सोमवार व्रत कथा, सौम्य प्रदोष, सोलह सोमवार और सोमवती अमावस्या की व्रत कथा।

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सोमवार व्रत कथा, सौम्य प्रदोष व्रत कथा, सोलह सोमवार व्रत कथा और सोमवती अमावस्या की व्रत कथा।

सोमवार व्रत कथा, सौम्य प्रदोष व्रत कथा, सोलह सोमवार व्रत कथा और सोमवती अमावस्या की व्रत कथा।

शिवजी के सोमवार, सौम्य प्रदोष, सोलह सोमवार और सोमवती अमावस्या की व्रत कथा।

  1. साधारण सोमवार की व्रत कथा
  2. सौम्य प्रदोष व्रत कथा
  3. सोलह सोमवार व्रत कथा
  4. सोमवती अमावस्या की व्रत कथा

सोमवार का व्रत करने की विधि

सोमवार का व्रत साधारणतया दिन के तीसरे पहर तक होता है। व्रत में फलाहार या पारायण का कोई खास नियम नहीं है। किन्तु यह आवश्यक है कि दिन रात में केवल एक समय भोजन करें। सोमवार के व्रत में शिवजी पार्वती का पूजन करना चाहिए। सोमवार के व्रत तीन प्रकार के होते हैं। साधारण सोमवार, सौम्य प्रदोष और सोलह सोमवार इन तीनों की कथा अलग अलग लिखी जा रही है –

सोमवार व्रत कथा

एक बहुत धनवान साहूकार था, जिसके घर धन आदि किसी प्रकार की कमी नहीं थी। परन्तु उसको एक दुःख था कि उसके कोई पुत्र नहीं था। वह इसी चिंता में रात दिन रहता था। वह पुत्र की कामना के लिए प्रति सोमवार को शिव जी का व्रत और पूजन किया करता था तथा सांयकाल को शिव मंदिर में जाकर शिवजी के शिव विग्रह के सामने दीपक जलाया करता था।

उसके इस भक्ति भाव को देखकर एक समय श्री पार्वती जी ने शिवजी महाराज से कहा कि महाराज! यह साहूकार आपका अनन्य भक्त है और सदैव आपका व्रत और पूजन बड़ी श्रद्धा से करता है। इसकी मनोकामना पूर्ण करनी चाहिए।

शिवजी ने कहा, “हे पार्वती। यह संसार कर्म क्षेत्र है। जैसे किसान खेत में जैसा बीज बोता है वैसा ही फल काटता है। उसी तरह इस संसार में जो जैसा कर्म करते हैं वैसा फल पाते हैं।” पार्वती जी ने अत्यन्त आग्रह से कहा, “महाराज! जब यह आपका अनन्य भक्त है और इसको अगर किसी प्रकार का दुःख है तो इसको अवश्य दूर करना चाहिए।

क्योंकि आप सदैव अपने भक्तों पर दयालु होते हैं और उनके दुखों को दूर करते हैं। यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो मनुष्य आपकी सेवा तथा व्रत क्यों करेंगे?”

पार्वती जी का ऐसा आग्रह देख शिव जी महाराज कहने लगे कि हे पार्वती! इसके कोई पुत्र नहीं है। इसी चिंता मे यह अति दुःखी रहता है। इसके भाग्य में पुत्र नहीं है। इसके भाग्य में पुत्र न होने पर भी मैं इसको पुत्र की प्राप्ति का वर देता हूं।

परन्तु य़ह पुत्र केवल बारह वर्ष तक जीवित रहेगा। इसके पश्चात वह मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा। इससे अधिक मैं और कुछ इसके लिए नहीं कर सकता। ये सब बातें साहूकार सुन रहा था। इससे उसको न कुछ प्रसन्नता हुई और न ही कुछ दुख हुआ।

वह पहले जैसा ही शिवजी का व्रत और पूजन करता रहा। कुछ काल व्यतीत हो जाने पर साहूकार की स्त्री गर्भवती हुई और दसवें महीने उसके गर्भ से अति सुन्दर पुत्र की प्राप्ति हुई।

साहूकार के घर में बहुत खुशी मनायी गयी परन्तु साहूकार ने उसकी केवल बारह वर्ष की आयु जान कर कोई अधिक प्रसन्नता प्रकट नहीं की। और न ही किसी को भेद ही बताया।

जब वह बालक ग्यारह वर्ष का हो गया तो उस बालक की माता ने उसके पिता से विवाह आदि के लिए कहा तो वह साहूकार कहने लगा कि अभी मैं इसका विवाह नहीं करूंगा। अपने पुत्र को काशी जी पढ़ने के लिए भेजूंगा।

फिर साहूकार ने अपने साले को बुलाया उसको बहुत सा धन देकर कहा – तुम इस बालक को काशी जी पढ़ने के लिए ले जाओ और रास्ते में जिस स्थान पर भी जाओ यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते जाओ।

वे दोनों मामा – भानजे यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते जा रहे थे। रास्ते में उनको एक शहर पड़ा। उस शहर में राजा की कन्या का विवाह था और दूसरे राजा का लड़का जो विवाह के लिए बारात लेकर आया था वह एक आंख से काना था।

