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गौ गिरिराज व्रत-Gau Giriraj Vrat

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गौ गिरिराज व्रत भाद्रपद के हिन्दी मास में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को किया जाता है। इस दिन गौ यानि गाय माता की पूजा करने का विधान है इस दिन भगवान् लक्ष्मी नारायण की पूजा करनी भी उत्तम मानी जाती है।

गौ गिरिराज व्रत (Gau Giriraj Vrat)

01गौ गिरिराज व्रत कब किया जाता है? यह व्रत भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी को किया जाता है।
02गौ गिरिराज व्रत 2019 में कब है? यह व्रत 2019 में 11 सितंबर को किया जायेगा।
03गौ गिरिराज व्रत के पूज्यनीय आराध्य कौन कौन हैं? गिरिराज जी, गौ माता, भगवान् लक्ष्मीनारायण।
04गौ गिरिराज व्रत पूजा की विशेषता क्या है? इस दिन गऊ यानि गाय ब्राह्मण को दान की जाती है।
05गौ गिरिराज व्रत के फायदे क्या है? इस व्रत को करने से सहस्त्र अश्वमेघ और राज सूर्य यज्ञ के बराबर फल मिलता है।

गौ गिरिराज व्रत कथा पूजन विधि आरती gau giriraj vrat katha pujan vidhi aarti

गौ गिरिराज पूजन विधि क्या है?

सबसे पहले एक मंडप तैयार करना चाहिए। फिर भगवान् गिरिराज की प्रतिमा को स्नान कराना चाहिए। तत्पश्चात भगवान् की प्रतिमा को मंडप में स्थापित करना चाहिये।

गौ माता की पूजा में निम्नलिखित मंत्र को पढ़कर गायों को नमस्कार कीजिये –

पंचगाव समुत्पन्नाः मथ्यमाने महोदधौ।

तेषां मध्ये तु या नंदा तस्मै धेन्वे नमो नमः॥

अर्थात् समुद का मंथन होने पर उस समय पांच गाय पैदा हुई। उनके बीच में नन्दा नाम वाली गाय है। उस गाय को बारंबार नमस्कार है। फिर से यह मंत्र पढ़कर गाय ब्राह्मण को दान कर दें।

गावो ममाग्रतः सन्तु गावो में सन्तु पृष्ठतः।

गावो में पाश्वर्तः सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम॥

अर्थात् गायें मेरे आगे और पीछे रहें। गायें मेरी बगल में रहें और मैं गायों के बीच में निवास करता रहूं। इसके बाद ब्राह्मण को दक्षिणा देकर आदर सत्कार सहित विदा करें।

जो भी व्यक्ति गौ गिरिराज व्रत को करता है वह सहस्रों अश्वमेघ और राज सूर्य यज्ञ के फल का भागी होता है।

श्री गिरिराज जी की आरती

ब्रजभूमि ब्रजांगना बृजवासी बृजराज।
यह चारों के मुकुट है जय जय श्री गिरिराज॥

श्री कृष्ण चरण रज मस्तक धरि बैठो है गिरिराज।
जो गिरिराज कृपा करे सफल करे सब काज॥

कबीर कबीर क्या कहे, जा यमुना के तीर।
एक एक गोपी प्रेम में, बह गये कोटि कबीर॥

दीनन को हितकारी है भक्तन को रखवारो।
सब देवन को देव कहावे सात कोस वारो॥

एक रूप से पूजत है दूजो रहयो पूजाय।
सहस्त्र भुजा फैलाय के माँग माँग के खाय॥

वैष्णव से वैष्णव मिले, यह पूरब की पहचान।
और लागे टांकी प्रेम की, तो निकले हीरा खान॥

कोई तन दुःखी कोई मन दुःखी, कोई धन बिन रहे उदास।
थोड़े थोड़े सब दुःखी, इक सुखी श्री गिरिराज को दास।॥

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