परिवर्तिनी एकादशी की कथा – Parivartini Ekadashi ki Katha

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परिवर्तिनी एकादशी व्रत (Parivartini Ekadashi Vrat) भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाता है। इसे पद्मा एकादशी, वामन एकादशी तथा करवटनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में करवट बदलते हैं। श्रद्धापूर्वक व्रत, पूजा और कथा का श्रवण करने से भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है तथा सुख, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

यदि आप वर्षभर आने वाली सभी एकादशियों, उनकी तिथि, व्रत नियम और धार्मिक महत्व के बारे में जानना चाहते हैं, तो एकादशी व्रत की संपूर्ण जानकारी भी पढ़ सकते हैं। आइए जानते हैं परिवर्तिनी एकादशी की पूजा विधि, कथा, महत्व और व्रत के लाभ।

परिवर्तिनी एकादशी की खास बातें

परिवर्तिनी एकादशी के अन्य नाम क्या हैं? परिवर्तिनी एकादशी (Parivartini Ekadashi), पद्मा एकादशी (Padma Ekadashi), करवटनी एकादशी (Karvatni Ekadashi) और बामन एकादशी।
परिवर्तिनी एकादशी व्रत कब किया जाता है? यह व्रत भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है।
Parvartini Ekadashi 2026 कब है? 22 सितम्बर 2026 को।
परिवर्तिनी एकादशी के दिन किसकी पूजा की जाती है? विष्णु भगवान् और लक्ष्मी जी की।

परिवर्तिनी एकादशी की कथा - Parivartini Ekadashi ki Katha

परिवर्तिनी एकादशी का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी भगवान विष्णु की विशेष आराधना का पर्व है। इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में करवट बदलते हैं, इसलिए इसे करवटनी एकादशी भी कहा जाता है। माता लक्ष्मी की पूजा करने तथा भगवान विष्णु का व्रत रखने से सुख, समृद्धि, पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति का फल बताया गया है।

परिवर्तिनी एकादशी का व्रत भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाता है। इसे करवटनी एकादशी (Karvatni Ekadashi) भी कहते हैं।

परिवर्तिनी एकादशी को करवटनी एकादशी क्यों कहा जाता है? (Parivartini Ekadashi – Karvatni Ekadashi)

इस दिन भगवान् विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग शैय्या पर शयन करते हुए करवट बदलते हैं इसीलिये इसे करवटनी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन लक्ष्मी जी की पूजा करना उत्तम माना गया है क्योंकि देवताओं ने अपने राज्य को फिर से पाने के लिए महालक्ष्मी का ही पूजन और अर्चन किया था।

परिवर्तिनी एकादशी व्रत की पूजा विधि

  • प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की पूजा करें।
  • तुलसी, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • दिनभर व्रत रखें तथा यथाशक्ति फलाहार करें।
  • वामन भगवान तथा विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें।
  • रात्रि में भजन-कीर्तन करें।
  • द्वादशी तिथि में ब्राह्मण को भोजन कराकर दान-दक्षिणा दें।

परिवर्तिनी एकादशी की कथा (Parivartini Ekadashi Ki Katha)

त्रेता युग में भक्त प्रहलाद का पौत्र राजा राज्य करता था। वह ब्राह्मणों का सेवक तथा भगवान् विष्णु जी का उपासक था। अपने बल के कारण उसने देवताओ पर विजय प्राप्त कर ली और इन्द्र से इन्द्रासन छीन कर देवताओ को स्वर्ग लोक से निकाल दिया।

देवताओं को दुःखी देखकर भगवान् ने बामन का वेष धारण करके बलि के द्वार पर आकर भिक्षा मांगते हुए कहा, “हे राजन! मुझे केवल तीन पग भूमि का दान चाहिये।”

राजा बलि ने उत्तर दिया, “मैं आपको तीन लोक दे सकता हूं, विराट रूप धारण करके नाप लो।” बामन (भगवान) ने विराट रूप धारण किया और दो पग में पूरी पृथ्वी को नाप लिया।

