शुक्रवार व्रत की विधि, कथा, संतोषी माता की आरती एवं उद्यापन।

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इस पोस्ट के माध्यम से जानिये कि शुक्रवार व्रत की विधि, शुक्रवार व्रत की कथा, शुक्रवार के व्रत का उद्यापन कैसे करे और संतोषी माता की आरती सब कुछ विस्तार से।

शुक्रवार व्रत की विधि, कथा, संतोषी माता की आरती एवं उद्यापन।

शुक्रवार व्रत की विधि

शुक्रवार के व्रत को करने वाला कथा कहते व सुनते समय हाथ में गुड़ व भुने चने रखे। सुनने वाला संतोषी माता की जय! संतोषी माता की जय! इस प्रकार मुख से बोलता जाये।

शुक्रवार व्रत की कथा समाप्त होने पर हाथ से गुड़ चना गौ माता को खिलावे। कलश में रखा हुआ जल, गुड़ चना सबको प्रसाद के रूप में बांट दे। शुक्रवार व्रत की कथा से पहले कलश को जल से भरे। उसके ऊपर गुड़ चने से भरा कटोरा रखे।

शुक्रवार व्रत की कथा समाप्त होने पर शुक्रवार की आरती होने के बाद कलश के जल को घर में सब जगहों पर छिड़के और बचा हुआ पानी तुलसी के गमले में डाल दें।

सवा रुपये का गुड़ चना लेकर संतोषी माता का व्रत करें। गुड़ अगर घर में हो तो भी ले लेवे। श्रद्धा, प्रेम और प्रसन्न मन से व्रत करना चाहिये।

शुक्रवार के व्रत का उद्यापन

शुक्रवार के व्रत के उद्यापन में अढाई सेर खाजा मोमनदार पूड़ी, खीर, चने का शाक, नैवेद्य रखें। घी का दीपक जला कर संतोषी माता की जय जय कार बोल नारियल फोड़े। इस दिन घर में कोई खटाई न खाए और न आप खाए और न किसी दूसरे को दे।

शुक्रवार के व्रत के उद्यापन के दिन आठ लड़कों का भोजन कराएं। देवर, जेठ, घर, कुटुम्ब के लड़के मिलते हों तो दूसरों को बुलाना नहीं, अन्यथा दूसरों को बुला ले। उन्हें खटाई की कोई वस्तु न दे तथा भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा दें।

शुक्रवार व्रत की कथा

एक बुढ़िया थी और उसके सात पुत्र थे। छह कमाने वाले थे और एक कुछ भी नहीं करता था। बुढ़िया मां छहों की रसोई बनाती थी। भोजन कराती और बाद में जो कुछ बचता उसे सातवें पुत्र को दे देती थी।

परन्तु वह भोला था और मन में कुछ विचार न करता था। एक दिन अपनी बहू से बोला, “देखो मेरी माता का मुझ पर कितना प्यार है।”

वह बोली, “क्यों नहीं, सबका झूठा बचा हुआ तुमको खिलाती है।” वह बोला, “ऐसा कभी नहीं हो सकता है। मैं जब तक अपनी आंखों से न देखूं मान नहीं सकता।” बहू ने कहा, “देख लोगे तब तो मानोगे?”

कुछ दिन बाद बड़ा त्योहार आया। घर में सात प्रकार के भोजन और चूरमा के लड्डू बने। वह जांचने को सिर दर्द का बहाना कर पतला कपड़ा सिर पर ओढ़कर रसोई में सो गया और कपड़े में से सब देखता रहा।

छह भाई भोजन करने को आये। उसने देखा कि मां ने उनके लिए सुन्दर सुन्दर आसन बिछाये है। सात प्रकार की रसोई परोसी है। वह आग्रह करके उन्हें जिमाती है। वह देखता रहा।

