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ऋषि पंचमी व्रत कथा पूजन नियम और विधि

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ऋषि पंचमी व्रत कथा पूजन नियम और विधि (Rishi Panchmi Vrat Katha) – आज हम परम पवित्र ऋषि पंचमी व्रत के बारे में चर्चा करने जा रहे हैं।

यह व्रत हमारी माताएं बहने ज्ञात-अज्ञात या महा नगरीय जीवन में अशुद्धि अवस्था के दौरान बर्तन आदि छूने – छाने से जो दोष लगता है एवं पति के प्रति क्रोध आना और ज्ञात-अज्ञात समस्त पापों को नष्ट करने हेतु ऋषि पंचमी व्रत कथा और पूजन किया जाता है।

ऋषि पंचमी व्रत कथा पूजन नियम और विधि

ऋषि पंचमी व्रत कब किया जाता है? (Rishi Panchami Celebration)

यह व्रत भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी अर्थात गणेश चतुर्थी के अगले दिन प्रातः काल में किया जाता है।

ऋषि पंचमी व्रत को करने के नियम और विधि क्या है?

इस व्रत को उसी प्रकार से किया जाता है जिस प्रकार से हम अन्य व्रत करते हैं जैसे निर्जल या जल व्रत।

इसमे दूध दही का सेवन नहीं किया जाता है। फल आदि ग्रहण कर सकते हैं अगर न करें तो उत्तम बात है।

ऋषि पंचमी पूजा दोपहर के समय की जाती है। दोपहर के समय गंगा नदी तट पर स्नान करना चाहिए।

यदि गंगा में स्नान नहीं कर सकते, तो घर में ही नहा लें।

ऋषि पंचमी स्नान मिश्रण सामग्री

मुल्तानी मिट्टी
गोपी चंदन
तिल
आंवला
गंगाजल
गौ मूत्र

पहले सुबह 108 बार मिट्टी से हाथ धोए, गोपी चंदन, तिल आंवला, गंगा जल, गौ का मूत्र इतनी चीजें मिलाकर हाथ और पैर धोए।

108 तरह की दातुन करने का भी नियम है। आजकल 108 दातुन करना हो नहीं पाता इसलिए कम से कम एक बार तो अवश्य ही करना चाहिए।

108 बार कुल्ला करे, 108 पत्ते सिर पर रखकर 108 बार घंटी से नहाए। नहाकर नए कपड़े पहने।

बाद में गणेश जी की पूजा अर्चना करें। पूजा की सामग्री पंडित जी से पूछकर मंगवा लें।

उसके बाद ऋषि पंचमी की कथा सुनकर पूजा करने के बाद केला, घी, चीनी व दक्षिणा रखकर बायना निकाल कर हाथ फेरकर किसी भी ब्राह्मण या ब्राह्मणी को बायना दे दें।

ऋषि पंचमी व्रत - क्या खाए क्या न खाए

दूध
दही
चीनी
अनाज
फल ✔️
मेवा ✔️

दिन में एक बार ही भोजन करें। भोजन में दूध, दही, चीनी व अनाज कुछ भी सेवन न करें।

हल से जोती हुई चीजें भी नहीं खानी चाहिए। भोजन में केवल फल और मेवा ही ग्रहण करें।

ऋषि पंचमी व्रत कथा क्या है? (Rishi Panchami Vrat Katha)

राजा सिताश्व ने ब्रह्मा जी से पूछा कि सभी पापों को नष्ट करने वाला कौन सा श्रेष्ठ व्रत है? तब ब्रह्मा जी ने ऋषि पंचमी व्रत को सबसे उत्तम बताया और कहा, “हे राजन सिताश्व! विदर्भ देश में एक उत्तंक नाम का सदाचारी ब्राह्मण रहता था।

उसकी पत्नी का नाम सुशीला था। उसके दो संतानें थीं, एक पुत्र और दूसरी पुत्री।

कन्या विवाह होने के पश्चात्‌ विधवा हो गई। इस दुःख से दुःखित ब्राह्मण दंपति कन्या सहित ऋषि पंचमी व्रत रखने लगे। जिसके प्रभाव से जन्मों के आवागमन से छुटकारा पाकर स्वर्गलोक के वासी हो गये।

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