कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष क्या होता है और इसके उपाय क्या हैं?

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कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष क्या है? हिंदू पंचांग में प्रत्येक माह को दो पक्षों में बांटा गया है—कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। पूजा-पाठ, व्रत, शुभ कार्य और ज्योतिषीय निर्णयों में इन दोनों पक्षों का विशेष महत्व माना जाता है।

इस पोस्ट में जानेंगे कि कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष क्या होते हैं, दोनों में क्या अंतर है, ये कब शुरू होते हैं और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शुभ कार्यों के लिए किस पक्ष को अधिक उपयुक्त माना जाता है।

किसी भी प्रकार का कार्य करने से आपके जीवन मे प्रगति आती है या आप किसी भी तरह का उपाय करते हैं या पूजा करते हैं या रत्न धारण भी करते हैं या फिर ज्योतिषीय सलाह से विवाह हेतु लड़का या लड़की देखने जाते हैं तो शुक्ल पक्ष को ही महत्व दिया जाता है।

विषय जानकारी
मुख्य विषय कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष
आधार हिंदू पंचांग एवं धार्मिक मान्यताएं
क्या जानेंगे दोनों पक्षों का अंतर, आरंभ और धार्मिक महत्व
उपयोग शुभ कार्य, पूजा, व्रत एवं ज्योतिषीय निर्णय

कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष

कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष क्या है?

वहीं कृष्ण पक्ष जो कि भगवान् श्री कृष्ण जी के जन्म के साथ शुरू हुआ था।

परन्तु यही कहा जाता है कि कृष्ण पक्ष चूंकि हम मानव हैं तो हमारे लिए यह उतना उत्तम नहीं होता है जितना कि यह होना चाहिए।

कृष्ण पक्ष मे बहुत से कार्यों पर रोक लगाई जाती है।

हमारे बड़े बूढ़ों द्वारा भी कुछ ऐसी ही सलाह दी जाती है जैसे अगर नयी दुकान या कारोबार शुरू करना हो, नया वाहन खरीदने जा रहे हो या फिर शरीर पर कोई रत्न धारण करना हो तो वो कृष्ण पक्ष मे नही करना चाहिए।

कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में क्या अंतर है?

कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष हिन्दू पंचांग के दो महत्वपूर्ण भाग हैं। पूर्णिमा के बाद चंद्रमा का आकार धीरे-धीरे घटता है, इस अवधि को कृष्ण पक्ष कहा जाता है। वहीं अमावस्या के बाद चंद्रमा का आकार बढ़ना शुरू होता है, जिसे शुक्ल पक्ष कहते हैं।

कृष्ण पक्षशुक्ल पक्ष
पूर्णिमा से अमावस्या तकअमावस्या से पूर्णिमा तक
चंद्रमा घटता हैचंद्रमा बढ़ता है
अंधकार बढ़ता हैप्रकाश बढ़ता है
अंतिम तिथि अमावस्याअंतिम तिथि पूर्णिमा

सभी जानते हैं कि एक माह मे 30 दिन होते हैं। ये जो 30 दिन होते हैं इन्हें हिन्दू पंचांग के हिसाब से दो भागों मे विभाजित किया गया है जो कि दो पक्ष होते हैं। इन्हीं दो पक्षों को कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष कहा जाता है।

शुक्ल पक्ष कब शुरू होता है?

जब आपको इसके बारे में नहीं पता चल पाता है या आपके पास हिन्दी पंचांग या कैलेंडर नहीं होता है तो सिर्फ और सिर्फ चन्द्रमा की घटने की कलाओं और बड़ने के आधार पर इनका अनुमान बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है।

15 दिनों मे पूनम यानि पूर्णिमा आती है और इस दिन चण्द्रमा हमे अपने पूरे रूप आकार मे दिखाई देता है तभी इसे अंग्रेजी मे full Moon कहते हैं ।

धीरे धीरे नित प्रतिदिन अमावस्या से बढ़ता हुआ चांद पूर्णिमा आते आते अपने पूर्ण आकार में आ जाता है इस अवधि को शुक्ल पक्ष कहते हैं।

अमावस्या के अगले दिन से ही शुक्ल पक्ष का आरम्भ हो जाता है।

चंद्रमा अपने बल को मजबूत करता है और यह हमारे मन का स्वामी होता है इसी कारण से सभी लोग शुभ कार्यो का निष्पादन शुक्ल पक्ष मे करते हैं।

सभी ज्योतिषी सलाह और शुभ कार्यों को करने की अनुमति भी इसी शुक्ल पक्ष मे करने के लिए दी जाती है।

कृष्ण पक्ष कब शुरू होता है?