जब भाई भोजन करके उठे तब झूठी थालियों मे से लड्डू के टुकड़ों को उठाया और एक लड्डू बनाया। झूठन साफ़ कर बुढ़िया मां ने उसे पुकारा, “उठ बेटा! सारे भाई भोजन करके गये और अब तू ही बाकी है। उठ ना, कब खाएगा? वह कहने लगा,”मां मुझे भोजन नहीं करना है। मैं परदेश जा रहा हूं।”

माता ने कहा,”कल जाता हो तो आज ही चला जा।” वह बोला,”हां हां, आज ही जा रहा हूं।” यह कहकर वह घर से निकल गया। चलते समय बहू की याद आयी, वह गौशाला के कंडे थाप रही थी। जाकर बोला –

दोहा :-

हम जावे परदेश का, आवेंगे कुछ काल।

तुम रहियो संतोष से धरम आपनों पाल।

वह बोली-जाओ पिया आनंद से हमरो सोच हटाये।

राम भरोसे हम रहें, ईश्वर तुम्हें सहाय।

देवों निशानी आपनी देख धरूं मैं धीर।

सुधि हमरी न बिसरियो रखियो मन गम्भीर।

वह बोला, “मेरे पास तो कुछ है नहीं, यह अंगूठी है सो ले लो और अपनी कुछ निशानी मुझे दे दो। वह बोली,”मेरे पास क्या है, यह गोबर भरा हाथ है। यह कहकर उसकी पीठ में गोबर के हाथ की थाप मार दी।

वह चल दिया। चलते-चलते दूर देश में पहुंचा। वहां एक साहूकार की दुकान थी। वहीं जाकर कहने लगा,” भाई मुझे नौकरी पर रख लो।” साहूकार को जरूरत थी, बोला – रह जा। लड़के ने पूछा,”तनखा क्या दोगे?” साहूकार ने कहा, “काम देखकर दाम मिलेंगे।”

साहूकार की नौकरी मिली। वह सवेरे सात बजे से रात तक नौकरी करने लगा। कुछ दिनों में दुकान का सारा लेन देन का हिसाब, ग्राहकों को माल बेचना आदि सारा काम करने लगा। साहूकार के सात आठ नौकर थे। सब चक्कर खाने लगे कि यह तो बहुत होशियार बन गया है।

सेठ ने भी काम देखा और तीन महीने में उसे आधे मुनाफे का साझीदार बना लिया। और बारह वर्ष में वह नामी सेठ बन गया और साहूकार सारा कारोबार उसके ऊपर छोड़कर बाहर चला गया।

अब बहू पर क्या बीती, सुनो। सास ससुर उसे दुःख देने लगे। सारी गृहस्थी का काम कराके उसे लकड़ी लेने जंगल भेजते और घर की रोटियों के आटे के भूसे से जो भूसी निकलती उसकी रोटी बनाकर रख दी जाती। और फूटे नारियल की नरेली मे पानी। इस तरह दिन बीतते गए।

एक दिन वह लकड़ी लेने जा रही थी कि रास्ते में बहुत सी स्त्रियां संतोषी माता का व्रत करती दिखायी दी। वह वहीं खड़ी होकर शुक्रवार व्रत की कथा सुनकर बोली, “बहनों! तुम किस देवता का व्रत करती हो और इसके करने से क्या फल मिलता है? इस व्रत को करने की क्या विधि है?

यदि तुम इस व्रत का विधान मुझे समझाकर कहोगी तो मैं तुम्हारा बड़ा अहसान मानूंगी। तब उनमे से एक स्त्री बोली,”सुनो! यह शुक्रवार का संतोषी माता का व्रत है। इसके करने से निर्धनता, दरिद्रता का नाश होता है, लक्ष्मी आती है, मन की चिंताए दूर होती है और घर में सुख आने से मन को प्रसन्नता और शांति मिलती है।”

