श्री बोरवट हनुमान मंदिर राजस्थान के बांसवाड़ा जिले का एक बहुत प्रसिद्ध और प्राचीन हनुमान मंदिर है। यहां भगवान हनुमान को बोरवट बजरंग और संकटमोचन हनुमान के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि सच्चे मन से यहां आने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन के कई संकट दूर हो जाते हैं।
यह मंदिर सिर्फ राजस्थान ही नहीं बल्कि गुजरात, मध्य प्रदेश और आसपास के राज्यों के लोगों की भी आस्था का बड़ा केंद्र है। हर साल हजारों भक्त यहां दर्शन करने आते हैं। अगर आप श्री बोरवट हनुमान मंदिर का इतिहास, धार्मिक महत्व, मेले, दर्शन और यहां की खास मान्यताओं के बारे में जानना चाहते हैं, तो इस पोस्ट को आखिर तक जरूर पढ़ें।
श्री बोरवट हनुमान मंदिर एक नजर में
| मंदिर का नाम | श्री बोरवट हनुमान मंदिर |
|---|---|
| स्थान | बोरवट गांव, बांसवाड़ा, राजस्थान |
| प्रसिद्ध नाम | बोरवट बजरंग, संकटमोचन हनुमान |
| मुख्य देवता | भगवान हनुमान |
| मुख्य मेला | हनुमान जयंती और चैत्र पूर्णिमा |
| विशेष मान्यता | संकट दूर होना और मनोकामना पूरी होना |
श्री बोरवट हनुमान मंदिर राजस्थान के सुदूर दक्षिणांचल में माही की पावन कल्लोल और अरावली की उपत्काओं एवं जंगलों को प्राचीन ऋषि, महर्षियों, सिद्धों, संतों आदि ने अपनी तपस्या स्थली बनाया और इसी का परिणाम है कि बांसवाड़ा और डूंगरपुर का यह बाग्वर प्रदेश प्रसिद्ध रहा है।
जहां विद्वानों एवं तपस्वियो ने आध्यात्मिक सौरभ बिखेरी जो आज भी नदी नालों, पहाड़ों के आंचल और बीहड़ बनास में अवस्थित श्रद्धा तीर्थों के रूप में जन जन के मन में रची बसी हैं और धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक सरिताओं के माध्यम से नवीन ऊर्जा देती रही है।
यहां के तीर्थों में प्राचीन काल में जहां तपस्या की ऊर्जा ने माटी की गंध को पावन किया वहीं जन जन के कल्याण के लिए संतों एवं भक्त कवियों ने जर्रे-जर्रे को धार्मिकता से जोड़ा।
यही नहीं प्राचीन काल में यहां संत मावजी, गवरी बाई, दुर्लभजी जैसे सिद्ध संतों ने अनुपम ग्रंथों की रचना की। तीर्थों की दृष्टि से देखा जाये तो बांसवाड़ा एवं डूंगरपुर इलाके में कोई गांव ऐसा नहीं है जहां श्रद्धा धाम नहीं हो।
इनमें भी कई तीर्थ ऐसे हैं जो युगों-युगों से जनास्था के भारी केन्द्र बने रहे हैं और तपस्या के लिए सेवार्थ उपयुक्त एवं सिद्धिदायक स्थल के रूप में ख्याति प्राप्त की है।
इनमें बांसवाड़ा शहर से कुछ दूर बोरवट गांव में अवस्थित श्री बोरवट हनुमान मंदिर खासकर इस दक्षिणांचल के लोगों के लिए जाना पहचाना है।
श्री बोरवट हनुमान मंदिर की खास बातें
बोरवट हनुमान मंदिर की सबसे बड़ी पहचान यहां विराजमान संकटमोचन हनुमान जी हैं। लोग दूर-दूर से अपनी मनोकामना लेकर यहां आते हैं। कई परिवार ऐसे भी हैं जो हर साल दर्शन करने की परंपरा निभाते हैं।
मंदिर का शांत वातावरण, प्राकृतिक सुंदरता और वर्षों पुरानी आस्था यहां आने वाले हर भक्त को अपनी ओर खींचती है। यही वजह है कि यह मंदिर दक्षिण राजस्थान के सबसे प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों में गिना जाता है।
अगर आप देश के अन्य प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों के बारे में भी जानना चाहते हैं, तो भारत के प्रसिद्ध हनुमान मंदिर की यह विस्तृत जानकारी भी पढ़ सकते हैं।
श्री बोरवट हनुमान मंदिर कहां है?
