Radha Ashtami | Vrat | Katha | Pujan Vidhi | Aarti | राधा अष्टमी व्रत कथा

0
2151

राधा अष्टमी भगवान श्रीकृष्ण की परम आराध्या एवं भक्ति की अधिष्ठात्री श्री राधारानी के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाई जाती है। यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रीराधा की कृपा के बिना भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति पूर्ण नहीं होती, इसलिए इस दिन श्रद्धालु व्रत रखकर राधा-कृष्ण का पूजन, भजन-कीर्तन और नामस्मरण करते हैं।

इस पोस्ट में आप राधा अष्टमी व्रत कथा, पूजन विधि, राधा जी का प्राकट्य, व्रत का महत्व तथा श्री राधा जी की आरती के बारे में विस्तार से जानेंगे। यदि आप भाद्रपद मास में आने वाले अन्य प्रमुख व्रतों की जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो व्रत एवं पूजा: संपूर्ण जानकारी भी अवश्य पढ़ें।

हिंदू धर्म में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि श्री राधा अष्टमी के नाम से प्रसिद्ध है क्योंकि राधा जी का जन्म इसी अष्टमी तिथि को हुआ था। राधा जी वृषभानु की यज्ञ भूमि से प्रकट हुई थीं। कुछ लोग राधा जी का प्राकट्य श्री वृषभानुपुरी, वर्तमान में बरसाना या उनके ननिहाल रावल ग्राम में का मानते हैं। ◉ Asiatic Society Journal — p. 44

Radha Ashtami Vrat Katha In Hindi

01राधा नाम क्यों पड़ा ?
02राधा अष्टमी व्रत कथा
03राधा अष्टमी पूजन विधि
04राधा अष्टमी व्रत कैसे रखें?
05राधा जी की आरती
राधा अष्टमी | व्रत | कथा | पूजन | विधि | आरती

वैष्णव परंपरा के अनुसार श्री राधा की आराधना को श्रीकृष्ण की भक्ति से अभिन्न माना गया है। ◉ Brahma Vaivarta Purana — Radha-Krishna Worshipअतः समस्त कृष्ण भक्तों को चाहिए कि वे राधा अष्टमी के दिन भगवती श्री राधा की अर्चना अवश्य करें।

राधा अष्टमी व्रत कथा radha Ashtami vrat katha in hindi

भाद्रपद मास में राधा अष्टमी के साथ-साथ गौ गिरिराज व्रत का भी विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। दोनों व्रत भगवान श्रीकृष्ण एवं ब्रज संस्कृति से जुड़े होने के कारण श्रद्धापूर्वक किए जाते हैं।

इनका राधा नाम क्यों पड़ा?

श्री राधा भगवान श्री कृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए भगवान इनके अधीन रहते हैं। यह संपूर्ण कामनाओं का राधन (साधन) करती हैं, इसी कारण इन्हें श्री राधा कहा गया है। ◉ Brahma Vaivarta Purana — 4.17.223

राधा अष्टमी कथा

श्री कृष्ण भक्ति के अवतार देवर्षि नारद ने एक बार भगवान सदाशिव के श्री चरणों में प्रणाम करके पूछा, ‘‘हे प्रभु ! मैं आपका दास हूं। बतलाइए, श्री राधा देवी लक्ष्मी हैं या देवपत्नी। महालक्ष्मी हैं या सरस्वती हैं? क्या वे अंतरंग विद्या हैं या वैष्णवी प्रकृति हैं? कहिए, वे वेदकन्या हैं, देवकन्या हैं अथवा मुनिकन्या हैं?’’

