Home Vrat Aur Tyohar अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा (Anant Chaturdashi Vrat Katha)

अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा (Anant Chaturdashi Vrat Katha)

0
2103

अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा (Anant Chaturdashi Vrat Katha) – अनन्त चतुर्दशी का पर्व हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। अनन्त चतुर्दशी के दिन अनन्त देव की पूजा की जाती है। अनन्त देव उस अन्त न होने वाले सृष्टि कर्ता भगवान् विष्णु का ही रूप माने जाते हैं। अनन्त चतुर्दशी व्रत को विपत्ति से उबारने वाला व्रत कहा जाता है।

अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा (Anant Chaturdashi Vrat Katha)

अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा (Anant Chaturdashi Vrat Katha)

01अनन्त चतुर्दशी (Anant Chaturdashi) 2019 कब है? 12 सितंबर 2019 को।
02अनन्त चतुर्दशी का व्रत कब किया जाता है? भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है।
03अनन्त चतुर्दशी के व्रत के दिन किस भगवान् की पूजा की जाती है? अनंत देव (भगवान् विष्णु) और शेषनाग जी।
04अनन्त चतुर्दशी व्रत की पूजा किस प्रकार से की जाती है? सबसे पहले स्नान करके कलश की स्थापना करते हैं। उसके बाद इस कलश पर अष्ट दल कमल के समान बने हुए बर्तन में कुशा से निर्मित भगवान् अनन्त जी की स्थापना करते हैं।14 गांठें लगाकर हल्दी से रंगे हुए डोरे को समक्ष रखें और गंध, धूप, दीप, पुष्प, अक्षत और नैवेद्य से इसकी पूजा अर्चना कीजिये। इसके बाद भगवान् अनन्त को याद करते हुए शुद्ध अनन्त को अपनी दाहिनी भुजा मे बाँधना चाहिये।

इस पूजा में अनन्त सूत्र का विशेष महत्व है। इस दिन भगवान् अनन्त देव को सूत्र चढ़ाया जाता है। पूजा के बाद इस सूत्र को रक्षा सूत्र अथवा अनंत देव के तुल्य मानकर हाथ में धारण किया जाता है।

यह सूत्र हर संकट से रक्षा करता है। अनन्त राखी के समान सूत या रेशम के धागे का और लाल कुमकुम से रंगा हुआ तथा इस अनंत सूत्र में 14 गांठें लगायी जाती है जो भगवान् श्री हरि विष्णु जी के द्वारा 14 लोकों की प्रतीक मानी गई है।

इस अनन्त रूपी धागे को पूजा में भगवान् विष्णु पर चढ़ाकर अपने बाजू पर बांधते हैं। पुरूष दाएं और स्त्रियां बाएं हाथ मे इसे बांधते है। यह सूत्र अनन्त फल देने वाला होता है। अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा धन और पुत्रादि की कामना से किया जाता है।

इस दिन नए डोरे को धारण करके पुराने का विसर्जन किया जाता है। साथ ही इसी दिन गणेश विसर्जन का पर्व भी मनाया जाता है।

अनन्त चतुर्दशी की पूजा का मंत्र

निम्नलिखित मंत्र द्वारा पूजा करनी चाहिए। अनन्त चतुर्दशी व्रत में विष्णु जी और शेषनाग जी दोनों की एक साथ पूजा की जाती है।

अनन्त सर्व नागानामधिपः सर्वकामदः।

सदा भूयात प्रसन्नोमे यक्तानामभयंकरः॥

अनन्त चतुर्दशी पूजा विधि (Anant Chaturdashi Puja Vidhi)

  • सबसे पहले स्नान करके कलश की स्थापना करते हैं। उसके बाद इस कलश पर अष्ट दल कमल के समान बने हुए बर्तन में कुशा से निर्मित भगवान् अनन्त जी की स्थापना करते हैं।
  • 14 गांठें लगाकर हल्दी से रंगे हुए डोरे को समक्ष रखें और गंध, धूप, दीप, पुष्प, अक्षत और नैवेद्य से इसकी पूजा अर्चना कीजिये।
  • इसके बाद भगवान् अनन्त को याद करते हुए शुद्ध अनन्त को अपनी दाहिनी भुजा मे बाँधना चाहिये। यह धागा अनन्त फल देने वाला है। अनन्त की 14 गांठें चौदह लोकों की प्रतीक हैं जिनमे अनन्त भगवान् साक्षात विद्यमान हैं।

अनन्त चतुर्दशी व्रत की कथा (Anant Chaturdashi Vrat Katha)