यह सुनकर बहू चल दी। रास्ते में लकड़ी के बोझ को बेच दिया। और उन पैसों से गुड़ चना ले माता के व्रत की तैयारी कर आगे चली और सामने मंदिर देख पूछने लगी,”यह मंदिर किसका है?” लोग कहने लगे – संतोषी माता का मंदिर है।

यह सुन माता के मंदिर में जा माता के चरणों में लोटने लगी। दीन हूं विनती करने लगी, “मां! मैं निपट मूर्ख हूं, व्रत के नियम कुछ जानती नहीं, मैं बहुत दुखी हूं। हे माता जगत जननी! मेरा दुख दूर कर। मैं तेरी शरण में हूं।”

माता को दया आयी। एक शुक्रवार बीता कि दूसरे शुक्रवार को ही उसके पति का पत्र आया और तीसरे को उसका भेजा हुआ पैसा भी आ पहुंचा। यह देख जेठानी मूंह सिकोड़ने लगी,”इतने दिनों में इतना पैसा आया, इसमे क्या बड़ाई है?” लड़के ताना देने लगे कि काकी के पास अब पत्र आने लगे, रुपया आने लगा, अब तो काकी की खातिर बढ़ेगी, अब तो काकी बुलाने से भी नहीं बोलेगी।

वह बेचारी सरलता से कहती, “भैया पत्र आवे, रुपया आवे तो हम सबके लिए अच्छा है।” ऐसा कहकर आँखों में आंसू भरकर संतोषी माता के मंदिर में आ मातेश्वरी के चरणों में गिरकर रोने लगी, “मां! मैंने तुमसे पैसा नहीं माँगा। मुझे पैसे से क्या काम है? मुझे तो अपने सुहाग से काम है। मैं तो अपने स्वामी के दर्शन और सेवा मांगती हूं।” तब माता ने प्रसन्न होकर कहा,”जा बेटी! तेरा स्वामी आयेगा।” यह सुनकर खुशी से बावली हो घर जा काम करने लगी।

अब संतोषी मां विचार करने लगी कि इस भोली पुत्री से मैंने कह तो दिया तेरा पति आयेगा पर आयेगा कहाँ से। वह तो इसे स्वप्न में भी याद नहीं करता। उसे याद दिलाने के लिये मुझे जाना पड़ेगा।

इस प्रकार बुढ़िया के बेटे के पास जो स्वप्न में प्रकट होकर कहने लगी, “साहूकार के बेटे! सो रहा है या जाग रहा है?” वह बोला, “माता सो नहीं रहा हूं, जाग भी नहीं रहा हूं, कहो क्या आज्ञा है?” मां कहने लगी, “तेरा घर बार कुछ है कि नहीं। वह बोला सब कुछ है। मां बाप, भाई बहन, व बहू क्या कमी है।

मां बोली, “हे भोले पुत्र! तेरी स्त्री घोर कष्ट उठा रही है। तेरे मां बाप उसे दुख दे रहे हैं, वह तेरे लिए तरस रही है। तू उसकी सुधि ले।”

वह बोला, “माता! यह तो मुझे मालूम है। परन्तु जाऊं कैसे? परदेश की बात है, लेन देन का कोई हिसाब नहीं, जाने का कोई रास्ता नजर नहीं आता, कैसे चला जाऊं।”

मां कहने लगी,”मेरी बात मान! सवेरे नहा धोकर संतोषी माता का नाम ले। घी का दीपक जला। दण्डवत कर दुकान पर जा बैठना। तब देखते देखते तेरा लेन देन सब चुक जायेगा। माल बिक जायेगा। सांझ – सांझ होते होते धन का ढेर लग जायेगा।”

तब सवेरे बहुत जल्दी उठ नहा, धोकर संतोषी माता को दण्डवत कर, घी का दीपक जला के दुकान पर जा बैठा। थोड़ी देर में क्या दिखता है कि देने वाले रुपया लाए लेने वाले हिसाब लेने लगे, कोठे मे भरे सामनों के खरीदार नगद दाम में सौदा करने लगे।