बोरवट गांव बांसवाड़ा दोहर्द मार्ग पर यहां से दस किलोमीटर दूर सागदौड़ नदी के मुहाने स्थित है। अतीत में यहां वटवृक्षों के तले सिद्ध संतों ने तपस्या कर सिद्धियां हासिल की।
यहां पर बहुत पुराना एवं पुरातात्विक दृष्टि से समृद्ध बोरेश्वर महादेव का मंदिर अवस्थित था जो अब खण्डहर बन चुका है। इसी के नाम से इस गांव को बोरवट के रूप में ख्याति मिली। आज भी वहाँ वटवृक्ष जल्दी पनपता है।
यहीं पर हनुमान का प्राचीन मंदिर है जिसे बोरवट बजरंग के नाम से देश-विदेश में प्रसिद्धि प्राप्त है।
श्री बोरवट हनुमान मंदिर का इतिहास
श्री बोरवट हनुमान मंदिर का इतिहास कई सौ साल पुराना माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं, पुराने दस्तावेजों और लोगों की परंपराओं में इस मंदिर का कई बार उल्लेख मिलता है। समय के साथ मंदिर का कई बार जीर्णोद्धार हुआ, लेकिन लोगों की आस्था आज भी पहले जैसी ही बनी हुई है।
श्री बोरवट हनुमान का यह मंदिर बहुत पुराना है। “तबकाते अकबरी’ के अनुसार हिजरी सन् 836 के रज्य महिने विक्रम संवत् 1489 फाल्गुन मास ईस्वी सन् 1433 में गुजरात के सुल्तान अहमदशाह ने जब डूंगरपुर राज्य पर वहीं हमला किया तब वहां का महारावल संकटग्रस्त हालात में भागकर आज जहां बोरवट है वहां पर आ गया।
यहां उन दिनों चौबीसी के पांच संत गांव सागडौद नाला अर्थात् मलवासा, चौबीसो का पाड़ला, करजी एवं बोरवट, विशेष ख्यात थे।
यहां वनाच्छादित सुरक्षित क्षेत्र में रहकर महारावल गोपीनाथ जिन्हें गेवा रावल के नाम भी जाना जाता है, ने अपने आपको सुरक्षित पाया व उन्हें अन्त:प्रेरणा हुई।
तब महारावल तपस्या हनुमान की उपासना का विचार किया। उन्हीं दिनों बांसवाड़ा के तत्कालीन भील सरदार बांसवाड़ा हमले का भय भी था। इन स्थितियों में गेबा श्री रावल ने गांव के पूर्व में पूर्वाभिमुखी हनुमान मूर्ति की कुछ ही दिनों में स्थापना की व नन्हा पहचाना सा मंदिर बनाया।
वहां गेबा रावल ने हनुमानजी की उपासना की और संकट से उबारने की कामना की। इधर अहमदशाह वापस जा चुका था तब हनुमानजी की कृपा से गेबा रावल को वापस अपना राज्य प्राप्त हो गया। इस समय से ही हनुमानजी को संकटमोचक हनुमान के नाम से जाना जाने लगा।
यही घटना बोरवट हनुमान मंदिर की पहचान बन गई। इसके बाद आसपास के गांवों के लोग भी अपनी परेशानियों के समय यहां आने लगे। धीरे-धीरे इस मंदिर की प्रसिद्धि पूरे बांसवाड़ा क्षेत्र और फिर दूसरे राज्यों तक फैल गई।
इसके बाद तो लोगों को जब-जब भी संकट का अहसास होता, हनुमानजी की शरण में आ जाते और उनकी कृपा से संकट टल जाता।
इससे हनुमान मूर्ति की चमत्कार गाथाएं चारों ओर फैलने लगी। यहाँ श्रद्धालुओं ने अनेक बार मंदिर बनवाये।
बोरवट हनुमान मंदिर की प्राचीन प्रतिमा
बोरवट के संकटमोचक हनुमान मंदिर के गर्भ गृह में हनुमानजी की खेत पाषाण निर्मित मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि यह एक रात में अनुराधा नक्षत्र में गढी गई।
करीब पांच फीट की हनुमान मूर्ति मनोहरी एवं सभी को सिद्धि प्रदान करने वाली है।
मूर्ति आशीर्वाद मुद्रा में व पूर्वाभिमुखी है, ऐसी हनुमान मूर्तियां प्रायः कम देखने में आती है। पास ही गदा रखी है तथा पाद तले लंकिनी की प्रतिमा है।