एक बार महाराज युधिष्ठिर ने राज सूर्य यज्ञ किया। यज्ञ मंडप का निर्माण बहुत ही अद्भुत और सुन्दर था। इसमे स्थल में जल और जल में स्थल का आभास होता था। साथ ही यज्ञ मंडप की शोभा देखते ही बनती थी।

दुर्योधन एक जगह को स्थल समझकर कुंड में जा गिरा। द्रोपदी ने उसका मज़ाक बनाते हुए कहा कि अंधे की सन्तान भी अंधी ही है। इस कटु वचन ने दुर्योधन के हृदय पर बाण का काम किया।

कुछ ही दिनों के बाद इसका प्रतिशोध लेने के लिए पांडवों को हस्तिनापुर बुलाकर धूत क्रीड़ा मे छल से पांडवों को परास्त किया। इसके बाद पांडवों को 12 वर्ष का वनवास भोगना पड़ा। जिसकी वज़ह से वन में रहते हुए पांडवों को अनेक कष्ट उठाने पड़े थे।

एक दिन युधिष्ठिर से मिलने भगवान् श्री कृष्ण जी आए। युधिष्ठिर ने उनसे सारी बात कह डाली और इस विपत्ति को दूर करने का उपाय जानना चाहा। तब भगवान् श्री कृष्ण जी ने उन्हें श्री अनन्त चतुर्दशी का व्रत करने को कहा।

उन्होंने कहा कि इससे तुम्हारा खोया हुआ राज पाठ फिर से प्राप्त हो जाएगा। इसके बाद श्री कृष्ण जी ने युधिष्ठिर को एक कथा सुनायी।

प्राचीन काल में एक ब्राह्मण की एक कन्या थी जिसका नाम सुशीला था। विवाह योग्य होने पर पिता ने सुशीला का विवाह कौण्डिनय ऋषि से कर दिया। कौण्डिनय ऋषि कन्या को साथ में लेकर अपने आश्रम की ओर चले गए।

रास्ते में रात्रि हो जाने पर वे एक नदी के किनारे ही संध्या करने लगे। सुशीला के पूछने पर उन्होंने विधिपूर्वक अनन्त चतुर्दशी व्रत की महत्ता समझा दी।

सुशीला ने उसी स्थान पर अनन्त चतुर्दशी व्रत का अनुष्ठान करके 14 गांठों वाला डोरा हाथ में बाँध लिया और अपने पति परमेश्वर के पास आ गयी। कौण्डिनय ऋषि ने सुशीला के हाथ में बंधे डोरे के बारे में पूछा तो उसने सारी बात बता दी।

कौण्डिनय ऋषि अपनी पत्नी सुशीला की बातों को सुनकर अप्रसन्न हो गए तथा उसके हाथ में बंधे हुए धागे को अग्नि में डाल दिया। यह अनन्त भगवान् का अपमान था।

फलस्वरूप, कौण्डिनय ऋषि की सारी सुख संपति नष्ट हो गई। सुशीला ने इसका कारण डोरे को जलाना बताया।

पश्चाताप करते हुए ऋषि कौण्डिनय भगवान् अनन्त को ढूंढते हुए वन में चले गए। जब वे वन में भटकते हुए निराश होकर गिरकर बेहोश हो गए तो भगवान् अनन्त उन्हें दर्शन देकर बोले कि हे कौण्डिनय! मेरे अपमान के कारण ही तुम्हारे ऊपर यह विपत्ति आयी है और तुम्हारे इस पश्चाताप की वज़ह से मैं प्रसन्न हूं। तुम आश्रम में जाकर 14 वर्ष तक विधिपूर्वक अनन्त चतुर्दशी व्रत करो।

कौण्डिनय ऋषि ने वैसा ही किया उनके सारे कष्ट दूर हो गए और बाद में उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। श्री कृष्ण भगवान् की आज्ञा पाकर युधिष्ठिर ने अनन्त चतुर्दशी का व्रत किया जिसके बाद पांडवों को महाभारत युद्ध में विजय प्राप्त हुई।

यह भी पढ़ें :-

उमा महेश्वर व्रत कथा (Uma Maheshwar Vrat Katha)

गाज माता व्रत कथा (Gaaj Mata Ki Vrat Katha)

पितृपक्ष कनागत में श्राद्ध करने की विधि – सबसे आसान और सुलभ तरीका।

जितिया|जीवितपुत्रिका|व्रत कथा एवं विधि – Jitiya ka Vrat, Katha, Vidhi In Hindi

आशा भगोती का व्रत, विधि, कहानी (Asha Bhagoti Ka Vrat Vidhi Kahani)

इन्दिरा एकादशी व्रत कथा (Indira Ekadashi Vrat Katha In Hindi)