शाम तक धन का ढेर लग गया। माता का य़ह चमत्कार देख खुश हो, मन में माता का नाम ले घर ले जाने के वास्ते गहना कपड़ा खरीदने लगा और वहां के काम से निबट तुरंत रवाना हुआ।

वहां बहू बेचारी जंगल में लकड़ी लेने जाती है। लौटते वक्त माताजी के मंदिर में विश्राम करती है। वह तो उसका रोज रुकने का स्थान है। दूर से धूल उड़ती देख वह माता से पूछती है, “हे माता! यह धूल कैसी उड़ रही है।”

मां कहती है, “हे पुत्री! तेरा पति आ रहा है। अब तू ऐसा कर, लकड़ियों के तीन बोझे बना ले। एक नदी के किनारे रख, दूसरा तेरे मंदिर पर और तीसरा अपने सिर पर रख। तेरे पति को लकड़ी का गट्ठा देख मोह पैदा होगा। वह वहां रुकेगा, खा पीकर मां से मिलने जायेगा। तब तू लकड़ी का बोझ उठाकर जाना और बीच चौक मे गट्ठा डालकर तीन आवाजें जोर से लगाना, लो सासू जी लकड़ियों का गट्ठा लो, भूसी की रोटी दो और नारियल के खोपड़े मे पानी दो, आज मेहमान कौन आया है?”

मां की बात सुन, “बहुत अच्छा माता!” कहकर प्रसन्न हो लकड़ियों के तीन गट्ठे ले आयी। एक नदी के तट पर, एक माता के मंदिर पर रखा। इतने में ही मुसाफिर वहां आ पहुंचा। सूखी लकड़ी देख उसकी इच्छा हुई कि यहीं यहीं निवास करे और भोजन बना कर खा पीकर गांव जाए।

इस प्रकार भोजन बना विश्राम कर गांव को गया, सबसे प्रेम से मिला। उसी समय बहू सिर पर लकड़ी का गट्ठा लिए आती है। लकड़ी का भारी बोझ आंगन में गेर जोर से तीन आवाज देती है, “लो सासू जी लकड़ी का गट्ठा लो, भूसी की रोटी दो, नारियल के खोपड़े मे पानी दो, आज मेहमान कौन आया है?”

यह सुनकर उसकी सास अपने दिए हुए कष्टों को भुलाने हेतु कहती है, “बहू! ऐसा क्यों कहती है, तेरा मालिक ही तो आया है। आ बैठ, मीठा भात खा, भोजन कर, गहने कपड़े पहन। इतने में आवाज सुन उसका स्वामी बाहर आता है। और अंगुठी देख व्याकुल हो मां से पूछता है, “मां यह कौन है?”

मां कहती है, “बेटा! तेरी बहू है आज बारह वर्ष हो गए, तू जब से गया है तब से सारे गाँव में जानवर की तरह भटकती फिरती है। काम काज घर का कुछ नहीं करती। चार समय आकर खा जाती है। अब तुझे देखकर भूसी की रोटी और नारियल के खोपड़े मे पानी मांगती है।”

वह लज्जित हो बोला, “ठीक है मां, मैंने इसे भी देखा है और तुम्हें भी देखा है। अब मुझे दूसरे घर की ताली दो मैं उसमे रहूंगा।” तब मां बोली – ठीक है बेटा! जैसी तेरी मर्जी। कहकर ताली का गुच्छा पटक दिया। उसने ताली ले दूसरे कमरे में जो तीसरी मंजिल के ऊपर था, खोलकर सामान जमाया।