उसके पिता को इस बात की बड़ी चिंता थी कि कहीं वर को देख कन्या के माता-पिता विवाह में किसी प्रकार की अड़चन पैदा न कर दें। इस कारण जब उसने अति सुन्दर सेठ के लड़के को देखा तो मन में विचार किया कि क्यों न दरवाजे के समय इस लड़के से वर का काम चलाया जाये। ऐसा विचार कर वर के पिता ने उस लड़के के मामा से बात की तो वे राजी हो गए।

फिर वह उस लड़के को वर के कपड़े पहना कर तथा घोड़ी पर चढ़ा दरवाजे पर ले गये और सब कार्य प्रसन्नता से पूर्ण हो गये।

फिर वर के पिता ने सोचा कि यदि विवाह कार्य भी इसी लड़के से करा लिया जाये तो क्या बुराई है? ऐसा विचार करके लड़के और उसके मामा से कहा – यदि आप फेरों का और कन्यादान के काम को भी करा दें तो आपकी बड़ी कृपा होगी और मैं इसके बदले में आपको कुछ धन दूंगा। तो उन्होंने स्वीकार कर लिया और विवाह कार्य भी बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो गया।

परन्तु जिस समय लड़का जाने लगा तो उसने राजकुमारी की चुनदड़ी के पल्ले पर लिख दिया कि तेरा विवाह तो मेरे साथ हुआ है परन्तु जिस राजकुमार के साथ तुमको भेजेंगे वह एक आंख से काना है और मैं काशी जी पढ़ने जा रहा हूं।

लड़के के जाने के पश्चात उस राजकुमारी ने जब अपनी चुनरी पर ऐसा लिखा हुआ पाया तो उसने राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया और कहा कि यह मेरा पति नहीं है। मेरा विवाह इसके साथ नहीं हुआ है। वह तो काशी जी पढ़ने गया है।

राजकुमारी के माता-पिता ने अपनी कन्या को विदा नहीं किया और बारात वापस चली गयी।

उधर सेठ का लड़का और उसका मामा काशी जी पहुंच गये। वहां जाकर उन्होंने यज्ञ करना और लड़के ने पढ़ना शुरू कर दिया। जब लड़के की आयु बारह वर्ष की हो गयी, उस दिन उन्होंने यज्ञ रचा रखा था कि लड़के ने अपने मामा से कहा कि मामाजी आज मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है।

मामा ने कहा अन्दर जाकर सो जाओ। लड़का अंदर जाकर सो गया और थोड़ी देर में उसके प्राण निकल गये। जब उसके मामा ने आकर देखा कि वह मुर्दा पड़ा है। यह देख उसको बड़ा दुख हुआ और उसने सोचा कि अगर मैं अभी रोना पीटना मचा दूंगा तो यज्ञ का कार्य अधूरा रह जायेगा।

अतः उसने जल्दी से यज्ञ का कार्य समाप्त कर ब्राह्मणों के जाने के बाद रोना पीटना आरंभ कर दिया। संयोगवश, उसी समय शिव पार्वती जी उधर से जा रहे थे। जब उन्होंने जोर जोर से रोने की आवाज सुनी तो पार्वती जी कहने लगी हे महाराज! कोई दुखिया रो रहा है। इसके कष्ट दूर कीजिये।

जब शिव पार्वती जी ने पास जाकर देखा तो वहां एक लड़का मुर्दा पड़ा था। पार्वती जी कहने लगी, महाराज! यह तो उसी सेठ का लड़का है जो आपके वरदान से हुआ था।

शिवजी कहने लगे, हे पार्वती! इसकी आयु इतनी ही थी सो भोग चुका। तब पार्वती जी ने कहा कि महाराज! इस बालक को और आयु दो, नहीं तो इसके माता पिता तड़प तड़प कर मर जायेंगे।

पार्वती के बार बार आग्रह करने पर शिवजी ने उसको जीवन का वरदान दिया और शिवजी महाराज की कृपा से लड़का जीवित हो गया। शिव पार्वती कैलाश पर्वत चले गये।

तब वह लड़का और मामा उसी प्रकार यज्ञ करते तथा ब्राह्मणों को भोजन कराते अपने घर की ओर चल पड़े। रास्ते में उसी शहर आए जहां उसका विवाह हुआ था।

वहां पर आकर उन्होंने यज्ञ प्रारम्भ कर दिया तो उस लड़के के ससुर ने उसको पहचान लिया और अपने महल में ले जाकर उसकी बड़ी खातिर की। साथ ही बहुत दास दासियों सहित आदरपूर्वक लड़की और जमाई को विदा किया।

जब वह अपने शहर के निकट आये तो मामा ने कहा कि मैं पहले तुम्हारे घर जाकर खबर कर आता हूं। जब उस लड़के का मामा घर पहुंचा तो लड़के के माता-पिता घर की छत पर बैठे थे और यह प्रण कर रखा था कि यदि हमारा पुत्र सकुशल लौट आया तो हम राजी खुशी नीचे आ जायेंगे।

