किसी एक समाज के व्यक्ति द्वारा स्थापित किसी देव की प्रतिमा के प्रति सभी समाज के लोगों की अटूट आस्था जुड़ने लगे तो वो असंख्य भक्तों के आराध्य देव कहलाते हैं। आराध्य देव का वो स्थान जन-जन की आस्था, श्रद्धा और विश्वास का पावन धाम बन जाता है। ऐसा ही एक पावन धाम जयपुर जिले में स्थित है। जहां से जुड़ी है लाखों लोगों की अटूट आस्था। जयपुर जिले में दुरू तहसील के गाँव हिरनोदा के पास स्थित है भन्दे बालाजी का पावन धाम।
सदियों पहले इस स्थान पर भयानक जंगल था। बरसात का पानी इस स्थान पर भरा रहता था। ऐसा कहा जाता है कि जब आवागमन के साधन नहीं थे तो बंजारे अपनी बैल गाड़ियों में सामान लादकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर बेचने के लिए जाते थे। बंजारे बैल गाड़ियों में नमक लादकर बेचने के लिए जयपुर इसी रास्ते से जाते और रात्रि विश्राम यहीं पर करते थे।
करीब सवा तीन सौ साल पहले संवत् 1752 में एक बंजारा बालाजी के इस विग्रह के साथ आया। रात्रि विश्राम के दौरान बालाजी का विग्रह गाड़ी से उतार कर यहां रख दिया। सुबह, जब उसने आगे की यात्रा के लिए बालाजी के विग्रह को उठाना शुरू किया तो वो उसे हिला भी न सका। थक हारकर उसने विग्रह इसी स्थान पर छोड़ दिया और धूप अगरबत्ती दिखाकर आगे बढ़ गए।
उसी रात बालाजी ने सपने में बंजारे को वहीं रहने की इच्छा जताई। बंजारे ने एक छोटी कोठरी बनाकर बालाजी की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कर बालाजी को विराजित कर दिया। अब इसे दैवीय चमत्कार ही कहा जाएगा कि इतने सालों तक एक छोटी कोठरी में बैठे बालाजी से श्रद्धालु बहुत प्रभावित हुए और उनकी मनोकामनाएं पूरी होने पर उनके दिलों मे बालाजी के मंदिर को विशाल रूप देने को इच्छाएं जागृत होने लगी।
आज से करीब 70 साल पहले भक्तों द्वारा मंदिर के पुनर्निर्माण का काम शुरू हुआ। आज भन्दे बालाजी का पावन धाम किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं है। श्री भन्दे बालाजी हिरनोदा के आसपास के निवासियों के लिए ही नहीं बल्कि दूर दूर से आने वाले भक्तों के लिए भी आराध्य देव हैं। इनकी आराधना फलदायी एवं पूर्ण करने वाली मानी गई है। जिस भक्त की भी मनोकामना पूरी हुई उसने तन, मन और धन से मंदिर के विकास में अपनी अहम भूमिका निभाई है।
कई विशेष भक्तों ने तो मंदिर परिसर में अन्य देवी देवताओं के मंदिर बनवाए। शिरडी साई नाथ मंदिर, श्रीराम मंदिर, नवग्रह मंदिर, शिवजी महाराज मंदिर ऐसे ही मंदिरों का निर्माण भक्तों के सहयोग से हुआ है। श्री भन्दे हनुमान जी मंदिर के विशाल सभा मंडप में की गई कलात्मक चित्रकारी देखते ही बनती है। सभी दीवारों छत पर काँच की सुंदर पच्चीकारी की गयी है।
संगमरमर की सुंदर कारीगरी द्वारा निर्मित मुख्य गर्भ गृह में विराजित बालाजी महाराज के इस रूप के बारे में कहा जाता है कि जब अहिरावण भगवान राम और लक्ष्मण को पाताल लोक ले गया था तब हनुमान जी ने उन्हें छुड़ाने के लिए एक योद्धा का रूप धारण किया था। पुजारी जी के अनुसार इनके बाए हाथ में ढाल है और साथ में घोटा (गदा) है और इनकी छवि दक्षिण मुखी है। देखने में ऐसा प्रतीत होता है मानो युद्ध करते हुए बचाव पक्ष की मुद्रा हो।
श्री बालाजी महाराज के मुख्य द्वार के दोनों तरफ श्री गणेश जी, श्री कृष्ण जी और माँ अंजनी की गोद में विराजित बाल स्वरूप हनुमान के सुंदर विग्रह स्थापित है। ये सभी विग्रह शिल्पकार के अद्भुत शिल्प का नायाब नमूना है। जन सहयोग से चल रहे विकास कार्यों में करीब – करीब हर समाज के श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए धर्मशालाएं बनायी गयी है। वहीं हनुमान जी तथा शंकर जी की मूर्तियों का निर्माण कार्य जारी है।
श्री भन्दे बालाजी मंदिर में आरती और भोग का क्या है विधान ?