एक दिन में ही वहां राजा के महल जैसा ठाठ बाट बन गया। अब क्या था, वे दोनों सुखपूर्वक रहने लगे। इतने में दूसरा शुक्रवार आया बहू ने अपने पति से कहा कि मुझको शुक्रवार के व्रत का माता का उद्यापन करना है। पति बोला, “बहुत अच्छा, खुशी से करो।” वह तुरन्त ही उद्यापन की तैयारी करने लगी। जेठ के लड़कों को भोजन के लिए कहने लग गयी। उन्होने मंजूर किया।

परन्तु अपने बच्चों को सिखाती है, “देखो रे! भोजन के समय सब लोग खटाई मांगना, जिससे उसका उद्यापन पूरा न हो।” लड़के जीमने आए। खीर पेट भर खायी। परन्तु याद आने पर कहने लगे हमें कुछ खटाई दो, खीर खाना हमे भाता नहीं, देखकर अरुचि होती है।

बहू कहने लगी, “खटाई किसी को नहीं दी जाएगी। यह तो संतोषी माता का प्रसाद है।” बच्चे उठ खड़े हुए, बोले कि पैसा लाओ। भोली बहू कुछ जानती नहीं थी, सौ उन्हें पैसे दे दिए। लड़के उसी समय उठ के इमली लाकर खाने लगे। यह देख बहू पर माता जी ने कोप किया। राजा के दूत पति को पकड़कर ले गये। अब सब मालूम हो जायेगी। अब जेल की हवा खाएगा।

बहू से ये वचन सहन नहीं हुए। रोती रोती मंदिर में गयी और बोली, “हे माता! तुमने यह क्या किया? हंसाकर अब क्यों रुलाने लगी।”

माता बोली – पुत्री तूने उद्यापन करके मेरा व्रत भंग किया है। इतनी जल्दी सब बातें भुला दी। वह बोली कि माता भूली तो नहीं हूं। न ही कुछ अपराध किया है। मुझे तो लड़कों ने भूल में डाल दिया है। मैंने भूल से उन्हें पैसे दे दिए। मुझे क्षमा करो मां।

मां बोली,”ऐसी भी कहीं भूल होती है?” वह बोली, “मां मुझे माफ़ कर दो। मैं फिर तुम्हारा उद्यापन करूंगी।” मां बोली कि अब भूल मत करना। वह बोली कि अब भूल न होगी, मां अब बताओ वे कैसे आयेंगे?

मां बोली, “जा बेटी! तेरा पति तुझे रास्ते में ही आता मिलेगा। वह घर को चली। राह में पति आता मिला। उसने पूछा कि तुम कहां गए थे? तब वह कहने लगा कि इतना धन जो कमाया है, उसका कर राजा ने माँगा था। वह भरने गया था।

वह प्रसन्न हो बोली, “भला हुआ, अब घर को चलो।” कुछ दिन बाद फिर शुक्रवार आया। वह बोली कि मुझे माता का उद्यापन करना है। पति ने कहा करो। फिर जेठ के लड़कों से भोजन को कहने गयी। जेठानी ने एक दो बात सुनायी और लड़कों को सिखा दिया कि तुम पहले ही खटाई मांगने लगना।

लड़के भोजन के पहले ही कहने लगे,”हमें खीर खाना नहीं भाता, जी बिगड़ता है कुछ खटाई खाने को दो।” वह बोली, “खटाई खाने को नहीं मिलेगी, खाना हो तो खाओ।”

वह ब्राह्मण के लड़कों को लाकर भोजन कराने लगी। यथाशक्ति दक्षिणा की जगह एक एक फल उन्हें दिया। इससे संतोषी मां प्रसन्न हुई। माता की कृपा होते ही नवे मास उनको चंद्रमा के समान सुन्दर पुत्र प्राप्त हुआ।

पुत्र को लेकर प्रतिदिन बहू माता जी के मंदिर जाने लगी। मां ने सोचा कि यह रोज आती है, आज क्यों न मैं इसके घर चलूं। इसका आसरा देखूं तो सही। यह विचारकर माता ने भयानक रूप बनाया।

