महालक्ष्मी व्रत कथा पूजन (Mahalakshmi Vrat katha Pujan) – राधा अष्टमी के ही दिन यह व्रत किया जाता है अर्थात भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को महालक्ष्मी व्रत किया जाता है। इस व्रत को 16 दिन तक रखते हैं। निम्न मंत्र को पढ़कर संकल्प करना चाहिए।
करिष्येऽहं महालक्ष्मी व्रतते त्वत्मरायणा।
अविघ्नेन मे मातु समाप्तिं त्वत् प्रसादतः॥
हे देवी! मैं आपकी सेवा में तत्पर होकर आपके इस महा व्रत का पालन करूंगी। आपकी कृपा से यह व्रत और महालक्ष्मी व्रत कथा बिना विघ्नों के पूर्ण हो।
महालक्ष्मी व्रत कथा पूजन - Mahalakshmi Vrat Katha Pujan In Hindi
| 01 | महालक्ष्मी व्रत कब है 2019 ? | 06 सितंबर 2019 को |
| 02 | महालक्ष्मी व्रत कब तक चलता है? | भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर आश्विन कृष्ण अष्टमी तक। |
| 03 | महालक्ष्मी व्रत की सामग्री क्या है? | चंदन, तालपत्र, पुष्पमाला, अक्षत, दूर्वा, लाल सूत, सुपारी, नारियल |
| 04 | शामिल किए गए विषय - | महालक्ष्मी पूजन, महालक्ष्मी व्रत कथा हिन्दी में, महालक्ष्मी व्रत की कहानी, महालक्ष्मी व्रत 2019, महालक्ष्मी फोटो । |
महालक्ष्मी व्रत कैसे करें?
सोलह तार का डोरा लेकर उसमें 16 गांठ लगा लीजिये। उसके बाद हल्दी की गांठ घिसकर डोरे को रंग लीजिए। रंगने के बाद डोरे को हाथ की कलाई में बाँध लीजिये।

महालक्ष्मी व्रत आश्विन कृष्ण अष्टमी तक चलता है। व्रत पूजा हो जाने पर वस्त्र से एक मंडप बनाए। उसमें लक्ष्मी जी की प्रतिमा रखें। प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराये और 16 प्रकार से पूजा करावें।
रात्रि में तारागण को पृथ्वी के प्रति अर्ध्य देवे और लक्ष्मी जी से प्रार्थना करें। व्रत रखने वाली स्त्री ब्राह्मणों को भोजन कराएं। उनसे हवन कराए और खीर की आहुति दें।
चंदन, तालपत्र, पुष्पमाला, अक्षत, दूर्वा, लाल सूत, सुपारी, नारियल तथा नाना प्रकार के पदार्थ, नए सूप में 16-16 की संख्या में रखें, फिर नए दूसरे सूप को ढककर निम्न मंत्र को पढ़कर लक्ष्मी जी को अर्पण करें।
क्षीरोदार्णवसम्भूता लक्ष्मीश्चन्दसहोदरा।
व्रतेनानेन सन्तुष्टा भव भर्तोवपुबल्लभा॥
“क्षीरसागर में प्रगट हुई लक्ष्मी, चंद्रमा की बहन, श्रीविष्णुवल्लभा, महालक्ष्मी इस व्रत से संतुष्ट हों।”
इसके बाद चार ब्राह्मण और 16 ब्राह्मणी को भोजन कराएं और दक्षिणा देकर विदा करें। उसके बाद स्वयं भोजन ग्रहण करें। इसी प्रकार से जो लोग व्रत करते हैं, वे लोग इस लोक में सुख भोगकर अन्त समय में अधिक समय तक लक्ष्मी लोक में सुख की प्राप्ति करते हैं।
महालक्ष्मी व्रत की कथा