सदाशिव बोले – ‘‘हे मुनिवर ! अन्य किसी लक्ष्मी की बात क्या कहें, कोटि-कोटि महालक्ष्मी उनके चरण कमल की शोभा के सामने तुच्छ कही जाती हैं। हे नारद जी ! एक मुंह से मैं अधिक क्या कहूं? मैं तो श्री राधा के रूप, लावण्य और गुण आदि का वर्णन करने मे अपने को असमर्थ पाता हूं। उनके रूप आदि की महिमा कहने में भी लज्जित हो रहा हूं। तीनों लोकों में कोई भी ऐसा समर्थ नहीं है जो उनके रूपादि का वर्णन करके पार पा सके। उनकी रूपमाधुरी जगत को मोहने वाले श्री कृष्ण को भी मोहित करने वाली है। यदि अनंत मुख से चाहूं तो भी उनका वर्णन करने की मुझमें क्षमता नहीं है।’’

नारदजी बोले – ‘‘हे प्रभो श्री राधा जी के जन्म का माहात्म्य सब प्रकार से श्रेष्ठ है। हे भक्तवत्सल ! उसको मैं सुनना चाहता हूं।’’ हे महाभाग ! सब व्रतों में श्रेष्ठ व्रत श्री राधा अष्टमी व्रत के विषय में मुझको सुनाइए। श्री राधा जी का ध्यान कैसे किया जाता है? उनकी पूजा अथवा स्तुति किस प्रकार होती है? यह सब सुझसे कहिए। हे सदाशिव! उनकी चर्या, पूजा विधान तथा अर्चन विशेष सब कुछ मैं सुनना चाहता हूं। आप बतलाने की कृपा करें।’’

शिवजी बोले – ‘‘वृषभानुपुरी के राजा वृषभानु महान उदार थे। वे महान कुल में उत्पन्न हुए तथा सब शास्त्रों के ज्ञाता थे। अणिमा-महिमा आदि आठों प्रकार की सिद्धियों से युक्त, श्रीमान्, धनी और उदारचेत्ता थे। वे संयमी, कुलीन, सद्विचार से युक्त तथा श्री कृष्ण के आराधक थे। उनकी भार्या श्रीमती श्रीकीर्तिदा थीं।

वे रूप-यौवन से संपन्न थीं और महान राजकुल में उत्पन्न हुई थीं। महालक्ष्मी के समान भव्य रूप वाली और परम सुंदरी थीं। वे सर्वविद्याओं और गुणों से युक्त, कृष्णस्वरूपा तथा महापतिव्रता थीं। उनके ही गर्भ में शुभदा भाद्रपद की शुक्ल अष्टमी को मध्याह्न काल में श्रीवृन्दावनेश्वरी श्री राधा जी प्रकट हुईं। हे महाभाग ! अब मुझसे श्री राधा जन्म– महोत्सव में जो भजन-पूजन, अनुष्ठान आदि कर्तव्य हैं, उन्हें सुनिए।

सदा श्री राधा अष्टमी के दिन व्रत रखकर उनकी पूजा करनी चाहिए। श्री राधाकृष्ण के मंदिर में ध्वजा, पुष्पमाल्य, वस्त्र, पताका, तोरणादि नाना प्रकार के मंगल द्रव्यों से यथाविधि पूजा करनी चाहिए।

स्तुतिपूर्वक सुवासित गंध, पुष्प, धूपादि से सुगंधित करके उस मंदिर के बीच में पांच रंग के चूर्ण से मंडप बनाकर उसके भीतर षोडश दल के आकार का कमलयंत्र बनाएं।

उस कमल के मध्य में दिव्यासन पर श्री राधाकृष्ण की युगलमूर्ति पश्चिमाभिमुख स्थापित करके ध्यान, पाद्य-अघ्र्यादि से क्रमपूर्वक भलीभांति उपासना करके भक्तों के साथ अपनी शक्ति के अनुसार पूजा की सामग्री लेकर भक्तिपूर्वक सदा संयतचित्त होकर उनकी पूजा करें।

राधा अष्टमी पूजन विधि क्या है?

अन्य व्रतों की भांति इस दिन भी प्रात: उठकर स्नानादि क्रियाओं से निवृत होकर श्री राधा जी का विधिवत पूजन करना चाहिए। इस पूजन हेतु मध्याह्न का समय उपयुक्त माना गया है। इस दिन पूजन स्थल में ध्वजा, पुष्पमाला,वस्त्र, पताका, तोरणादि व विभिन्न प्रकार के मिष्ठान्नों एवं फलों से श्री राधा जी की स्तुति करनी चाहिए। पूजन स्थल में पांच रंगों से मंडप सजाएं, उनके भीतर षोडश दल के आकार का कमलयंत्र बनाएं, उस कमल के मध्य में दिव्य आसन पर श्री राधा कृष्ण की युगलमूर्ति पश्चिमाभिमुख करके स्थापित करें। बंधु बांधवों सहित अपनी सामर्थ्यानुसार पूजा की सामग्री लेकर भक्तिभाव से भगवान की स्तुति गाएं। दिन में हरिचर्चा में समय बिताएं तथा रात्रि को नाम संकीर्तन करें। एक समय फलाहार करें। मंदिर में दीपदान करें।