हनुमान जी की यह प्रतिमा देखने के लिए हर दिन बड़ी संख्या में भक्त आते हैं। मंदिर में पहली बार आने वाले लोग भी इस प्रतिमा की सुंदरता और दिव्यता की खूब प्रशंसा करते हैं।
राजा-महाराजाओं के समय जब भी कोई विपदा आ जाती, यहां बड़े यज्ञ-यागादि किये जाते रहे हैं। पहले यह मूर्ति एक टापरे में थी इसके बाद नन्हा सा मंदिर बनवाया गया जिसका जीर्णोद्धार होता रहा।
कुछ वर्ष इस मंदिर के निर्माण के प्रयास प्रारम्भ हुए और आज यह निरन्तर भारी जनास्था के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध होता जा रहा है। मंदिर का गर्भ गृह संगमरमर का बना हुआ है। वहीं षोडष स्तम्भ वाला सभा मण्डप है।
इसके परिक्रमा स्थल के पृष्ठ भाग मे विश्राम स्थल है जहां दर्शनार्थी ठंडी हवाओं के झोंको के बीच विश्राम कर शारीरिक और मानसिक थकान को तिलांजलि देते हैं और हनुमान जी के दर्शन के दर्शन के बाद तरोताजा होकर घर लौट आते हैं।

मंदिर का परिसर और वातावरण
मंदिर के सभा स्थल एवं परिक्रमा स्थल मैं रंग बिरंगे फानूस हैं तो पृष्ठ भाग में अंजनी माता के वात्सल्य प्रेम में निमग्र हनुमान, बाल रवि को फल समझकर भक्षण करने जाते, राम सीता का आशीर्वाद प्राप्त करते अपने आराध्य की ओर बढ़ते भगवान हनुमान जी के रंगीन चित्रों का अंकन किया गया है।
यहीं पर मनोरम स्थान विकसित किया गया है। जिसमें आकर्षक पादपों पर लगे विविध रंगों के पुष्प लगे एवं इनकी वातावरण मे अजीब से खुनक तैरा करती है। मंदिर परिसर में ही नीम और पीपल जैसे छायादार वृक्षों के बीच चबूतरे बनाए गए हैं जो दर्शनार्थियों को भारी गर्मी मे भी पेड़ों की छांव एवं शीतल बयार से सुकून प्रदान करते हैं।
अगर आप परिवार के साथ यहां आते हैं, तो कुछ समय मंदिर परिसर में जरूर बिताएं। यहां का शांत माहौल, हरियाली और भक्ति का वातावरण मन को सुकून देता है। यही वजह है कि कई लोग दर्शन के बाद कुछ देर यहीं बैठकर पूजा और ध्यान भी करते हैं।
बोरवट हनुमान मंदिर की मान्यता
संकटमोचन हनुमान कहें या बोरवट बजरंग भगवान के प्रति भक्तों में अगाध आस्था इस कदर विद्यमान है कि भक्तों ने भगवान से आत्मीयता का भाव स्थापित कर लिया है और लोग अपने बुजुर्गों की तरह हनुमान को बजरंग दादा या हनुमान बावसी कहकर संबोधित करते है और अपनी हर प्रकार की मनोकामना हो या कष्टों के निवारण का प्रयोजन, बिना किसी संकोच के कह देते है।
जन विश्वास है कि बोरवट बजरंग हर किसी की मनोकामना पूरी करते है।
आसपास के गांवों के लोग आज भी किसी नए काम की शुरुआत करने से पहले बोरवट बजरंग के दर्शन करना शुभ मानते हैं। कई परिवारों में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। लोगों का विश्वास है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना भगवान हनुमान जरूर सुनते हैं।
बोरवट बजरंग से जुड़ी अनोखी परंपराएं
पुराने समय से यहां रिवाज चला आ रहा है कि जब-जब भी फसल पक कर तैयार होती है सबसे पहले उसे हनुमानजी के मंदिर में जाकर चढ़ाते है उसके बाद ही उसको उपयोग में लिया जाता है।
किसानों के लिए हनुमानजी फसलों के रक्षक देव के रूप में माने जाते है।
आज भी कई किसान नई फसल घर लाने से पहले उसका एक हिस्सा भगवान हनुमान को अर्पित करते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और आज भी पूरे विश्वास के साथ निभाई जाती है।