एक समय महर्षि व्यास जी हस्तिनापुर पधारे तो महाराज धृतराष्ट्र उनका आदर सत्कार कर राजमहल में ले आए। तब गांधारी व माता कुन्ती ने हाथ जोड़कर कहा, हे महामुनि! आप त्रिकालदर्शी हैं, अतः आप हमको कोई ऐसा सरल व्रत या पूजन बताइए जिससे हमारी राज्य लक्ष्मी, सुख, पुत्र, पौत्र व परिवार सदा सुखी रहे।
तब व्यास जी ने कहा कि मैं एक ऐसे व्रत का वर्णन करता हूं, जिससे घर में लक्ष्मी जी का निवास होकर सुख – वैभव की वृद्धि होगी, वह महालक्ष्मी का व्रत है जो प्रतिवर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी को किया जाता है।
हे महामुनि! इस महालक्ष्मी व्रत की विधि हमें सविस्तार बताने की कृपा करें। तब व्यासजी बोले, हे देवी। यह व्रत भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से आरम्भ करे।
इस दिन सुबह मन में व्रत का संकल्प कर किसी पवित्र जलाशय, नदी, तालाब, कूप जल से स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें। फिर ताजा दूब से महालक्ष्मी को जल छिड़ककर स्नान कराएं।
फिर 16 धागों का गंडा बनाकर प्रतिदिन एक एक गांठ लगाए। इसी प्रकार 16 दिन तक 16 गांठ का गंडा तैयार कर आश्विन कृष्ण अष्टमी को व्रत करे। मंडप बना उसके नीचे मिट्टी के हाथी पर श्री महालक्ष्मी प्रतिमा स्थापित करके पुष्प मालाओं से लक्ष्मी जी व हाथी का पूजन कर अनेकों प्रकार के पकवान नैवेद्य समर्पित करें और महालक्ष्मी व्रत कथा करें।
इस प्रकार श्रद्धा भक्ति सहित महालक्ष्मी व्रत पूजन करने से आप लोगों की राज्य लक्ष्मी सदा स्थिर बनी रहेगी। इस प्रकार महालक्ष्मी व्रत का विधान बताकर व्यासजी अपने आश्रम को आ गए।
इधर समयानुसार भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से राज घराने व नगर की समस्त नारियों ने श्री महालक्ष्मी व्रत को आरम्भ कर दिया। बहुत सी स्त्रियां गांधारी के साथ इस व्रत में साथ देने लगी तथा कुछ स्त्रियां माता कुन्ती के साथ व्रत आरम्भ करने लगी।
इस कारण गांधारी व कुन्ती में कुछ द्वेषभाव चलने लगा। ऐसा होते होते जब व्रत का सोलहवां दिन आश्विन कृष्ण अष्टमी का आया तो उस दिन प्रातः काल से ही नगर की स्त्रियों ने उत्सव मनाना शुरू कर दिया और सभी नर नारी राजमहल में गांधारी के यहा आकर तरह-तरह के महालक्ष्मी के मंडप और मिट्टी के हाथी बनाने लगे।
गांधारी ने नगर की सभी प्रतिष्ठित स्त्रियों को बुलाने के लिए सेवक भेजा। परन्तु माता कुन्ती को नहीं बुलाया। राजमहल में वाद्यों की ध्वनि गूंजने लगी और सारे हस्तिनापुर में खुशी मनायी जा रही थी।
इधर माता कुन्ती ने अपना अपमान समझकर बड़ा रंज मनाया और व्रत की तैयारी नहीं की। इतने में महाराज युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव पांचों पाण्डव उपस्थित हुए। अपनी माता को रंज में उदास देख अर्जुन बोला, हे माता! आप इतनी दुःखी क्यों हो?