नहीं तो छत से गिरकर अपने प्राण खो देंगे। इतने में उस लड़के के मामा ने आकर यह समाचार दिया कि आपका पुत्र आ गया है। पर उनको विश्वास नहीं हुआ। तब उसके मामा ने शपथ पूर्वक कहा कि आपका पुत्र अपनी स्त्री के साथ बहुत सारा धन लेकर आया है।

तो सेठ ने आनंद के साथ उसका स्वागत किया और बड़ी प्रसन्नता के साथ रहने लगे। इस प्रकार से जो कोई भी सोमवार के व्रत धारण करता है अथवा इस कथा को पढ़ता या सुनता है उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

सोमवार व्रत की आरती

आरती करत जनक कर जोरे। बड़े भाग्य राम जी घर आये मोरे ॥ टेक ॥

जीत स्वयंवर धनुष चढ़ाये। सब भूपन के गर्व मिटाये॥

तोरि पिनाक किए दुई खंडा। रघुकुल हर्ष रावणमन शंका ॥

आयी है लिए संग सहेली। हरिश निरख वरमाला मेली॥

गज मोतियन के चौक पुराए। कनक कलश भरि मंगल गाए ॥

कंचन थार कपूर की बाती। सुर नर मुनि ज़न आए बराती ॥

फिरत भंवरी बाजा बाजे। सिया सहित रघुबीर विराजे॥

धनि धनि राम लखन दोऊ भाई। धनि धनि दशरथ कौशल्या माई॥

राजा दशरथ जनक विदेही। भरत शत्रुध्न परम स्नेही ॥

मिथिलापुर मे बजत बधाई। दास मुरारी स्वामी आरती गायी ॥

सौम्य प्रदोष व्रत कथा :-

पूर्वकाल में एक ब्राह्मणी अपने पति की मृत्यु के पश्चात निराश्रित होकर भिक्षा मांगने लग गई। वह प्रातः होते ही अपने पुत्र को साथ लेकर बाहर निकल जाती है और संध्या होने पर घर वापिस लौटती।

एक समय उसको विदर्भ देश का राजकुमार मिला। जिसके पिता को शत्रुओं ने मारकर उसको राज्य से बाहर निकाल दिया था। इस कारण वह मारा मारा फिरता था।

ब्राह्मणी उसे अपने घर ले गई और उसका पालन पोषण करने लगी। एक दिन उन दोनों बालकों ने वन में खेलते खेलते गंधर्व कन्याओं को देखा।

ब्राह्मण का बालक तो अपने घर आ गया परन्तु राजकुमार साथ नहीं आया क्योंकि वह अंशुमति नाम की गंधर्व कन्या से बातें करने लगा था।

दूसरे दिन वह फिर से अपने घर से आया। वहां पर अंशुमति अपने माता-पिता के साथ बैठी थी। उधर ब्राह्मणी ऋषियों की आज्ञा से प्रदोष का व्रत करती थी। कुछ दिन पश्चात्‌ अंशुमति के माता पिता ने राजकुमार से कहा कि तुम विदर्भ देश के राजकुमार धर्मदत्त हो, हम श्री शंकर जी की आज्ञा से अपनी पुत्री अंशुमति का विवाह तुम्हारे साथ कर देते हैं।

फिर राजकुमार का विवाह अंशुमति के साथ हो गया। बाद में राजकुमार ने गंधर्व राज की सेना की सहायता से विदर्भ देश पर अधिकार कर लिया और ब्राह्मण के पुत्र को अपना मंत्री बना लिया। यथार्थ में यह सब उस ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत करने का फल था। बस उसी समय से यह व्रत संसार में प्रतिष्ठित हुआ।

सोलह सोमवार व्रत कथा

मृत्युलोक में विवाह करने की इच्छा करके एक समय श्री भूतनाथ महादेव जी माता पार्वती के साथ पधारे। वहां वे भ्रमण करते करते विदर्भ देशांतर्गत अमरावती नाम की अति रमणीक नगरी में पहुंचे।

अमरावती नगरी अमरपुरी के सदृश सब प्रकार के सुखों से परिपूर्ण थी। उसमें वहां के महाराज का बनाया हुआ अति रमणीक शिवजी का मंदिर बना था। उसमें भगवान् शंकर भगवती पार्वती के साथ निवास करने लगे।

एक समय माता पार्वती प्राण पति को प्रसन्न देखकर मनो विनोद करने की इच्छा से बोली, हे महाराज! आज तो हम तुम दोनों चौसर खेलें। शिवजी ने प्राणप्रिय की बात को मान लिया और चौसर खेलने लगे।

उस समय इस स्थान पर मंदिर का पुजारी मंदिर में पूजा करने को आया। माताजी ने ब्राह्मण से प्रश्न किया कि पुजारी जी बताओ, इस बाजी में दोनों में किसकी जीत होगी?