मंदिर का भक्ति भरा वातावरण
मंदिर का घण्टा अनवरत गुंजायमान रहता है। चाहे आधी रात हो या भोर। इस मार्ग से गुजरने वाला तकरीबन हर वाहन यहां रुकता है और नारियल, अगरबत्ती चढ़ाने के बाद ही वाहन चालक निश्चित हो अपना सफर आगे बढ़ाते है।
मंदिर परिसर में भजनों एवं भक्ति भाव भरे कार्यक्रमों की स्वर लहरियां भी रह-रहकर वातावरण में भक्ति रस घोलती रहती है।
पास के गांवों बड़ोदिया, धनपुरा, बोड़ीगामा, सागड़ौद आदि गांवों की भजन मंडलियां अक्सर आकर रात-रात भर अपने कार्यक्रम करती है और भगवान हनुमानजी की आराधना करते है।
मंगलवार, शनिवार और हनुमान जयंती के समय मंदिर का माहौल देखने लायक होता है। पूरे परिसर में भजन, कीर्तन और जयकारों की गूंज सुनाई देती है, जिससे भक्तों की आस्था और भी मजबूत हो जाती है।
सवामणी और विशेष पूजा
आये दिन अनुष्ठानों का क्रम भी यहां चलता रहता है। यहां होने वाली सवामणी अनुष्ठान विशेष आकर्षण भरी होती है।
किसी विशेष कामना को लेकर सवामणी का व्रत लिया जाता है। फिर मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धा भाव से सवा मन गेहूं का आटा लेकर इसके लड्डुओं का भोग लगाया जाता है व लोगों को जिमाया जाता है।
मनोकामना पूरी होने पर कई भक्त अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ मंदिर में आकर सवामणी करवाते हैं। इसके बाद प्रसाद सभी लोगों में बांटा जाता है। यह परंपरा आज भी पूरे श्रद्धा भाव से निभाई जाती है।
शनि दोष से जुड़ी मान्यता
इसके अलावा जब-जब भी शनि ग्रह राशि का परिवर्तन करता है। शनि के कोप से बचने के लिए लोग बोरवट बजरंग की शरण में आते हैं व रात-रात भर रहकर सवेरे नदी में स्नान-ध्यान कर हनुमानजी की आराधना एवं नारियल बधारने के बाद चिन्तामुक्त होकर घर लौटते है।
हालांकि यह लोगों की आस्था और मान्यता पर आधारित है। हर भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार यहां पूजा करता है और भगवान हनुमान से अपने परिवार की सुख-शांति और अच्छे जीवन की प्रार्थना करता है।
मंदिर के आसपास देखने लायक स्थान
इस देवालय को पर्यटन की दृष्टि से विकसित किये जाने का काम जोरों से चलाया जा रहा है।
बोरवट बजरंग मंदिर के सन्निकट ही बायीं ओर बुनकर समाज द्वारा बनाया गया राधाकृष्ण मंदिर है जिसमें अत्यन्त सुन्दर कृष्ण मूर्ति है जो साढ़े तीन फीट की है।
इसके वाम पार्श्व में राधाजी की सुन्दर मूर्ति है। दोनों ही मूर्तियों का आकर्षक शृंगार किया हुआ है।
पास ही गणेशजी की एक फुट की मूर्ति है।
हनुमान मंदिर के दायीं ओर सड़क के किनारे ही प्राचीन शिवालय के खण्डहर बताते है कि वहां पीपल एवं वट वृक्ष के तले-बोरेश्वर मंदिर था जिसके नाम पर बोरवट प्रसिद्ध है।
किवदन्तियों के अनुसार इस मंदिर के शिवलिंग तले बड़े पैमाने पर धन था। धन के लोभ में किसी ने शिवलिंग उखाड़ दिया तथा धन भी खोद कर ले गये।
वहां पास में चतुर्भुज महिषासुरमर्दिनी में देवी की मूर्ति है। लोग इसे खेमल माता अर्थात् खेमकरी देवी के नाम से जानते है।
यहां पत्थरों को जमाकर बनाई गई छोटी सी मंदरी में स्थापित है।