गुड़ और चने से सना मुख, ऊपर सूंड के समान होंठ, उसपर मक्खियाँ भिनभिना रहीं थीं। दहलीज मे पाँव रखते ही उसकी सास चिल्लाई, “देखो रे! कोई चुड़ैल चली आ रही है। लड़कों इसे भगाओ नहीं तो किसी को खा जायेगी।

लड़के डरने लगे और चिल्लाकर खिड़की बंद करने लगे। बहू रोशनदान से देख रही थी। प्रसन्नता से पागल होकर चिल्लाने लगी, “आज मेरी माता मेरे घर आयी है।” यह कहकर बच्चे को दूध पीने से हटा दिया। इतने में सास का क्रोध फूट पड़ा। बोली, कुलछनी! इसे देखकर कैसी उतावली हुई है जो दूध पीते बच्चे को पटक दिया।

इतने में मां के प्रताप से जहां देखो वहीं लड़के ही लड़के नजर आने लगे। वह बोली, “मां जी! जिनका मैं व्रत करती हूं, यह वहीं संतोषी माता हैं। इतना कह झट से सारे घर के किवाड़ खोल दिए। सबने माता के चरण पकड़ लिए और विनती कर कहने लगे, “हे माता! हम मूर्ख हैं, पापी हैं, हम अज्ञानी हैं, तुम्हारे व्रत की विधि हम नहीं जान पाए, तुम्हारा व्रत भंग कर हमने बड़ा अपराध किया है।

हे माता! आप हमारे अपराध को क्षमा करो इस प्रकार माता प्रसन्न हुई। माता ने बहू को जैसा फल दिया वैसे ही माता सबकों दे। जो पढ़े उसका मनोरथ पूर्ण हो। बोलो संतोषी माता की जय।

श्री संतोषी माता की आरती


जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।

अपने सेवक ज़न की, सुख सम्पत्ति दाता।

सुन्दर चीर सुनहरी, माँ धारण कीन्हों।

हीरा पन्ना दमके, तन शृंगार लीन्हों।

गेरू लाल छटा छवि, बदल कमल सोहे।

मंद हंसत करुणामयी, त्रिभुवन जन मोहे।

स्वर्ण सिहासन बैठी चंवर धुरे प्यारे।

धूप दीप मधुमेवा भोग धरे न्यारे।

गुड़ अरु चना परम प्रिय, तामें संतोष कियो।

संतोषी कहलायी, भक्तन वैभव दियो।

शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही।

भक्त मंडली आई, कथा सुनत मोही।

मंदिर आगमन ज्योति, मंगल ध्वनि छायी।

विनय करें हम बालक, चरनन सिर नाई।

भक्ति भावमय पूजा अंगीकृत कीजे।

जो मन बसे हमारे, इच्छा फल दीजै।

दुःखी दरिद्री, रोगी संकट मुक्त किये।

बहु धन धान्य भरे, घर सुख सौभाग्य दिये।

ध्यान धरयो जाने तेरो, मनवांछित फल पायो।

पूजा कथा श्रवण कर, घर आनंद आयो।

शरण गहे की लज्जा, रखियो जगदंबे।

संकट तू ही निवारे, दयामयी अंबे।

संतोषी माता की आरती, जो कोई नर गावे।

रिद्धि-सिद्धि सुख सम्पत्ति, जी भर के पावे।


व्रत का महत्व

शुक्रवार का व्रत मुख्य रूप से संतोषी माता तथा माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और संतोष के साथ शुक्रवार व्रत करने से परिवार में सुख-शांति, आर्थिक समृद्धि, वैवाहिक सुख तथा मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।

शुक्रवार व्रत के नियम

  • प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और संतोषी माता का पूजन करें।
  • पूजा में गुड़ और भुने चने का भोग अवश्य लगाएं।
  • व्रत के दिन खटाई (खट्टी वस्तुओं) का सेवन न करें और न ही किसी को खिलाएं।
  • शुक्रवार व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण करें तथा संतोषी माता की आरती करें।
  • दिनभर संतोष, संयम और मधुर व्यवहार बनाए रखें।
  • व्रत पूर्ण होने पर प्रसाद का वितरण करें।

शुक्रवार व्रत में क्या खाना चाहिए?

