गाज माता व्रत कथा (Gaaj Mata Ki Vrat Katha) – इस व्रत को भाद्रपद में किया जाता है। कहीं कहीं इसे गर्ज डोरे खोलना भी कहते हैं। यदि किसी के यहां पुत्र का जन्म हुआ हो या पुत्र का विवाह हुआ हो तो उसी वर्ष भाद्रपद मास में किसी भी शुभ और मंगल दिन के दिन गाज का व्रत करके उद्यापन किया जाता है। सात जगह चार चार पूड़ी और हलवा रखकर उस पर कपड़ा व रुपये रख दें।
गाज माता व्रत की कुछ खास बातें
| 01 | गाज माता का व्रत कब किया जाता है? | गाज माता का व्रत भाद्रपद मास में किसी भी शुभ दिन किया जा सकता है। |
| 02 | गाज माता व्रत पूजन सामग्री | 28 पूरी, हलवा, कपड़ा, रुपये, एक लोटा, गेहूं, जल और दक्षिणा |
| 03 | इस दिन कौन कौन सी कहानी सुनते और सुनाते हैं? | गाज माता के व्रत की कहानी और बिंदायक जी की कहानी । |
एक लोटे में जल भरकर उस पर सतिया बनाकर सात दाने गेहूं के हाथ में लेकर गाज माता की कहानी सुनें। इसके बाद सारी पूड़ी ओढ़नी पर रखकर सास के पैर छूकर दे दें।

बाद में लोटे के जल से सूर्य भगवान् को जल चढ़ाएं। इसके पश्चात् सात ब्राह्मणियों को भोजन कराकर दक्षिणा देकर स्वयं भोजन करना चाहिए।
गाज माता के व्रत की कथा ( गर्ज डोरे की कहानी )
एक बार की बात है एक राजा के कोई सन्तान नहीं थी। राजा और रानी सन्तान न होने से बहुत दुखी रहा करते थे। एक दिन रानी ने गाज माता से मनोकामना मांगी कि अगर मेरे गर्भ रह जाए तो मैं आपके हलवे की कढाही करूंगी।
गाज माता की कृपा से रानी गर्भवती हो गयी। उनके घर एक पुत्र ने जन्म लिया। संयोगवश रानी गाज माता की कड़ाही करना भूल गयी और फलस्वरुप गाज माता बहुत ही क्रुद्ध हो गई।
एक दिन रानी का पुत्र पालने में सो रहा था। अचानक तेज आंधी आयी और पुत्र को पालने सहित उड़ा ले गयी। आंधी ने पालने को एक भील भीलनी के घर के बाहर रख दिया।
जब भील भीलनी जंगल से लौटकर अपने घर पहुंचे तो दोनों ने अपने घर के बाहर एक पालने मे एक बच्चे को सोता हुआ पाया। चूंकि भील भीलनी भी निःसंतान थे दोनों ने ईश्वर का प्रसाद समझकर उसे गोद में उठा लिया और दोनों बहुत प्रसन्न हुए।
वहीं एक धोबी भी रहा करता था जो राजा और भील दोनों के यहां कपड़े धोता था। जब धोबी राजा के महल कपड़े देने गया तो महल में शोर मच रहा था कि गाज माता उनके लड़के को उठा ले गई है।
धोबी द्वारा उन्हें बताया गया कि उसने आज एक लड़के को भील भीलनी के घर पालने मे सोता हुआ देखा था। राजा द्वारा भील को बुलाने का आदेश दिया गया।
राजा ने भील से कहा कि हम गाज माता का व्रत करते हैं और उन्हीं की कृपा से हमें यह पुत्र हुआ था। यह सब बातें सुनकर रानी को अपनी भूल का अह्सास हो गया था।
रानी ने गाज माता से प्रार्थना की कि मेरी भूल की वज़ह से यह सब हो गया और पश्चाताप करने लग गई। हे गाज माता! कृपया मेरी भूल क्षमा कर दीजिए और मैं आपकी कड़ाही अवश्य करूंगी। मुझे मेरा पुत्र लौटा दीजिए।
गाज माता ने खुश होकर उनका पुत्र लौटा दिया और भील भीलनी को भी मैया ने पुत्र दिया। रानी ने गाज माता का शृंगार किया और उसकी देसी घी से हलवे की कड़ाही की।
हे गाज माता! जिस प्रकार से आपने भील भीलनी को धन धान्य और पुत्र दिया तथा रानी का पुत्र उसे पुनः लौटा दिया उसी तरह हे गाज माता सभी को धन दौलत और पुत्र देना।
बिंदायक जी की कहानी
एक मेंढक और मेंढकी थे। मेंढ़की रोज बिंदायक जी की कहानी कहती थी। एक दिन मेंढक बोला कि तू क्यों किसी पराये पुरुष का नाम लेती है? अगर अब तू दुबारा नाम लेगी तो मैं तेरा सिर फोड़ दूंगा।
राजा की दासी आयी तो उसने मेंढक मेंढकी को पतीले में डालकर अंगीठी पर चढ़ा दिया। जब दोनों सिकने लगे तो मेंढक मेंढकी से बोला यदि तुझे कष्ट हो रहा है तो तू अपने बिंदायक जी को याद कर नहीं तो हम दोनों मर जायेंगे।
तब मेंढकी ने सात बार बिंदायक जी बिंदायक जी कहा तो दो सांड लड़ते हुए आए और पतीले को गिरा दिया।
मेंढक मेंढकी बहते हुए तालाब मे चले गए। हे गणेश जी महाराज जैसे मेंढक और मेंढकी का संकट काटा उसी प्रकार सभी के संकट काटना। कहने वाले और सुनने वाले के कष्ट दूर करना। हमारे और हमारे परिवार के सभी दुख दूर करना।
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