घोमवाड़ा रियासत के महारावल जगमालसिंह ने इस क्षेत्र में 800 बीघा जमीन ईनाम में देकर बड़ोदा (डूंगरपुर) के पास घटवाड़ा से आये माधवराव को बसाया। यह मूर्ति माधवराव अपने साथ संवत् 1589 चैत्र सुदी सप्तमी को यहां लाये व अपनी इस कुलदेवी की प्रतिमा को यहां स्थापित किया।
इस मूर्ति को विधिवत् मंदिर में प्रतिष्ठापित करने के लिए पास ही मंदिर का निर्माण चल रहा है।
इस समय माधवराव के सात परिवार मौजूद है। इसमें कुछ दूर जन-जन की आराध्य वडीखण माता का स्थानक वट वृक्ष के तले स्थित है जो मुकुट धारण किये हुए है।
यहां मंदिर के अवशेष भी स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रहे है सिंहवाहिनी मूर्ति महिषासुर का दमन करते हुए दिखलाई गई है।
यहां शिलालेख हवन क्षेत्र आदि है।पहले यह मूर्ति नाले में पड़ी हुई थी जिसे गजहेंग पटेल द्वारा एक शताब्दि पूर्व वट वृक्ष के नीचे लाकर स्थापित किया गया।
देवी के प्रति लोगों में भारी आस्था है आज भी वर्षा नहीं होने पर संकट के निवाराणार्थ देवी को बलि चढ़ाई जाती है व धान का भोग लगाया जाता है।
नवरात्रि में अनुष्ठान चलते है। पटेल एवं आदिवासियों के लिए वड़ीखण माता की खास मान्यता है।
विक्रम संवत् 1622 में महावरावल प्रतापसिंह ने सागड़ौद से बुलवाकर पटेल (सोलकी वंशीय, जिन्हें नागड़ी में हणकी कहते हैं) यहां बसाये।
उस समय अजयराज सोलंकी (अजोजी हुणकी) को बसाया गया जिनके आज 27 परिवार है।
सड़क के एक तरफ सती माता का मंदिर है। इसमें तीन खण्ड हैं। दायीं ओर एक योद्धा ढाल व तलवार लिए अंकित है। जिसकेबारे में बताया जाता है कि वह यहां युद्ध में मारा गया।
मध्य में एक तरफ हाथ जोड़े महिला के साथ माला व तलवार लिये योद्धा है। तीसरे खण्ड में दो योद्धा तलवार लिये हुए है। बुजुर्ग नाथुसिंह के अनुसार 180 वर्ष पहले कल्याणसिंह ने बोदला की अमरत से विवाह रचाया।
उससे सन्तान न होने पर वासला के देवीसिंह की पुत्री गुमान से संबंध किये। इस पर विवाद खड़ा हो गया और कल्याणसिंह को छिप कर घातक वार से स्वर्ग पहुंचा दिया।
उसी स्थान पर यह चबुतरा बनाकर शिलाखण्ड स्थापित किये गये। इसके प्रति दिली श्रद्धा है। यह भी कथा है कि सती होने पर कल्याणसिंह की दोनों पत्नियों को सत चढ़ा व उनकी कठोर परीक्षाएं भी ली गई।
हुणकी परिवार में चाहे जो भी कार्य हो, इस स्थानक के आशीर्वाद के बगैर पूरे नहीं होते है।सतीयों द्वारा जिस बड़ पर हाथ लगाया गया वहां हाथ का निशान भी हो गया बताते है।
बोरवट हनुमान मंदिर का वार्षिक मेला
पिछले कुछ वर्ष से बोरवट गांव तीर्थ का स्वरूप लेता जा रहा है। मेले के दौरान राजस्थान के अलावा गुजरात, मध्य प्रदेश और आसपास के इलाकों से भी बड़ी संख्या में भक्त यहां पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में पूरे दिन पूजा, भजन और धार्मिक कार्यक्रम चलते रहते हैं, जिससे पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो जाता है।
हर वर्ष हनुमान जयंती चैत्र पूर्णिमा पर श्री बोरवट हनुमान मंदिर पर तीन दिवसीय विशाल मेला भरता है जिसमें बांसवाड़ा ही नहीं आस-पास के हजारों लोग भाग लेते हैं और भगवान हनुमानजी के दर्शन-पूजन कर नारियल बधारकर श्रद्धा अभिव्यक्त करते है।
इस दौरान नारियल की जटाओं का अम्बार लग जाता है। हर वर्ष मेले के रंगों में खासा परिवर्तन होता रहता है।
श्री बोरवट हनुमान मंदिर कैसे पहुंचे?