ब्राह्मण बिना विचारे ही शीघ्र बोल उठा कि महादेव जी की जीत होगी। थोड़ी देर में बाजी समाप्त हो गयी और पार्वती जी की विजय हुई। अब तो पार्वती जी ब्राह्मण को झूठ बोलने के अपराध के कारण शाप देने को उधृत हुई।

तब महादेव जी ने पार्वती जी को बहुत समझाया परन्तु उन्होंने ब्राह्मण को कोढ़ी का शाप दे दिया। कुछ समय बाद पार्वती जी के शाप वश पुजारी के शरीर में कोढ़ पैदा हो गया। इस प्रकार पुजारी अनेक प्रकार से दुखी रहने लगा।

इस प्रकार के दुःख भोगते हुए बहुत दिन हो गए तो देवलोक की अप्सराएं शिवजी की पूजा करने उसी मंदिर में पधारी और पुजारी के कोढ़ के कष्ट को देख बड़े दया भाव से उससे रोगी होने का कारण पूछने लगी। पुजारी ने निःसंकोच सब बातें उनसे कह दी।

वे अप्सराएं बोलीं, हे पुजारी! अब तुम अधिक दुखी मत होना। भगवान् शिवजी तुम्हारे कष्ट को दूर कर देंगे। तुम सब व्रतों में श्रेष्ठ सोलह सोमवार का व्रत भक्ति भाव से करो।

पुजारी अप्सराओं से हाथ जोड़कर विनम्र भाव से (षोडश) सोलह सोमवार व्रत की विधि पूछने लगा। अप्सराएं बोलीं कि जिस दिन सोमवार हो उस दिन भक्ति के साथ व्रत करें, स्वच्छ वस्त्र पहनें, आधा सेर गेहूं का आटा ले उसके तीन अंगा बनावें और घी, गुड़, दीप, नैवेद्य, पूगीफल, बेलपत्र, जनेऊ, जोड़ा, चंदन, अक्षत, पुष्पादि के द्वारा प्रदोष काल में भगवान् शंकर का विधि से पूजन करे।

तत्पश्चात अंगो मे से एक शिवजी को अर्पण करे। बाकी दो को शिवजी की प्रसादी समझकर उपस्थित जनों में बांट दे और आप भी प्रसाद पावे। इस विधि से सोलह सोमवार व्रत करो।

तत्पश्चात सत्रहवें सोमवार के दिन पाव सेर पवित्र गेहूं के आटे की बाटी बनाए। तदनुसार घी और गुड़ मिलाकर चूरमा बनावें और शिवजी का भोग लगाकर उपस्थित भक्तों मे बांटे। पीछे आप सकुटुंब प्रसादी ले तो भगवान् शिवजी की कृपा से उसके मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।

ऐसा कहकर अप्सराएं स्वर्ग को चलीं गयी। ब्राह्मण ने यथाविधि षोडश सोमवार व्रत (सोलह सोमवार व्रत) किया तथा भगवान् शिवजी की कृपा से रोगमुक्त होकर आनंद से रहने लगा।

कुछ समय बाद जब फिर शिवजी और पार्वती उस मंदिर में पधारे तब ब्राह्मण को निरोग देख पार्वती ने ब्राह्मण से रोग मुक्त होने का कारण पूछा तो ब्राह्मण ने सोलह सोमवार व्रत कथा कह सुनायी।

तब तो पार्वती जी ने अति प्रसन्न हो ब्राह्मण से व्रत की विधि पूछकर व्रत करने को तैयार हुई। व्रत करने के बाद उनकी मनोकामना पूर्ण हुई तथा उनके रूठे पुत्र स्वामी कार्तिकेय स्वयं माता के आज्ञाकारी हुए।

परन्तु कार्तिकेय जी को अपने य़ह विचार परिवर्तन का रहस्य जानने की इच्छा हुई और माता से बोले, हे माताजी! आपने ऐसा कौन सा उपाय किया जिससे मेरा मन आपकी ओर आकर्षित हुआ?

तब पार्वती जी ने वहीं सोलह सोमवार व्रत कथा उनको सुनायी। स्वामी कार्तिकेय बोले, कि इस व्रत को मैं भी करूंगा क्योंकि मेरा प्रिय मित्र ब्राह्मण बहुत दुखी दिल से परदेश गया है। हमें उससे मिलने की बहुत इच्छा है।

कार्तिकेय जी ने भी इस व्रत को किया और उनका प्रिय मित्र मिल गया। मित्र ने इस आकस्मिक मिलन का भेद कार्तिकेय जी से पूछा तो वे बोले, हे मित्र! हमने तुम्हारे मिलने की इच्छा करके सोलह सोमवार का व्रत किया था।

अब तो ब्राह्मण मित्र को भी अपने विवाह की बड़ी इच्छा हुई। कार्तिकेय जी से व्रत की विधि पूछी और यथाविधि व्रत किया। व्रत के प्रभाव से जव वह किसी कार्यवश विदेश गया तो वहां के राजा की लकड़ी का स्वयंवर था।

राजा ने प्रण किया था कि जिस राजकुमार के गले मे सभी प्रकार श्रृंगारित हथिनी माला डालेगी मैं उसी के साथ अपनी प्यारी पुत्री का विवाह कर दूंगा। शिवजी की कृपा से ब्राह्मण भी स्वयंवर देखने की इच्छा से राजसभा मे एक ओर बैठ गया।

नियत समय पर हथिनी आयी और उसने जय माला उस ब्राह्मण के गले में डाल दी। राजा की प्रतिज्ञा के अनुसार बड़ी धूमधाम से कन्या का विवाह उस ब्राह्मण के साथ कर दिया और ब्राह्मण को बहुत सा धन और सम्मान देकर संतुष्ट किया। ब्राह्मण सुन्दर राजकन्या पाकर सुख से जीवन व्यतीत करने लगा।

