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वामन द्वादशी व्रत कथा पूजा विधि और उद्यापन – Vaman Dwadashi Vrat Katha

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वामन द्वादशी व्रत कथा पूजा विधि और उद्यापन – Vaman Dwadashi Vrat Katha – वामन द्वादशी भाद्रपद महीने में शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को हर्षोल्लास के साथ पूरे देश में मनायी जाती है। द्वादशी तिथि को स्वर्ण या यज्ञोपवीत से वामन भगवान् की प्रतिमा स्थापित कर सुवर्ण पात्र में अर्ध्य दान कीजिये। फूल और फल चढ़ाये और व्रत रखना चाहिए।

वामन द्वादशी व्रत कथा पूजा विधि और उद्यापन

01वामन द्वादशी 2025 कब है? 4 सितंबर 2025 को।
02वामन द्वादशी व्रत कब है? भाद्रपद शुक्ल द्वादशी 10 सितंबर को ही।
03वामन द्वादशी पूजन सामग्री क्या क्या है? भगवान् की प्रतिमा, 52 पेड़े, 52 दक्षिणा, चीनी, दही, चावल, शर्बत।
04वामन द्वादशी उद्यापन सामग्री 1 माला, 2 गौ मुखी मंडल, छाता, आसन, गीता, लाठी, फल, खड़ाऊ तथा दक्षिणा।
Vaman dwadsi vrat katha puja vidhi aur udyapan

वामन द्वादशी व्रत कथा पूजा विधि और उद्यापन - Vaman Dwadashi Vrat Katha

वामन द्वादशी पूजन मंत्र (Vaman Dwadashi Pujan Mantra)

देवेश्वराय देवश्य, देव संभूतिकारिणे।

प्रभाते सर्व देवानां वामनाय नमो नमः॥

वामन द्वादशी अर्ध्य मंत्र (Vaman Dwadashi Ardhya Mantra)

नमस्ते पद्मनाभाय नमस्ते जलः शायिने।

तुभ्यमध्र्र्य प्रयच्छामि वाल यामन अर्पिणे॥

नमः शार्ड् घनुर्पाणि पादये वामनाये च।

यज्ञभुव फलदात्रे च वामनाये नमो नमः॥

वामन द्वादशी पूजा विधि (Vaman Dwadashi Puja Vidhi)

भगवान् वामन की सोने की मूर्ति के समीप 52 पेड़े और 52 दक्षिणा रखकर पूजा करते हैं। भगवान् वामन का भोग लगाकर सकोरों में चीनी, दही, चावल, शर्बत तथा दक्षिणा ब्राह्मण को दान कर के वामन द्वादशी का व्रत पूरा करते हैं।

वामन द्वादशी के ही दिन वामन द्वादशी व्रत का उद्यापन भी करे (व्रत समाप्ति उत्सव) उद्यापन में ब्राह्मणों को 1 माला, 2 गौ मुखी मंडल, छाता, आसन, गीता, लाठी, फल, खड़ाऊ तथा दक्षिणा देनी चाहिए।

वामन द्वादशी व्रत को करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

वामन द्वादशी व्रत कथा (Vaman Dwadashi Vrat Katha)

बली राक्षस ने एक बार देवताओं को परास्त करके स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। उसका अत्याचार देवताओं में बहुत अधिक बढ़ने लगा तो माता अदिति ने अपने पतिदेव महर्षि कश्यप को सारा वृतांत सुनाया।

अदिति ने पति की आज्ञा पाकर एक विशेष अनुष्ठान किया। जिसका परिणाम य़ह हुआ कि भगवान् विष्णु जी ने वामन का रूप धारण कर बलि के यहां जाकर तीन पग भूमि का दान मांग लिया था।

राजा बलि तीन पग भूमि देने के लिए दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य के मना करने के बावजूद भी वे वचन बद्ध हो गए।

वामन रूपी विष्णु भगवान् ने एक पग में पृथ्वी और दूसरे पग से स्वर्ग के साथ-साथ ब्रह्म लोक को नाप लिया। तीसरा पग राजा बलि की पीठ पर रखकर उसे पाताल भेज दिया।

देव माता अदिति की कोख से भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को वामन अवतार होने से ही इसे वामन द्वादशी कहा जाता है।

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