शुक्रवार के व्रत में फल, दूध, खीर, गुड़, भुने चने तथा अन्य सात्विक भोजन का सेवन किया जा सकता है। इस दिन खटाई का सेवन वर्जित माना जाता है।

व्रत के लाभ

  • संतोषी माता की कृपा प्राप्त होती है।
  • घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।
  • आर्थिक परेशानियां दूर होने की धार्मिक मान्यता है।
  • वैवाहिक एवं पारिवारिक जीवन में मधुरता आती है।
  • मनोकामनाओं की पूर्ति तथा मानसिक संतोष प्राप्त होता है।

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शुक्रवार व्रत से जुड़े सामान्य प्रश्न (FAQ)

शुक्रवार का व्रत किस देवी के लिए किया जाता है?

यह व्रत मुख्य रूप से संतोषी माता की कृपा प्राप्त करने के लिए किया जाता है।

शुक्रवार के व्रत में क्या नहीं खाना चाहिए?

शुक्रवार के व्रत में खटाई या किसी भी प्रकार की खट्टी वस्तु का सेवन नहीं करना चाहिए।

शुक्रवार व्रत का उद्यापन कैसे किया जाता है?

संतोषी माता का विशेष पूजन, गुड़-चना का भोग, आठ बालकों को भोजन, दक्षिणा और प्रसाद वितरण के साथ उद्यापन किया जाता है।

इस व्रत का क्या लाभ है?

इस व्रत से सुख-समृद्धि, पारिवारिक शांति, आर्थिक उन्नति तथा मनोकामनाओं की पूर्ति होने की धार्मिक मान्यता है।

निष्कर्ष

शुक्रवार व्रत संतोष, श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। नियमपूर्वक शुक्रवार व्रत की कथा का श्रवण, संतोषी माता की पूजा तथा व्रत का पालन करने से सुख, समृद्धि, मानसिक शांति और माता की कृपा प्राप्त होने की धार्मिक मान्यता है। यदि आप अन्य प्रमुख व्रतों की जानकारी भी प्राप्त करना चाहते हैं, तो व्रत एवं पूजा श्रेणी की अन्य पोस्ट भी अवश्य पढ़ें।


अस्वीकरण (Disclaimer): यह पोस्ट धार्मिक ग्रंथों, लोक मान्यताओं एवं प्रचलित परंपराओं के आधार पर तैयार किया गया है। विभिन्न क्षेत्रों एवं संप्रदायों में शुक्रवार व्रत की पूजा-विधि और मान्यताओं में भिन्नता हो सकती है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान का पालन अपने कुलाचार, पारिवारिक परंपरा अथवा योग्य आचार्य के मार्गदर्शन के अनुसार करें।

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PUNIT NAGAR
पुनीत नागर JSBJM.org के संस्थापक और लेखक हैं। वे मेहंदीपुर बालाजी धाम, मंदिर से जुड़ी धार्मिक परंपराओं, दर्शन, अर्जी-दरखास्त, हनुमान भक्ति और सनातन धर्म से संबंधित विषयों पर हिंदी में लेख लिखते हैं। उनका प्रयास उपलब्ध आधिकारिक एवं विश्वसनीय स्रोतों, शोध सामग्री, पुस्तकों तथा संबंधित धार्मिक और स्थानीय परंपराओं के संदर्भ में जानकारी को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है। जहाँ किसी जानकारी का आधार धार्मिक मान्यता या स्थानीय परंपरा होता है, उसे उसी संदर्भ में स्पष्ट करने का प्रयास किया जाता है।

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