एक दिन राजकन्या ने अपने पति को प्रश्न किया, हे प्राण नाथ! आपने ऐसा कौन सा भारी पुण्य किया जिसके प्रभाव से हथिनी ने सब राजकुमारों को छोड़कर आपका वरण किया? ब्राह्मण बोला, हे प्राणप्रिय! मैंने अपने मित्र कार्तिकेय जी के कथनानुसार सोलह सोमवार का व्रत किया था जिसके प्रभाव से मुझे तुम जैसी स्वरूपमान लक्ष्मी की प्राप्ति हुई।

व्रत की महिमा को सुनकर राजकन्या को बड़ा आश्चर्य हुआ और वह भी पुत्र की कामना करके व्रत करने लगी। शिवजी की दया से उसके गर्भ से एक अति सुन्दर सुशील धर्मात्मा और विद्वान पुत्र उत्पन्न हुआ।

माता-पिता दोनों उस देव पुत्र को पाकर अति प्रसन्न हुए और उसका लालन पालन भली प्रकार से करने लगे। जब पुत्र समझदार हुआ तो एक दिन अपनी माता से प्रश्न किया कि मां! तूने कौन सा तप किया है जो मेरे जैसा पुत्र तेरे गर्भ से उत्पन्न हुआ।

माता ने पुत्र का मनोरथ जानकर अपने किए हुए सोलह सोमवार व्रत को और सब तरह के मनोरथ पूर्ण करने वाला सुना तो वह भी इस व्रत को राज्याधिकार पाने की इच्छा से हर सोमवार को यथाविधि करने लगा।

उसी समय एक देश के वृद्ध राजा के दूतों ने आकर उसका एक राजकन्या के लिए वरन किया। राजा ने अपनी पुत्री का विवाह ऐसे सर्वगुण संपन्न ब्राह्मण युवक के साथ करके बड़ा सुख प्राप्त किया।

वृद्ध राजा के दिवंगत हो जाने पर यही ब्राह्मण बालक गद्दी पर बिठाया गया क्योंकि दिवंगत भूप के कोई पुत्र नहीं था। राज्य का अधिकारी होकर भी वह ब्राह्मण पुत्र अपने सोलह सोमवार के व्रत को करता रहा। जब सत्रहवां सोमवार आया तो विप्र पुत्र ने अपनी प्रियतमा से सब पूजन सामग्री लेकर शिवालय में चलने के लिए कहा।

परन्तु प्रियतमा ने उसकी आज्ञा की परवाह न की। दास दासियों द्वारा सब सामग्रियां शिवालय भिजवा दी। और आप नहीं गयी। जब राजा ने शिवजी का पूजन समाप्त किया तब एक आकाशवाणी राजा के प्रति हुई।

राजा ने सुना कि हे राजा! अपनी इस रानी को राजमहल से निकाल दे नहीं तो तेरा सर्वनाश कर देगी। वाणी को सुनकर राजा के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा और तत्काल ही मंत्रणागृह मे आकर अपने सभासदों को बुलाकर पूछने लगा कि हे मंत्रियों! मुझे आज शिवजी की वाणी हुई है कि राजा तू अपनी इस रानी को निकाल दे नहीं तो ये तेरा सर्वनाश कर देगी।

मंत्री आदि सब बड़े विस्मय और दुख में डूब गए क्योंकि जिस कन्या के कारण राज मिला है, राजा उसी को निकालने का ख्याल रखता है। यह कैसे हो सकेगा? अन्त में राजा ने उसे अपने यहां से निकाल दिया।

रानी दुखी हृदय अपने भाग्य को कोसती हुई नगर से बाहर हुई। बिना पदत्राण, फटे वस्त्र पहनें भूख से दुखी धीरे-धीरे चलकर एक नगर में पहुंची। वहां एक बुढ़िया सूत कातकर बेचने को जाती थी।

रानी की करुण दशा देख बोली, चल तू मेरा सूत बिकवा दे। मैं वृद्ध हूं, भाव नहीं जानती हूं। ऐसी बात बुढ़िया की सुन रानी ने बुढ़िया के सर से सूत की गठरी उतार अपने सर पर रखी। थोड़ी देर बाद आंधी आयी और बुढ़िया का सूत पोटली सहित उड़ गया।

बेचारी बुढ़िया पछताती रह गई। और रानी को अपने साथ से दूर रहने को कह दिया। अब रानी एक तेली के घर गयी तो तेली के सब मटके शिवजी के प्रकोप के कारण उसी समय चटक गये। ऐसी दशा देख तेली ने रानी को अपने घर से निकाल दिया।

इस प्रकार रानी अत्यंत दुख पाती हुई सरिता के तट पर गयी तो सरिता का समस्त जल सूख गया। तत्पश्चात रानी एक वन में गयी, वहां जाकर सरोवर में सीढ़ी से उतरकर पानी पीने गयी।