तब माता कुन्ती ने कहा, हे पुत्र! यह अति अपमान है। इससे बढ़कर और दुख क्या हो सकता है? आज हमारे नगर में श्री महालक्ष्मी व्रत का उत्सव मनाया जा रहा है और उस उत्सव में राजरानी गांधारी ने समस्त नगर की स्त्रियों को सम्मान सहित बुलाया है, परन्तु द्वेष के कारण मुझे अपमानित करने के लिए उत्सव में नहीं बुलाया है।
अर्जुन ने कहा, हे माता! क्या यह पूजा सिर्फ दुर्योधन के महल में ही हो सकती है? या उसे आप अपने घर में कर सकती है, परन्तु वह साज सम्मान इतनी जल्दी तैयार नहीं हो सकता।
क्योंकि गांधारी के 100 पुत्रों ने मिट्टी का एक विशाल हाथी तैयार करके पूजन के लिए सजाया है, वह सब तुमसे नहीं बन सकेगा? उस उत्सव की तैयारी आज सुबह से ही हो रही है।
अर्जुन बोले, हे माता! आप पूजन की तैयारी कर सारे नगर को बुलावा भेज दे, मैं आपको पूजन के लिए इन्द्र लोक से इन्द्र के ऐरावत हाथी को बुलाकर आपको पूजन के लिए उपस्थित किए देता हूं, आप अपनी तैयारी करे।
इधर माता कुन्ती ने भी सारे नगर में पूजा का ढिंढोरा पिटवा दिया और पूजा की विशाल तैयारी होने लगी। तब अर्जुन ने इन्द्र देव को ऐरावत हाथी को भेजने के लिए पत्र लिखा और एक दिव्य बाण से बाँधकर उसे धनुष पर रखकर देवलोक की सभा में भेज दिया।
इन्द्रदेव ने बाण से पत्र खोलकर पढ़ा तो सारथी को तुरन्त आज्ञा दी कि ऐरावत को पूर्ण रूप से सजाकर तुरन्त बाण के साथ हस्तिनापुर में उतार दो। तब महावत ने तरह तरह के साज सामान से ऐरावत को सजाया और बाण मार्ग से हस्तिनापुर को चला।
इधर सारे शहर में शोर मच गया कि कुन्ती के घर इन्द्र के ऐरावत हाथो स्वर्ग से पृथ्वी पर उतार कर पूजा जायेगा।
इस समाचार को सुन नगर के सभी नर – नारी, बालक वृद्धों की भीड़ एकत्र होने लगी। गांधारी के महल में भी हल चल मच गई। नगर की स्त्रियां पूजन थाली लेकर माता कुन्ती के भवन की ओर दौड़कर आने लगी।
देखते देखते सारा भवन पूजन करने वाली नारियों से ठसाठस भर गया। माता कुन्ती ने ऐरावत को खड़ा करने हेतु अनेक रंगों के चौक पुरवाकर नवीन रेशमी वस्त्र बिछवा दिया।
हस्तिनापुर वासी स्वागत तैयारी में फूल माला, अबीर, केसर हाथों मे लिए पंक्तिबद्ध खड़े थे। इधर इन्द्र की आज्ञा पाकर ऐरावत स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरने लगा। ऐरावत के दर्शन होते ही सारे नर नारियों ने जय जय कार करना आरंभ कर दिया।
सायंकाल के ऐरावत माता कुन्ती के भवन के चौक मे उतर आया। तब सब नर नारियों ने पुष्प, माला, अबीर, केसर आदि चढ़ाकर उसका स्वागत किया। पुरोहित द्वारा ऐरावत पर महालक्ष्मी जी की मूर्ति स्थापित करके वेद मंत्रों द्वारा पूजन किया गया।
नगरवासियों ने भी लक्ष्मी पूजन का स्वागत करके ऐरावत की पूजा की। अनेक प्रकार के पकवान लेकर ऐरावत को खिलाए गए और ऊपर से यमुना जल पिलाया गया।
फिर तरह-तरह के पुष्पों की ऐरावत पर वर्षा की गयी। पुरोहित द्वारा सरस्वती वाचन करके नारियों द्वारा 16 वी गांठ लगाकर लक्ष्मी जी के सामने समर्पण किया, ब्राह्मणों हेतु पकवान मेवा, मिठाई आदि की भोजन व्यवस्था की गयी।
फिर वस्त्र, द्रव्य, सुवर्ण, अन्न, आभूषण देकर नारियों ने महालक्ष्मी पर पुष्पांजलि अर्पित की। तत्पश्चात पुरोहित द्वारा महालक्ष्मी का विसर्जन किया गया है।
अन्त में नारियों ने ऐरावत को विदा कर इन्द्र लोक को भेज दिया। महाराज सूत जी ने कहा, हे ऋषियों, इस प्रकार जो स्त्री महालक्ष्मी व्रत कथा आदि करती हैं, उसका घर लक्ष्मी जी की कृपा से सदा धन धान्य व मांगलिक वस्तुओं से पूर्ण रहता है।
श्री महालक्ष्मी जी की आरती
ओम जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चंद्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥
दुर्गा रुप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥
जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥
तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥
शुभ-गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥
महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥
यह भी पढ़ें :-
दूबड़ी आठे की कथा और इसकी पूजन विधि क्या है?
Radha Ashtami | Vrat | Katha | Pujan Vidhi | Aarti | राधा अष्टमी व्रत कथा
परिवर्तिनी एकादशी की कथा – Parivartini Ekadashi ki Katha
वामन द्वादशी व्रत कथा पूजा विधि और उद्यापन – Vaman Dwadashi Vrat Katha