जयपुर जिले की दुरू तहसील के अन्तर्गत आने वाले गाँव हिरनोदा में स्थित श्री भन्दे बालाजी पावन धाम मे बालाजी की पूजा सेवा से लेकर हर श्रद्धालु की सेवाएं श्री भन्दे हनुमान सेवा समिति द्वारा संचालित की जाती हैं। बालाजी की दिन में तीन बार आरती होती है सुबह, दोपहर और शाम के समय होने वाली हर आरती के दर्शनों के समय काफी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।
मंगलवार और शनिवार को मंदिर में विशेष भीड़ रहती है। श्री भन्दे बालाजी मंदिर का पूरा क्षेत्र हाई फाई आॅडियो सिस्टम से जुड़ा हुआ है। जो श्रद्धालु आरती के समय मंदिर के हाल तक नहीं पहुंच पाते वो ऑडियो सिस्टम के जरिए सस्वर और साजो के साथ हो रही आरती का आनंद दूर खड़े होकर भी ले सकते हैं।
श्री भन्दे बालाजी पावन धाम में आयोजित होने वाले मेले और पर्व –
श्री भन्दे बालाजी मंदिर में वैसे तो साल के हर पर्व और त्योहार हर्षोल्लास के साथ मनाए जाते हैं। मंदिर परिसर में हर देवी देवताओं का वास होने के कारण आए दिन किसी न किसी पर्व का आयोजन होता ही रहता है। जिन भक्तों की मनोकामना पूरी हो जाती है उनके द्वारा सवामनी सुंदर कांड के पाठ तथा भजन कीर्तन के आयोजन भी समय समय पर होते रहते हैं।
श्री भन्दे बालाजी का वार्षिक मेला हर साल ज्येष्ठ मास शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार को आयोजित होता है। तीन दिन तक चलने वाले इस मेले में राजस्थान का जयपुर जिला ही नहीं बल्कि अन्य जिलों के साथ साथ पड़ोसी राज्यों से भी लाखो श्रद्धालु भाग लेते हैं। वर्ष 2016 में मनाए गए इस वार्षिक मेले ने पचास साल पूरे कर लिए हैं।
श्री बालाजी को हर मंगलवार और शनिवार सिंदूर और वर्क का चोला चढ़ाने की परंपरा है। 3 जनवरी 1967 में बालाजी महाराज का सिंदूर वर्क का चोला स्वतः अलग हो गया था। करीब दो कुंतल के इस चोले को हरिद्वार की गंगा में प्रवाहित किया गया था। इसी उपलक्ष्य में श्री भन्दे बालाजी के यहां पहला मेला ज्येष्ठ शुक्ल सन् 2 जनवरी 1967 में आयोजित किया गया था। मेले का यही क्रम आज भी जारी है।
श्री भन्दे बालाजी महाराज का प्रसाद :-
मंदिर में सभी सुविधाएं हैं। समिति द्वारा आने जाने वाले यात्रियों के लिए प्रसाद की व्यवस्था की जाती है। यहां चढ़ाए जाने वाले प्रसाद में मुख्यतः नारियल, अगरबत्ती और मखाने होते हैं। देसी घी के बने शुद्ध लड्डू भी श्रद्धालु प्रसाद में चढ़ाते हैं जो कि मंदिर परिसर में बनी प्रसाद की दुकानों से सहजता से प्राप्त हो जाते हैं। इन देसी घी के लड्डू की बिक्री नो प्रॉफिट नो लॉस के आधार पर की जाती है।
ऐसा माना जाता है कि श्री भन्दे बालाजी से भी प्राचीन है श्री माला जी महाराज का मन्दिर। कुछ श्रद्धालु इन्हें ग्वाल बाबा भी कहते हैं। एक दंत कथा के अनुसार श्री माला जी का मंदिर एक किन्नर के विशेष सहयोग से बनवाया गया। ऐसा कहा जाता है कि श्री माला जी महाराज के दर्शनों के बाद ही श्री भन्दे बालाजी के दर्शनों का पूरा लाभ मिलता है। आज भी श्री भन्दे बालाजी को भोग लगाने के बाद श्री माला जी महाराज का भोग लगाया जाता है।
श्री भन्दे बालाजी वो पावन स्थान है जहां श्रद्धालु ना सिर्फ अपने ईष्ट की ही सेवा करते हैं बल्कि मूक पशु पक्षियों की भी सेवा कर श्रद्धालु अपने आप को धन्य मानते हैं। मंदिर परिसर में बना विशाल कबूतर खाना तथा सेवा समिति द्वारा संचालित गौशाला इसकी सजीव उदाहरण है। गौशाला से आज करीब दो सौ गाये लाभान्वित हो रही हैं।
जन-जन की आस्था का केंद्र श्री भन्दे बालाजी के पावन दर्शनों के साथ ही इस पोस्ट को हम यही विराम देते हैं।
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