अब हम बात करेंगे कृष्ण पक्ष की। जब पूनम यानि पूर्णिमा होती है वो शुक्ल पक्ष का ही दिन कहलाता है परन्तु इसके अगले दिन से जब चंद्र की कलाएं धीरे-धीरे घटने लगती हैं अर्थात् चंद्रमा अपने आकार को धीरे-धीरे घटाने लगता है इसे कृष्ण पक्ष कहा जाता है यानि चंद्रमा का बल कमजोर होने लगता है।

इन दिनों रातें अंधेरी होने लगती है और हमारा मन विचलित होने लगता है।

चूंकि, जैसे आपको बताया कि चन्द्रमा हमारे मन का कारक होता है इसलिए कृष्ण पक्ष मे शुभ कार्यो को करने का परहेज किया जाता है।

कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष मे से शुक्ल पक्ष को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

शुक्ल पक्ष मे शुरू किया गया शुभ कार्य आपको अंत तक लेकर जाता है, शुभता प्रदान करता है और सफलता दिलाता है।

अगर आप कोई ज्योतिषीय रत्न को धारण करते हैं तो इसी समय को श्रेष्ठ कहा जाता है क्योंकि आपका बल और मन दोनों ही मजबूत होते हैं क्योंकि चंद्रमा आपकी मानसिक बीमारियों और चिंताओं को दूर करता है।

आपको बस इतना ध्यान देना होता है कि चंद्रमा की कलाएं बढ़ रही है या घट रही है।

इसी बात से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कौन सा पक्ष चल रहा है कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष ।

शुक्ल पक्ष के बहुत सारे उपाय भी हमारे जीवन में समृद्धि का वास करते हैं।

आप आर्थिक समस्याओं से छुटकारा चाहते हैं या फिर आप बहुत परेशान हैं धन को लेकर तो आपको शुक्ल पक्ष के शुक्रवार से एक उपाय करना है जो कि 21 शुक्रवार तक लगातार करना है।

9 वर्ष से कम आयु की पांच कन्याओं को खीर और मिश्री का प्रसाद दे। जरूरी नहीं कि आप ये अपने ही घर पर दे आप इसे बाहर जाकर या मंदिर मे भी दे सकते हैं।

कन्याओं को खीर और मिश्री खिलाने से माता लक्ष्मी की कृपा आती है और समृद्धि आती है।

अगर आप काफी परेशान रहते हैं तो आप शुक्ल पक्ष के रविवार से एक तांबे के पात्र में जल भरकर उसमे थोड़ा सा लाल चंदन मिला दे।

इस पात्र को रात्रि में अपने सिरहाने रखकर सो जाए तथा सुबह इस जल को तुलसी के पौधे पर चढ़ा दे।

धीरे-धीरे जीवन की सारी परेशानियां समाप्त होकर आपके जीवन मे धन का आगमन शुरू करेंगी।

अगर आप अपने व्यापार को बढ़ाना चाहते हैं तो शुक्ल पक्ष के समय को बहुत ही उत्तम माना जाता है।

यदि आपको लगता है कि आपके व्यापार या फैक्ट्री मे बहुत ज्यादा नुकसान हो रहा है तो आपको क्या करना है दरवाजे के बाहर थोड़ा सा गेहूं का आटा रखकर छोड़ देंगे।

लेकिन ऐसा करते हुए कोई आपको ना देख पाए। बस यही एक नियम है।

यह उपाय आपको शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार से शुरू करना है और लगातार करते रहे जितने भी गुरुवार इसे आप कर सकते हैं।

इससे जीवन मे खुशहाली आएगी, धन का आगमन होगा, व्यापार मे वृद्धि होगी।

इससे बंद हुई फैक्ट्री भी दुबारा चालू हो जाती है। यह एक छोटा सा लेकिन बहुत ही कारगर उपाय है।

अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान के पूजा घर में श्री यंत्र जरूर रखे क्योंकि यह लक्ष्मी जी का ही स्वरूप माना जाता है।

शुक्ल पक्ष की शुक्रवार की रात को काले चने भिगोकर रख दे और दूसरे ही दिन शनिवार को इसे सरसों के तेल मे बना ले और इसे तीन हिस्सों में बांट ले।

एक हिस्सा घोड़े या भैंस को खिला दे। दूसरा हिस्सा कुष्ठ रोगी को दे और तीसरा हिस्सा सिर से घड़ी की उल्टी सुई की तरफ यानि anti clock wise तीन बार घुमा कर किसी चौराहे पर रख देना है।

यह प्रयोग चालीस दिनों तक करे। इससे आप देखेंगे कि आपको कारोबार में लाभ होना शुरू होने लगेगा।

अगर नौकरी ना टिकती हो या नौकरी में परेशानी आती हो, झगड़े बहुत होते हो तो शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार को मीठी बूंदी का प्रसाद लेकर मंदिर में जाए और पंडित जी को दे।

