों की एक साथ पूजा की जाती है।

अनन्त सर्व नागानामधिपः सर्वकामदः।

सदा भूयात प्रसन्नोमे यक्तानामभयंकरः॥

अनन्त चतुर्दशी व्रत की पूजा सामग्री

पूजा के लिए निम्न सामग्री की आवश्यकता होती है—

  • कलश
  • कुशा
  • पीला या लाल धागा
  • हल्दी
  • कुमकुम
  • अक्षत
  • पुष्प
  • धूप
  • दीपक
  • नैवेद्य
  • पंचामृत
  • भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र

अनन्त चतुर्दशी पूजा विधि (Anant Chaturdashi Puja Vidhi)

  • सबसे पहले स्नान करके कलश की स्थापना करते हैं।
  • उसके बाद इस कलश पर अष्ट दल कमल के समान बने हुए बर्तन में कुशा से निर्मित भगवान् अनन्त जी की स्थापना करते हैं।
  • 14 गांठें लगाकर हल्दी से रंगे हुए डोरे को समक्ष रखें।
  • गंध, धूप, दीप, पुष्प, अक्षत और नैवेद्य से इसकी पूजा अर्चना कीजिये।
  • भगवान विष्णु और शेषनाग का ध्यान करें।
  • इसके बाद भगवान् अनन्त को याद करते हुए शुद्ध अनन्त को अपनी दाहिनी भुजा मे बाँधना चाहिये।
  • यह धागा अनन्त फल देने वाला है। अनन्त की 14 गांठें चौदह लोकों की प्रतीक हैं जिनमे अनन्त भगवान् साक्षात विद्यमान हैं।

अनन्त चतुर्दशी व्रत की कथा (Anant Chaturdashi Vrat Katha In Hindi)

एक बार महाराज युधिष्ठिर ने राज सूर्य यज्ञ किया। यज्ञ मंडप का निर्माण बहुत ही अद्भुत और सुन्दर था। इसमे स्थल में जल और जल में स्थल का आभास होता था। साथ ही यज्ञ मंडप की शोभा देखते ही बनती थी।

दुर्योधन एक जगह को स्थल समझकर कुंड में जा गिरा। द्रोपदी ने उसका मज़ाक बनाते हुए कहा कि अंधे की सन्तान भी अंधी ही है। इस कटु वचन ने दुर्योधन के हृदय पर बाण का काम किया।

कुछ ही दिनों के बाद इसका प्रतिशोध लेने के लिए पांडवों को हस्तिनापुर बुलाकर धूत क्रीड़ा मे छल से पांडवों को परास्त किया। इसके बाद पांडवों को 12 वर्ष का वनवास भोगना पड़ा। जिसकी वज़ह से वन में रहते हुए पांडवों को अनेक कष्ट उठाने पड़े थे।

एक दिन युधिष्ठिर से मिलने भगवान् श्री कृष्ण जी आए। युधिष्ठिर ने उनसे सारी बात कह डाली और इस विपत्ति को दूर करने का उपाय जानना चाहा। तब भगवान् श्री कृष्ण जी ने उन्हें श्री अनन्त चतुर्दशी का व्रत करने को कहा।

उन्होंने कहा कि इससे तुम्हारा खोया हुआ राज पाठ फिर से प्राप्त हो जाएगा। इसके बाद श्री कृष्ण जी ने युधिष्ठिर को एक कथा सुनायी।

कौण्डिन्य ऋषि और सुशीला की कथा

प्राचीन काल में एक ब्राह्मण की एक कन्या थी जिसका नाम सुशीला था। विवाह योग्य होने पर पिता ने सुशीला का विवाह कौण्डिनय ऋषि से कर दिया। कौण्डिनय ऋषि कन्या को साथ में लेकर अपने आश्रम की ओर चले गए।

रास्ते में रात्रि हो जाने पर वे एक नदी के किनारे ही संध्या करने लगे। सुशीला के पूछने पर उन्होंने विधिपूर्वक अनन्त चतुर्दशी व्रत की महत्ता समझा दी।