उसके हाथ से जल स्पर्श होते ही सरोवर का नीलकमल के सदृश जल में असंख्य कीड़े पड़ गये और गंदा हो गया। रानी ने भाग्य पर दोषारोपण करते हुए उस जल को पान करके पेड़ की शीतल छाया मे विश्राम करना चाहा।

वह रानी जिस पेड़ के नीचे जाती उस पेड़ के पत्ते तत्काल ही गिरते गए। वन सरोवर जल की ऐसी दशा देखकर गौ चराते ग्वालों ने अपने गोसाई जी से, जो जंगल मे स्थित मंदिर मे पुजारी थे कहीं।

गोसाई जी के आदेशानुसार ग्वाले रानी को पकड़कर गोसाई जी के पास ले गए। रानी की मुख कांति और शरीर शोभा देख गोसाई जी जान गये यह अवश्य ही कोई विधि की गति की मारी कुलीन अबला है।

ऐसा सोच पुजारी जी ने रानी के प्रति कहा, पुत्री! मैं तुमको पुत्री के समान रखूँगा। तुम मेरे आश्रम में ही रहो। मैं तुमको किसी प्रकार का कष्ट नहीं दूंगा। गोसाई के ऐसे वचन सुन रानी को धीरज हुआ और आश्रम में रहने लगी।

परन्तु आश्रम में रानी जो भोजन बनाती उसमें कीड़े पड़ जाते, जल भरकर लाती उसमें कीड़े पड़ जाते। अब तो गोसाई जी भी दुखी हुए और रानी से बोले, हे बेटी! तेरे पर कौन से देवता का कोप है, जिससे तेरी ऐसी दशा है?

पुजारी की बात सुन रानी ने शिवजी की पूजा करने न जाने की कथा सुनाई तो पुजारी शिवजी महाराज की अनेक प्रकार से स्तुति करते हुए रानी के प्रति बोले कि बाई! तुम सब मनोरथ पूर्ण करने वाले सोलह सोमवार व्रत को करो। उसके प्रभाव से अपने कष्ट से मुक्त हो सकोगी।

गोसाई की बात सुनकर रानी ने सोलह सोमवार व्रत को विधिवत संपन्न किया और सत्रहवें सोमवार को पूजन के प्रभाव से राजा के हृदय में विचार उत्पन्न हुआ कि रानी को गए बहुत समय व्यतीत हो गया, न जाने कहां कहां भटकती होगी, ढूंढना चाहिए।

यह सोच रानी को तलाश करने चारों दिशाओं में दूत भेजे। वे तलाश करते हुए पुजारी के मंदिर में पहुंचे लेकिन पुजारी जी ने उनसे मना कर दिया तो दूत चुपचाप लौटे और आकर महाराज के सम्मुख रानी का पता बतलाने लगे।

रानी का पता पाकर राजा स्वयं पुजारी के आश्रम में गये और पुजारी से प्रार्थना करने लगे कि महाराज! जो बाई जी आपके आश्रम में रहती है वह मेरी पत्नी है। शिवजी के कोप से मैंने इसको त्याग दिया था। अब इस पर से शिवजी का कोप शांत हो गया है, इसलिए मैं इसे ले जाने आया हूं।

आप इसे मेरे साथ चलने की आज्ञा दे दीजिए। गोसाई जी ने राजा के वचन को सत्य समझकर रानी को राजा के साथ जाने की आज्ञा दे दी।

गोसाई की आज्ञा पाकर रानी प्रसन्न होकर राजा के साथ महल में आयी, नगर में अनेक प्रकार के बाजे बजने लगे। पंडितों ने विविध वेद मंत्रों का उच्चारण करके अपनी राज रानी का स्वागत किया।

ऐसी अवस्था में रानी ने पुनः अपनी राजधानी में प्रवेश किया। महाराज ने अनेक तरह से ब्राह्मणों को दान आदि देकर संतुष्ट किया। याचकों को धन धान्य दिया। नगर में स्थान स्थान पर सदाव्रत खुलवाए जहां भूखों को खाने को मिलता था।

इस प्रकार से राजा शिवजी की कृपा का पात्र हो राजधानी में रानी के साथ अनेक तरह से सुखों को भोग करते सोमवार व्रत करने लगे। विधिवत शिव पूजन करते हुए अनेकानेक सुखों को भोगने के पश्चात शिवपुरी को पधारे।

ऐसे ही जो मनुष्य मनसा, वाचा, कर्म भक्ति सहित सोलह सोमवार का व्रत पूजन इत्यादि विधिवत करता है वह इस लोक में समस्त सुखों को भोगकर अंत में शिवपुरी को प्राप्त होता है। यह व्रत सब मनोरथों को पूर्ण करने वाला है।

सोमवती अमावस्या की कथा

एक साहूकार के सात बेटे, सात बहू और एक बेटी थी। साहूकार के घर एक जोगी भिक्षा लेने आता था तो साहूकार की बहू भिक्षा दे देती थी। जब कभी भी साहूकार की लड़की भिक्षा लेकर आती तो जोगी भिक्षा नहीं लेता था और वह कहता था कि लड़की तो सुहागन है पर भाग्य में दुहाग में लिखा है।

यह सुनकर लड़की रोने लगी। मां ने पूछा बेटी तुझे किस बात की चिंता है, अब वह लड़की बोली कि एक जोगी भिक्षा लेने को आता है। वह कहता है कि तू सुहागन नहीं तेरे भाग्य में दुहाग लिखा है।

यह बात सुनकर मां बोली कि उस जोगी की बात मैं भी सुनूंगी। अगले दिन मां छुपकर बैठ गयी। जोगी भिक्षा लेने आया लड़की भिक्षा देने लगी तो आज भी जोगी ने वैसा ही बोला।

इतनी बात सुनकर मां निकलकर आ गयी और बोली कि एक तो हम तुझे भिक्षा देते हैं और ऊपर से तू हमें गाली देता है। जोगी बोला कि मैं गाली नहीं देता सच्ची बात कहता हूं। इसके भाग्य में ऐसा ही लिखा है।

तब मां बोली कि अगर तुझे इतना ही मालूम है तो इससे बचने का उपाय भी मालूम होगा। जोगी बोला कि सात समंदर पार एक सोना धोबन रहती है। जिसने सोमवती अमावस्या कर रखी है। अगर वह इसे आकर फल दे दे तो इसका दूहाग टल सकता है। नहीं तो विवाह के समय इसकी सर्प काटने से इसकी मृत्यु हो जायेगी।

यह बात सुनकर मां बहुत रोने लगी। अब मां सोना धोबन के पास गयी। रास्ते में बहुत तेज धूप पड़ रही थी। तो एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गयी। पेड़ पर गरुड़ पंखनी का बच्चा रहता था जिसे सांप डसने आया तो साहूकारनी ने सांप को मार दिया और बच्चों को बचा लिया।

अब गरुड़ पंखनी आयी और सब जगह खून देखकर साहूकारनी को चोंच मारने लगी। साहूकारनी बोली, मैंने तो तेरा बच्चा बचाया है। अब गरुड़ पंखनी बोली कि तूने मेरे बच्चे को बचाया है तो कुछ मांग ले।

साहूकारनी बोली, पहले वचन भरो। गरुड़ पंखनी बोली मैं तुझे वचन देती हूं। साहूकारनी बोली मुझे सात समुन्दर पार सोना धोबन के घर छोड़ दो। अब गरुड़ पंखनी ने उसे सोना धोबन के घर छोड़ दिया।

वहां जाकर साहूकारनी ने सोचा कि अब इसको कैसे मनाऊँ। सोना धोबन के घर सात बहू थी जो कि घर का काम करने के लिए आपस में हर समय लड़ती झगड़ती थी।

रात को सब सो जाते तो साहूकारनी सोना धोबन के घर जाती। और उनका सारा काम कर देती और दिन निकलने से पहले ही चली जाती। अब सारी बहू आपस में सोचती थी कि सारे घर का काम कौन करता है। और वे आपस में भी एक दूसरे को भी कुछ नहीं पूछती थी।

एक दिन सोना धोबन ने बहुओं से पूछा कि आजकल तुम आपस में लड़ती झगड़ती भी नहीं हो सारे घर का काम कौन करता है? अब बहू बोली कि काम तो हमको ही करना पड़ता है। लड़ाई करने से क्या फायदा।

सोना धोबन ने सोचा कि आज मैं देखूंगी कि कौन सी बहू सारा काम करती है। रात को देखा कि एक औरत आयी और घर का सारा काम करके जाने लगी तो सोना धोबन ने पूछा, तू कौन है? तुझे क्या चाहिये?

साहूकारनी बोली, पहले वचन भरो। तब सोना धोबन उसे वचन देती है। अब साहूकारनी बोली कि मेरी बेटी के भाग्य में दुहाग लिखा है। सो तू चलकर सुहाग दे दे क्योंकि तूने सोमवती अमावस्या कर रखी है।

सोना धोबन अपने बहू बेटों से बोली कि मैं तो इसके साथ जा रही हूं। पीछे तुम्हारे पिताजी मर जाये तो उन्हें तेल के कूपे में डालकर रख देना।

अब वह साहूकारनी के घर आ गयी। साहूकारनी ने अपनी बेटी का विवाह किया जब फेरे होने लगे तो सोना धोबन कच्चा करवा दूध और तार लेकर बैठ गयी।

थोड़ी देर में साँप आया और उस लड़के को डसने लगा तो सोना धोबन ने करवा आगे कर तार से साँप को बाँध दिया। डर के मारे साँप मर गया। अब सोना धोबन ने उसे सुहाग दे दिया।

और बोली कि जितनी अमावस्या मैंने करी है उन सबका फल साहूकार की बेटी को मिलेगा और जो आगे करूंगी उनका फल मेरे पति और बेटे को मिलेगा।

हर कोई सोमवती की जय जय कार बोलने लगे। सोना धोबन जाने लगी तो साहूकारनी बोली, कुछ मांग लो तुमने मेरे जमाई को जीवन दान दिया है। वह बोली, मुझे कुछ नहीं चाहिये। यह कहकर वह चली गयी।

अब उसे रास्ते में फिर सोमवती अमावस्या आ गयी। उसने पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर कहानी कही। व्रत किया और पीपल की 108 फेरी लगाई। पीपल की पूजा करने के बाद वह घर पर गई वहां पर जाकर देखा तो उसका पति मरा पड़ा है।