पंडित जी से इसका प्रसाद लेकर थोड़ी बूंदी वही बच्चों मे लड़कियों को बांट दे।

ऐसा चार मंगलवार तक लगातार करने पर आपके जीवन मे नौकरी का शुभ समाचार आपको प्राप्त होगा तथा आपके कार्य बनने लगेंगे और मनचाही नौकरी प्राप्त होगी।

निष्कर्ष

कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष हिंदू पंचांग के दो महत्वपूर्ण भाग हैं, जिनका उपयोग तिथि, व्रत, पर्व और अनेक धार्मिक कार्यों के निर्धारण में किया जाता है। सामान्य धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शुक्ल पक्ष को शुभ कार्यों के लिए अधिक अनुकूल माना जाता है, जबकि कृष्ण पक्ष का भी अपना अलग धार्मिक महत्व है।

यदि आप पंचांग और सनातन धर्म की परंपराओं को समझना चाहते हैं, तो इन दोनों पक्षों का ज्ञान आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगा।

यदि आपके मन में भोजन और धर्म से जुड़ा यह प्रश्न भी है कि मांसाहार पुण्य है या पाप, तो इस विषय पर हमारी विस्तृत पोस्ट अवश्य पढ़ें, जिसमें सनातन धर्म की मान्यताओं के आधार पर विस्तार से जानकारी दी गई है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q. कृष्ण पक्ष में चंद्रमा बढ़ता है या घटता है?
उत्तर: कृष्ण पक्ष में चंद्रमा का आकार और प्रकाश घटता है।

Q. शुक्ल पक्ष कब शुरू होता है?
उत्तर: शुक्ल पक्ष अमावस्या के अगले दिन से शुरू होता है।

Q. कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में कौन सा शुभ माना जाता है?
उत्तर: सामान्यतः शुक्ल पक्ष को शुभ कार्यों के लिए अधिक उपयुक्त माना जाता है।

यदि पूजा करते समय आपकी आंखों से आंसू आते हैं, बार-बार उबासी आती है या नींद महसूस होती है और आप इसका आध्यात्मिक कारण जानना चाहते हैं, तो पूजा करते समय आंखें नम, आंसू, नींद और उबासी विषय पर हमारी विस्तृत पोस्ट भी पढ़ें।

इस पोस्ट से हमें क्या समझना चाहिए?

कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष केवल चंद्रमा की कलाओं का परिवर्तन नहीं हैं, बल्कि हिंदू पंचांग का महत्वपूर्ण हिस्सा भी हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विभिन्न पूजा-पाठ, व्रत और शुभ कार्यों में इनका विशेष महत्व माना जाता है।

किसी भी शुभ कार्य से पहले केवल पक्ष ही नहीं, बल्कि तिथि, वार, नक्षत्र और व्यक्तिगत परिस्थितियों का भी ध्यान रखना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो किसी योग्य विद्वान या ज्योतिषाचार्य की सलाह लेना अधिक उचित माना जाता है।

यदि आप भगवान श्रीराम के जीवन और उनके दिव्य चरित्र से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी जानना चाहते हैं, तो रामायण कितनी लिखी गई विषय पर हमारी विस्तृत पोस्ट भी अवश्य पढ़ें।


धार्मिक ज्ञान से जुड़ी और जानकारी पढ़ें

यदि आप सनातन धर्म, हिंदू पंचांग, भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण, पूजा-पद्धति, कर्म और जीवन दर्शन से जुड़े ऐसे ही ज्ञानवर्धक विषय विस्तार से पढ़ना चाहते हैं, तो धार्मिक ज्ञान एवं जीवन दर्शन अवश्य पढ़ें। इस पिलर पोस्ट में आपको इस विषय से संबंधित सभी महत्वपूर्ण पोस्ट एक ही स्थान पर मिल जाएंगी।

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PUNIT NAGAR
पुनीत नागर JSBJM.org के संस्थापक और लेखक हैं। वे मेहंदीपुर बालाजी धाम, मंदिर से जुड़ी धार्मिक परंपराओं, दर्शन, अर्जी-दरखास्त, हनुमान भक्ति और सनातन धर्म से संबंधित विषयों पर हिंदी में लेख लिखते हैं। उनका प्रयास उपलब्ध आधिकारिक एवं विश्वसनीय स्रोतों, शोध सामग्री, पुस्तकों तथा संबंधित धार्मिक और स्थानीय परंपराओं के संदर्भ में जानकारी को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है। जहाँ किसी जानकारी का आधार धार्मिक मान्यता या स्थानीय परंपरा होता है, उसे उसी संदर्भ में स्पष्ट करने का प्रयास किया जाता है।

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