सुशीला ने उसी स्थान पर अनन्त चतुर्दशी व्रत का अनुष्ठान करके 14 गांठों वाला डोरा हाथ में बाँध लिया और अपने पति परमेश्वर के पास आ गयी। कौण्डिनय ऋषि ने सुशीला के हाथ में बंधे डोरे के बारे में पूछा तो उसने सारी बात बता दी।

कौण्डिनय ऋषि अपनी पत्नी सुशीला की बातों को सुनकर अप्रसन्न हो गए तथा उसके हाथ में बंधे हुए धागे को अग्नि में डाल दिया। यह अनन्त भगवान् का अपमान था।

फलस्वरूप, कौण्डिनय ऋषि की सारी सुख संपति नष्ट हो गई। सुशीला ने इसका कारण डोरे को जलाना बताया।

पश्चाताप करते हुए ऋषि कौण्डिनय भगवान् अनन्त को ढूंढते हुए वन में चले गए। जब वे वन में भटकते हुए निराश होकर गिरकर बेहोश हो गए तो भगवान् अनन्त उन्हें दर्शन देकर बोले कि हे कौण्डिनय! मेरे अपमान के कारण ही तुम्हारे ऊपर यह विपत्ति आयी है और तुम्हारे इस पश्चाताप की वज़ह से मैं प्रसन्न हूं। तुम आश्रम में जाकर 14 वर्ष तक विधिपूर्वक अनन्त चतुर्दशी व्रत करो।

कौण्डिनय ऋषि ने वैसा ही किया उनके सारे कष्ट दूर हो गए और बाद में उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। श्री कृष्ण भगवान् की आज्ञा पाकर युधिष्ठिर ने अनन्त चतुर्दशी का व्रत किया जिसके बाद पांडवों को महाभारत युद्ध में विजय प्राप्त हुई।

अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा के लाभ

  • जीवन के संकट और बाधाएं दूर होती हैं।
  • धन, वैभव और समृद्धि में वृद्धि होती है।
  • परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
  • भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
  • मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
  • आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।

अनन्त चतुर्दशी से जुड़े सामान्य प्रश्न (FAQ)

अनन्त चतुर्दशी व्रत 2026 में कब है?

अनन्त चतुर्दशी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाएगी। तिथि का निर्धारण पंचांग के अनुसार करें।

अनन्त सूत्र में 14 गांठें क्यों लगाई जाती हैं?

ये 14 गांठें चौदह लोकों का प्रतीक मानी जाती हैं और भगवान विष्णु की अनन्त शक्ति को दर्शाती हैं।

अनन्त सूत्र किस हाथ में बांधते हैं?

पुरुष दाहिने हाथ में तथा महिलाएं बाएं हाथ में अनन्त सूत्र धारण करती हैं।

क्या अनन्त चतुर्दशी व्रत के दिन गणेश विसर्जन होता है?

हाँ, गणेश उत्सव का समापन अनन्त चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन के साथ होता है।

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PUNIT NAGAR
पुनीत नागर JSBJM.org के संस्थापक और लेखक हैं। वे मेहंदीपुर बालाजी धाम, मंदिर से जुड़ी धार्मिक परंपराओं, दर्शन, अर्जी-दरखास्त, हनुमान भक्ति और सनातन धर्म से संबंधित विषयों पर हिंदी में लेख लिखते हैं। उनका प्रयास उपलब्ध आधिकारिक एवं विश्वसनीय स्रोतों, शोध सामग्री, पुस्तकों तथा संबंधित धार्मिक और स्थानीय परंपराओं के संदर्भ में जानकारी को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है। जहाँ किसी जानकारी का आधार धार्मिक मान्यता या स्थानीय परंपरा होता है, उसे उसी संदर्भ में स्पष्ट करने का प्रयास किया जाता है।

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