श्री बोरवट हनुमान मंदिर राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के बोरवट गांव में स्थित है। बांसवाड़ा शहर से यहां सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है। निजी वाहन, टैक्सी और स्थानीय बसों की सुविधा उपलब्ध रहती है। अगर आप दूसरे शहर से आ रहे हैं, तो पहले बांसवाड़ा पहुंचकर वहां से मंदिर जाना सबसे आसान रहता है।
मंदिर जाने से पहले ध्यान रखें
- मंगलवार, शनिवार और हनुमान जयंती पर सबसे ज्यादा भीड़ रहती है।
- अगर परिवार के साथ जा रहे हैं, तो सुबह के समय दर्शन करना सुविधाजनक रहता है।
- मंदिर परिसर की साफ-सफाई और नियमों का पालन करें।
- नारियल और प्रसाद मंदिर के आसपास की दुकानों से भी लिया जा सकता है।
- अगर सवामणी या विशेष पूजा करवानी हो, तो पहले मंदिर प्रबंधन से जानकारी ले लें।
मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों में श्री मायापति हनुमान मंदिर, उज्जैन भी अपनी अलग पहचान रखता है।
श्री बोरवट हनुमान मंदिर का धार्मिक महत्व
श्री बोरवट हनुमान मंदिर दक्षिण राजस्थान के प्रमुख हनुमान तीर्थों में से एक माना जाता है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि यहां श्रद्धा पूर्वक प्रार्थना करने से संकट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसी कारण बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं।
अगर आप अलग-अलग राज्यों के प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों के बारे में जानना चाहते हैं, तो श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर, कोलकाता की जानकारी भी पढ़ें।
अगर आप राजस्थान के अन्य प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों की यात्रा करना चाहते हैं, तो श्री नवखण्डीय तुलसी मानस हनुमान मंदिर, पुष्कर के बारे में भी जरूर पढ़ें।
Frequently Asked Questions
श्री बोरवट हनुमान मंदिर कहां स्थित है?
बोरवट गांव, बांसवाड़ा जिले, राजस्थान में स्थित है।
बोरवट हनुमान जी का मंदिर किस लिए प्रसिद्ध है?
यह मंदिर संकटमोचन हनुमान जी की प्राचीन प्रतिमा और श्रद्धालुओं की आस्था के लिए प्रसिद्ध है।
Borvat हनुमान मंदिर में मेला कब लगता है?
हनुमान जयंती और चैत्र पूर्णिमा के अवसर पर यहां विशाल मेला आयोजित होता है।
क्या इस मंदिर में सवामणी की जाती है?
हाँ, श्रद्धालु मनोकामना पूर्ण होने पर सवामणी और अन्य धार्मिक अनुष्ठान कराते हैं।
श्री बोरवट हनुमान मंदिर से जुड़े सवाल
श्री बोरवट हनुमान मंदिर कहां स्थित है?
यह मंदिर राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के बोरवट गांव में स्थित है। बांसवाड़ा शहर से सड़क मार्ग द्वारा यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है।
बोरवट हनुमान मंदिर किस लिए प्रसिद्ध है?
यह मंदिर अपनी प्राचीन हनुमान प्रतिमा, संकटमोचन हनुमान की मान्यता, सवामणी और हनुमान जयंती के विशाल मेले के लिए प्रसिद्ध है।
बोरवट हनुमान मंदिर में मेला कब लगता है?
हर वर्ष चैत्र पूर्णिमा और हनुमान जयंती के अवसर पर यहां तीन दिवसीय विशाल मेले का आयोजन किया जाता है।
क्या यहां सवामणी करवाई जाती है?
हां। मनोकामना पूरी होने पर कई भक्त यहां सवामणी करवाते हैं और प्रसाद सभी लोगों में बांटते हैं।
क्या बोरवट हनुमान मंदिर बहुत पुराना है?
हां, यह दक्षिण राजस्थान के सबसे पुराने और प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों में माना जाता है। इसका इतिहास कई सौ साल पुराना बताया जाता है।
बोरवट हनुमान मंदिर में सबसे ज्यादा भीड़ कब होती है?
मंगलवार, शनिवार और हनुमान जयंती के दौरान यहां सबसे ज्यादा भक्त दर्शन करने आते हैं।
क्या मंदिर के पास अन्य धार्मिक स्थल भी हैं?
हां, मंदिर के आसपास राधाकृष्ण मंदिर, प्राचीन शिवालय, खेमकरी देवी और वड़ीखण माता जैसे कई धार्मिक स्थल भी मौजूद हैं।
क्या दूसरे राज्यों से भी लोग यहां दर्शन करने आते हैं?
हां, राजस्थान के अलावा गुजरात, मध्य प्रदेश और आसपास के कई राज्यों से भी बड़ी संख्या में भक्त यहां दर्शन करने आते हैं।