श्री राधा जी की आरती

आरती राधा जी की कीजै, कृष्ण संग जो करे निवासा, कृष्ण करें जिन पर विश्वासा, आरति वृषभानु लली की कीजै।

कृष्ण चन्द्र की करी सहाई, मुंह में आनि रूप दिखाई, उसी शक्ति की आरती कीजै।

नन्द पुत्र से प्रीति बढाई, जमुना तट पर रास रचाई, आरती रास रचाई की कीजै।

प्रेम राह जिसने बतलाई, निर्गुण भक्ति नहीं अपनाई, आरती राधा जी की कीजै।

दुनिया की जो रक्षा करती, भक्तजनों के दुख सब हरती, आरती दु:ख हरणी की कीजै।

कृष्ण चन्द्र ने प्रेम बढाया, विपिन बीच में रास रचाया, आरती कृष्ण प्रिया की कीजै।

दुनिया की जो जननि कहावे, निज पुत्रों की धीर बंधावे, आरती जगत मात की कीजै।

निज पुत्रों के काज संवारे, आरती गायक के कष्ट निवारे, आरती विश्वमात की कीजै।

आभार :- विकिपीडिया

राधा अष्टमी के कुछ दिनों बाद आने वाली वामन द्वादशी भी भगवान विष्णु के वामन अवतार को समर्पित अत्यंत महत्वपूर्ण वैष्णव पर्व है। इसकी कथा और पूजा विधि जानना भी लाभकारी माना जाता है।

स्रोत और संदर्भ

Radha’s Birthplace — Raval & Barsana Traditions

राधा जी के जन्मस्थान के संबंध में ब्रज परंपराओं में रावल और बरसाना दोनों का उल्लेख मिलता है। एक ऐतिहासिक विवरण में रावल को राधा के जन्मस्थान और बरसाना को उनके परिवार के बाद के निवास से जोड़ा गया है।
Journal of the Asiatic Society of Bengal — मूल PDF देखें ↗

Brahma Vaivarta Purana — Devi Radha: Origin, Mahatmyam & Puja Vidhan

ब्रह्मवैवर्त पुराण के इस अध्याय में श्री राधा और श्रीकृष्ण के परस्पर आराध्य-आराधक संबंध तथा राधा की पूजा का वर्णन मिलता है।
मूल स्रोत देखें ↗

Brahma Vaivarta Purana — Krishna Janma Khanda, 4.17.223

इस श्लोक में “राधा” नाम की निरुक्ति करते हुए ‘रा’ को दानवाचक तथा राधा को निर्वाणदात्री बताया गया है।

श्लोक एवं संदर्भ देखें ↗

पिछला लेखदूबड़ी आठे की कथा और इसकी पूजन विधि क्या है? |Dubdi Aathe ki Katha|
अगला लेखBandikui Railway Station To Mehandipur Balaji | कैसे जाएं पूरी जानकारी
PUNIT NAGAR
पुनीत नागर JSBJM.org के संस्थापक और लेखक हैं। वे मेहंदीपुर बालाजी धाम, मंदिर से जुड़ी धार्मिक परंपराओं, दर्शन, अर्जी-दरखास्त, हनुमान भक्ति और सनातन धर्म से संबंधित विषयों पर हिंदी में लेख लिखते हैं। उनका प्रयास उपलब्ध आधिकारिक एवं विश्वसनीय स्रोतों, शोध सामग्री, पुस्तकों तथा संबंधित धार्मिक और स्थानीय परंपराओं के संदर्भ में जानकारी को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है। जहाँ किसी जानकारी का आधार धार्मिक मान्यता या स्थानीय परंपरा होता है, उसे उसी संदर्भ में स्पष्ट करने का प्रयास किया जाता है।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें