Krishna Janmashtami Vrat Katha भगवान श्रीकृष्ण के जन्म, धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश से जुड़ी पावन कथा है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं, भगवान श्रीकृष्ण का अभिषेक करते हैं तथा मध्यरात्रि में उनके जन्मोत्सव का उत्साहपूर्वक आयोजन करते हैं। इस लेख में आप Krishna Janmashtami Vrat Katha, जन्म कथा, व्रत विधि, पूजा सामग्री, धार्मिक महत्व तथा जन्माष्टमी से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी विस्तार से जानेंगे।
भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रात के 12 baje मथुरा के राजा कंस की जेल में वासुदेव जी की पत्नी देवी देवकी के गर्भ से सोलह कलाओं से निपुण भगवान श्री कृष्ण ने जन्म लिया था।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी हिन्दू धर्म के प्रमुख पर्वों में से एक है। यदि आप अन्य प्रमुख हिन्दू व्रत, पर्व और त्योहारों की पूजा विधि, कथा और धार्मिक महत्व के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं, तो पर्व एवं त्योहार लेख भी पढ़ सकते हैं।
इस दिन रोहिणी नक्षत्र का विशेष महात्म्य है। इस दिन देश के समस्त मंदिरों का शृंगार किया जाता है। कृष्णवतार के उपलक्ष्य में झांकियां सजाई जाती हैं। भगवान श्री कृष्ण का साज श्रृंगार करके झूला सजाया जाता है। सभी स्त्री पुरुष इस व्रत को करते हैं। और रात के 12 बजे शंख तथा घंटों की आवाज से श्री कृष्ण जी के जन्म की खबर चारों दिशाओं में गूंजती है।
भगवान श्री कृष्ण जी की आरती उतारी जाती है। और इसके बाद प्रसाद बांटा जाता है। और इसी प्रसाद को खाकर लोग व्रत को खोलते हैं।

| पर्व | श्रीकृष्ण जन्माष्टमी |
|---|---|
| तिथि | भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी |
| मुख्य देवता | भगवान श्रीकृष्ण |
| व्रत | निर्जल अथवा फलाहार |
| पूजा का समय | मध्यरात्रि (भगवान श्रीकृष्ण जन्म समय) |
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी क्यों मनाई जाती है?
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। धर्म की रक्षा, अधर्म के विनाश और भक्तों के कल्याण के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा में देवकी और वसुदेव के घर जन्म लिया। इसी दिव्य घटना की स्मृति में प्रत्येक वर्ष जन्माष्टमी का पर्व बड़े श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पूजा सामग्री
- भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप (लड्डू गोपाल) की प्रतिमा या चित्र
- झूला एवं नए वस्त्र
- मोर पंख और बांसुरी
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद एवं शक्कर)
- तुलसी दल
- माखन, मिश्री एवं फल
- धूप, दीप एवं घी का दीपक
- रोली, अक्षत, चंदन
- फूल एवं फूलों की माला
- नारियल एवं मौसमी फल
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पूजा विधि
- प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
- पूजा स्थल को साफ करके भगवान श्रीकृष्ण का झूला सजाएँ तथा लड्डू गोपाल की प्रतिमा स्थापित करें।
- रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण का पंचामृत से अभिषेक करें और स्वच्छ वस्त्र पहनाएँ।
- चंदन, अक्षत, पुष्प, तुलसी दल, धूप और दीप अर्पित करें।
- माखन, मिश्री, फल एवं अन्य नैवेद्य का भोग लगाएँ।
- मध्यरात्रि 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के समय शंख और घंटी बजाकर आरती करें।
- पूजा के बाद प्रसाद वितरित करें और श्रद्धा के अनुसार व्रत का पारण करें।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत के नियम
- पूरे दिन मन, वचन और कर्म की पवित्रता बनाए रखें।
- सामर्थ्य के अनुसार निर्जल या फलाहार व्रत रखें।
- भगवान श्रीकृष्ण के मंत्र, गीता एवं नामस्मरण का अधिक से अधिक जाप करें।
- मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद ही व्रत का पारण करें।
- क्रोध, असत्य और किसी का अपमान करने से बचें।
कृष्ण जन्माष्टमी की कथा – Shri Krishna Janmashtami Vrat Katha
राक्षसों के अत्याचार द्वापर युग में पृथ्वी पर अत्यधिक बढ़ने लगे थे। पृथ्वी का गाय रूप धारण करके अपना दुख सुनाने और अपने उद्धार के लिए ब्रह्मा जी के पास गयी। ब्रह्मा जी सब देवताओं को साथ लेकर पृथ्वी को विष्णु के पास क्षीर सागर ले गये।
उस समय भगवान विष्णु अनन्त शैय्या पर शयन कर रहे थे। विनती और स्तुति करने पर भगवान की निद्रा टूट गयी। ब्रह्मा जी और वहाँ एकत्र समस्त देवतागण को देखकर उन्होंने उनसे आने का कारण पूछा तो पृथ्वी बोली, “भगवन्! मैं पाप के बोझ से दबी जा रही हूं। मेरा उद्धार कीजिए।”
यह सुनकर विष्णु भगवान बोले, “मैं बृज मंडल में वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से जन्म लूंगा। तुम सब देवतागण बृज भूमि में जाकर यादव वंश में जाकर अपना शरीर धारण करो।” इतना कहकर भगवान् अंतर्ध्यान हो गये।
भगवान श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का पूर्णावतार माना जाता है। भगवान विष्णु के एक अन्य दिव्य अवतार के बारे में जानने के लिए भगवान दत्तात्रेय जयंती की कथा भी पढ़ सकते हैं।
इसके बाद देवता ब्रज मंडल में आकर यदुवंश में नंद – यशोदा तथा गोप – गोपियों के रूप में पैदा हुए।
द्वापर काल के अन्त में मथुरा नगरी में राजा उग्रसेन राज्य करते थे। राजा उग्रसेन के पुत्र का नाम कंस था। कंस ने उग्रसेन को बलपूर्वक सिंहासन से उतारकर बंदी बनाकर जेल में डाल दिया। और स्वयं को राजा घोषित कर दिया।
कंस की बहन देवकी का विवाह यादव वंश के कुल में वासुदेव जी के साथ तय किया गया। जब कंस अपनी बहन देवकी को विदा करते हुए रथ के साथ चल रहा था तभी अचानक से एक आकाशवाणी हुई कि हे कंस जिस देवकी को तू इतने लाड़ प्यार के साथ विदा कर रहा है इसी के आठवें पुत्र के हाथों तेरी मृत्यु होगी।
यह बात सुनकर कंस आग बबूला हो गया और फिर उसने अपनी बहन देवकी को मारने की ठान ली। उसने चिंतन किया कि जब देवकी ही नहीं रहेगी तो उसका पुत्र कैसे जन्म ले पाएगा?
कंस का यह गुस्सा देखकर वासुदेव जी ने कंस को समझाते हुए कहा कि तुम्हें बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है देवकी को मारने की। आवश्यकता तो तुम्हें अपनी बहन देवकी के आठवें पुत्र से है इसलिए देवकी को क्यों मारना? अतः हे कंस देवकी की आठवीं सन्तान मैं तुम्हें सौंप दूंगा। फिर तुम्हारा जो मन आए वो उसके साथ करना।
कंस ने वसुदेव जी की बात मान ली। इसके बाद कंस ने वसुदेव जी और अपनी बहन देवकी को कारागार में डाल दिया। तत्काल नारदजी वहां आए और कंस से बोले कि यह कैसे सुनिश्चित किया जा सकेगा कि देवकी का आठवां गर्भ कौन सा होगा? गणना प्रथम गर्भ से या फिर अंतिम गर्भ से होनी चाहिए।
कंस ने नारदजी की सलाह को मान लिया। एवं देवकी के गर्भ से जो भी सन्तान ने जन्म लिया उन सभी को जान से मारने की ठान ली। अपनी सोच के अनुसार कंस ने एक एक करके देवकी के 6 पुत्रों को बेरहमी से मार डाला।
भाद्रपद मास को रोहिणी नक्षत्र में कृष्ण पक्ष की अष्टमी को श्री कृष्ण जी का जन्म हुआ। कृष्ण जी के जन्म लेते ही जेल परिसर में मौसम प्रकाशमय हो उठा। वसुदेव और देवकी जी के सामने गदा, चक्र, शंख और पद्मधारी चतुर्भुज भगवान् ने अपना रूप प्रकट करते हुए कहा कि अब मैं शिशु का रूप धारण करता हूं। तुम मुझे फौरन गोकुल में नन्द जी के घर ले जाना। वहां उनके घर एक कन्या ने जन्म लिया है उसे यहां लाकर आप कंस को दे देना और बोलना कि कन्या ने जन्म लिया है।
वसुदेव जी के हाथों में बंधी बेड़ियां खुल गई। दरवाजे अपने आप खुलते चले गए। सुरक्षा सैनिक सो गए। एक टोकरी में श्री कृष्ण जी को रखकर वसुदेव जी गोकुल को चल निकले। मार्ग में यमुना नदी श्री कृष्ण जी के चरण स्पर्श करने के लिए उफान मारने लगी तो श्री कृष्ण जी ने टोकरी से अपने पैर नीचे लटका दिये।
चरण स्पर्श के बाद यमुना जी घट गई और वसुदेव जी को मार्ग दे दिया। वसुदेव जी यमुना नदी पार करके गोकुल में नन्द जी के निवास पहुंचे। शिशु कृष्ण जी को यशोदा मैया के बगल में सुलाकर कन्या को लेकर वापिस कंस के कारागार में पहुंच गए।
जेल के दरवाजे खुदबखुद बंद होते चले गए। वसुदेव जी के शरीर पर बेड़ियां पड़ गयी। पहरेदार जाग गए। कन्या के रोने की आवाज कंस के कानों तक पहुंच गयी। कंस ने कारागार में जाकर उस कन्या को हाथो में लेकर पटक कर मारना चाहा लेकिन वह कन्या कंस के हाथों से छूटकर आकाशमयी हो गयी और एक देवी का रूप लेकर बोली कि हे कंस मुझे मारकर तुझे क्या फायदा पहुंचने वाला? तुझे मारने वाला तो जन्म लेकर गोकुल कब का पहुंच चुका है।
यह सब सुनकर कंस घबरा उठा। कंस ने श्री कृष्ण जी को मारने के उद्देश्य से कई राक्षसों को भेजा। कई षडयंत्र रचे। श्री कृष्ण जी ने अपनी माया से सभी राक्षसों को मार डाला।
बड़े होने पर श्री कृष्ण जी ने अपने मामा कंस को मारकर अपने नाना उग्रसेन जी को राजगद्दी दिलायी। श्री कृष्ण जी की इसी जन्म तिथि को तभी से सारे देश में बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है।
गोगा नवमी (Goga Navmi) :-
तो यह तो थी krishna janmashtami vrat katha। इसके बाद जन्माष्टमी के दूसरे दिन सुबह गोगा नवमी की पूजा की जाती है। इस दिन एक मोटी सी मीठी रोटी बनाकर उस पर घी बूरा रखकर साथ में एक कटोरी में चावल वाली खीर रखते हैं और रसोई की दीवार पर गूंगा नवमी बनाकर उसके सामने ज्योत जगाकर, थाली में रोटी, घी, बूरा, खीर ऊंचे स्थान पर रखकर गोगा जी महाराज को रोली से टीका लगाते हैं।
हाथ में गेहूं लेकर धोक देते हैं। और मन ही मन कहते हैं कि हे गूंगा महाराज! घर में सब ठीक ठाक रहे। हम सभी पर अपनी कृपादृष्टि बनाये रखना। बाद में सारा पूजा किया हुआ सारा सामान कुम्हार या जोगी के यहां भिजवा देते हैं। और लोटे का पानी गमले में डाल देते हैं फिर सभी परिवारजन वहीं खाना खाते हैं।