जब उन्होंने तीसरा पग उठाया तो बलि ने सिर नीचे धर दिया। प्रभु ने चरण धरकर दबाया तो बलि पाताल लोक में जा पहुंचा।

जब भगवान् चरण उठाने लगे तो बलि ने हाथ पकड़कर कहा,”मैं इन्हें मंदिर में रखूँगा। भगवान् बोले,”यदि तुम परिवर्तिनी एकादशी व्रत (Parivartini Ekadashi Vrat) का पूर्ण विधिवत रूप से पालन करो तो मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूंगा और मैं तुम्हारे द्वार पर कुटिया बनाकर रहूंगा।”

आज्ञानुसार राजा बलि ने परिवर्तिनी एकादशी का व्रत विधि पूर्वक किया। तभी से भगवान् की एक प्रतिमा द्वारपाल बनकर पाताल में और एक क्षीरसागर मे निवास करने लगी।

परिवर्तिनी एकादशी के बाद आने वाली इन्दिरा एकादशी विशेष रूप से पितरों की सद्गति और भगवान विष्णु की आराधना के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।

इन्दिरा एकादशी के बाद आने वाली पापांकुशा एकादशी का भी सनातन धर्म में विशेष महत्व बताया गया है।

परिवर्तिनी एकादशी व्रत के लाभ

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस व्रत से पापों का नाश, आर्थिक समृद्धि, मानसिक शांति तथा आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। श्रद्धापूर्वक व्रत करने वाले भक्तों को मोक्ष का फल प्राप्त होने की भी मान्यता है।

निष्कर्ष

परिवर्तिनी एकादशी भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना का अत्यंत शुभ पर्व माना जाता है। श्रद्धा और विधि-विधान से इस व्रत को करने तथा कथा का श्रवण करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है। यदि आप अन्य एकादशियों की कथा, पूजा विधि और महत्व भी जानना चाहते हैं, तो हमारी अन्य एकादशी संबंधी जानकारी भी अवश्य पढ़ें।

परिवर्तिनी एकादशी से जुड़े प्रश्न

परिवर्तिनी एकादशी को करवटनी एकादशी क्यों कहा जाता है?

धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में करवट बदलते हैं, इसलिए इसे करवटनी एकादशी कहा जाता है।

परिवर्तिनी एकादशी किस भगवान को समर्पित है?

यह एकादशी भगवान विष्णु के वामन स्वरूप तथा माता लक्ष्मी को समर्पित मानी जाती है।

क्या परिवर्तिनी एकादशी पर चावल खाना चाहिए?

एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित माना गया है। इसलिए सात्विक व्रत भोजन ही करना चाहिए।

परिवर्तिनी एकादशी का पारण कब किया जाता है?

द्वादशी तिथि में निर्धारित शुभ समय पर भगवान विष्णु की पूजा के बाद व्रत का पारण किया जाता है।

अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक ग्रंथों, पुराणों तथा प्रचलित सनातन मान्यताओं पर आधारित है। विभिन्न क्षेत्रों और परंपराओं के अनुसार पूजा-विधि एवं मान्यताओं में थोड़ा अंतर हो सकता है।

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PUNIT NAGAR
पुनीत नागर JSBJM.org के संस्थापक और लेखक हैं। वे मेहंदीपुर बालाजी धाम, मंदिर से जुड़ी धार्मिक परंपराओं, दर्शन, अर्जी-दरखास्त, हनुमान भक्ति और सनातन धर्म से संबंधित विषयों पर हिंदी में लेख लिखते हैं। उनका प्रयास उपलब्ध आधिकारिक एवं विश्वसनीय स्रोतों, शोध सामग्री, पुस्तकों तथा संबंधित धार्मिक और स्थानीय परंपराओं के संदर्भ में जानकारी को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है। जहाँ किसी जानकारी का आधार धार्मिक मान्यता या स्थानीय परंपरा होता है, उसे उसी संदर्भ में स्पष्ट करने का प्रयास किया जाता है।

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