जो उसने सोमवती अमावस्या रास्ते में की थी उसका फल अपने पति को दे दिया। अब उसका पति जिन्दा हो गया। सब कहने लगे तूने क्या किया जो यह जिन्दा हो गया, तो वह बोली, मैंने तो कुछ नहीं किया है रास्ते में सोमवती अमावस्या आयी थी सो उसकी पूजा करी थी, व्रत किया और 108 फेरी पीपल की लगायी।

सारी नगरी में ढिंढोरा पिटवा दिया कि सब कोई सोमवती अमावस्या की पूजा करियो, व्रत रखियो, 108 फेरी पीपल की लगाइयो। हे सोमवती अमावस्या जैसा साहूकार की बेटी का सुहाग दिया। वैसा सब किसी को देना।

सोमवार व्रत के नियम

  • प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान शिव तथा माता पार्वती का पूजन करें।
  • पूजा में बेलपत्र, धतूरा, भांग, अक्षत, चंदन, धूप, दीप, फल एवं जल अर्पित करें।
  • व्रत के दौरान सात्विक आहार लें तथा अधिकांश श्रद्धालु दिन में केवल एक बार भोजन करते हैं।
  • सोमवार व्रत कथा, प्रदोष व्रत कथा या सोलह सोमवार व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण करें।
  • शिव मंत्र “ॐ नमः शिवाय” का यथाशक्ति जप करें।
  • क्रोध, असत्य, तामसिक भोजन एवं नशे से दूर रहें।

सोमवार व्रत के लाभ

  • भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त होती है।
  • वैवाहिक जीवन में सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
  • मनोकामनाएं पूर्ण होने की धार्मिक मान्यता है।
  • संतान, स्वास्थ्य एवं पारिवारिक सुख की प्राप्ति होती है।
  • मानसिक शांति एवं आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

यदि आप भगवान शिव से जुड़े अन्य प्रमुख व्रतों की जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो व्रत एवं पूजा, उमा महेश्वर व्रत, शनिवार व्रत, बुधवार व्रत तथा बृहस्पतिवार व्रत के बारे में भी पढ़ सकते हैं।

सोमवार व्रत से जुड़े सामान्य प्रश्न (FAQ)

सोमवार का व्रत किसके लिए किया जाता है?

भगवान शिव की कृपा, मनोकामना पूर्ति, उत्तम वैवाहिक जीवन, संतान सुख एवं मानसिक शांति के लिए सोमवार का व्रत किया जाता है।

सोमवार व्रत में क्या खा सकते हैं?

फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, सिंघाड़े का आटा तथा अन्य सात्विक फलाहार ग्रहण किया जा सकता है।

सोलह सोमवार व्रत कितने सोमवार तक किया जाता है?

यह व्रत लगातार 16 सोमवार तक किया जाता है तथा 17वें सोमवार को विधिपूर्वक उद्यापन किया जाता है।

सोमवती अमावस्या का क्या महत्व है?

जब अमावस्या सोमवार को पड़ती है, उसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है। इस दिन भगवान शिव की पूजा, पीपल पूजन तथा व्रत का विशेष महत्व माना जाता है।

निष्कर्ष

सोमवार व्रत, सौम्य प्रदोष व्रत, सोलह सोमवार व्रत तथा सोमवती अमावस्या व्रत भगवान शिव की उपासना के प्रमुख व्रत माने जाते हैं। श्रद्धा और नियमपूर्वक इन व्रतों का पालन तथा कथाओं का श्रवण करने से सुख, समृद्धि, मनोकामना पूर्ति और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होने की धार्मिक मान्यता है।


अस्वीकरण (Disclaimer): यह पोस्ट धार्मिक ग्रंथों, लोक मान्यताओं एवं प्रचलित परंपराओं के आधार पर तैयार की गई है। विभिन्न क्षेत्रों एवं संप्रदायों में सोमवार व्रत, प्रदोष व्रत, सोलह सोमवार व्रत तथा सोमवती अमावस्या की पूजा-विधि एवं मान्यताओं में भिन्नता हो सकती है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान का पालन अपने कुलाचार, पारिवारिक परंपरा अथवा योग्य आचार्य के मार्गदर्शन में करें।

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PUNIT NAGAR
पुनीत नागर JSBJM.org के संस्थापक और लेखक हैं। वे मेहंदीपुर बालाजी धाम, मंदिर से जुड़ी धार्मिक परंपराओं, दर्शन, अर्जी-दरखास्त, हनुमान भक्ति और सनातन धर्म से संबंधित विषयों पर हिंदी में लेख लिखते हैं। उनका प्रयास उपलब्ध आधिकारिक एवं विश्वसनीय स्रोतों, शोध सामग्री, पुस्तकों तथा संबंधित धार्मिक और स्थानीय परंपराओं के संदर्भ में जानकारी को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है। जहाँ किसी जानकारी का आधार धार्मिक मान्यता या स्थानीय परंपरा होता है, उसे उसी संदर्भ में स्पष्ट करने का प्रयास किया जाता है।

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