भारतीय संस्कृति में जन्माष्टमी के बाद वर्ष के प्रमुख धार्मिक उत्सवों में शारदीय नवरात्रि का भी विशेष महत्व है, जिसे पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का धार्मिक महत्व
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। धर्मग्रंथों के अनुसार जब पृथ्वी पर अधर्म, अन्याय और अत्याचार बढ़ गया था, तब भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना और दुष्टों के विनाश के लिए अवतार लिया। इसलिए यह पर्व केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव ही नहीं, बल्कि धर्म, सत्य, प्रेम और भक्ति की विजय का प्रतीक भी माना जाता है।
इस दिन श्रद्धालु उपवास रखते हैं, भगवान श्रीकृष्ण का अभिषेक करते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं तथा मध्यरात्रि में जन्मोत्सव मनाकर आरती करते हैं। मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से जन्माष्टमी का व्रत एवं पूजा करने से भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है तथा परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।
Krishna Janmashtami Vrat Katha से जुड़े सामान्य प्रश्न (FAQ)
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कब मनाई जाती है?
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है।
श्रीकृष्ण का जन्म किस स्थान पर हुआ था?
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में राजा कंस के कारागार में हुआ था।
जन्माष्टमी पर व्रत कैसे रखा जाता है?
श्रद्धालु पूरे दिन उपवास रखते हैं और मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद पूजा एवं आरती करके व्रत का पारण करते हैं।
जन्माष्टमी पर किसका भोग लगाया जाता है?
भगवान श्रीकृष्ण को माखन, मिश्री, पंचामृत, फल, मेवा तथा विभिन्न प्रकार के प्रसाद का भोग लगाया जाता है।
जन्माष्टमी पर तुलसी का क्या महत्व है?
भगवान श्रीकृष्ण की पूजा में तुलसी दल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। बिना तुलसी के भोग को अधूरा माना जाता है।
क्या जन्माष्टमी का व्रत सभी लोग रख सकते हैं?
हाँ, अपनी स्वास्थ्य स्थिति और सामर्थ्य के अनुसार स्त्री, पुरुष एवं बच्चे भी श्रद्धापूर्वक जन्माष्टमी का व्रत रख सकते हैं।
जन्माष्टमी का मुख्य संदेश क्या है?
यह पर्व धर्म की रक्षा, सत्य की विजय, प्रेम, भक्ति और मानव कल्याण का संदेश देता है।
जन्माष्टमी पर रात 12 बजे पूजा क्यों की जाती है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था, इसलिए उसी समय विशेष पूजा और आरती की जाती है।
निष्कर्ष
Krishna Janmashtami Vrat Katha केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की कथा नहीं है, बल्कि धर्म की स्थापना, अधर्म के विनाश, प्रेम, करुणा और भक्ति का दिव्य संदेश भी देती है। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन हमें सत्य के मार्ग पर चलने, कर्तव्य का पालन करने और कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा देता है। इसलिए जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा, उत्साह और आध्यात्मिक आस्था के साथ पूरे देश में मनाया जाता है।
यदि आप श्रद्धापूर्वक Krishna Janmashtami Vrat Katha का श्रवण करते हैं, विधि-विधान से व्रत रखते हैं तथा भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना करते हैं, तो धार्मिक मान्यता के अनुसार परिवार में सुख, शांति, समृद्धि और भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। हमें आशा है कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा, पूजा विधि, व्रत नियम और धार्मिक महत्व से संबंधित यह जानकारी आपके लिए उपयोगी रही होगी। यदि यह लेख पसंद आया हो तो इसे अपने परिवार और मित्रों के साथ अवश्य साझा करें।
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