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जया एकादशी व्रत कैसे रखें और क्या है इसकी कहानी? Jaya Ekadashi Vrat Katha In Hindi

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जया एकादशी व्रत कैसे रखें और क्या है इसकी कहानी? Jaya Ekadashi Vrat Vidhi Katha In Hindi – यह व्रत माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाता है। यह एकादशी बहुत ही पुण्य देने वाली मानी गई है।

जो व्यक्ति जया एकादशी का व्रत रखता है उसे भूत, प्रेत, पिशाच योनि से मुक्ति मिल जाती है, सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है, मोक्ष मिलता है और वह बैकुंठ को प्राप्त होता है।

इस दिन भगवान् श्री हरि विष्णु जी की पूजा अर्चना की जाती है।

Jaya Ekadashi Vrat

01व्रत या त्योहार का मुख्य नाम जया एकादशीJaya ekadashi vrat katha in hindi
02किस संप्रदाय का पर्व है? हिन्दू धर्म
03उद्देश्य सर्व कल्याण तथा पाप मोचन के लिए।
04तिथि माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को।
05मुख्य आराध्य देव भगवान् विष्णुजी और कृष्ण जी।

 

Jaya ekadashi vrat katha in hindi

  • सूर्योदय होते ही स्नान करे और स्नान के जल में कुछ बूंदे गंगाजल की छिड़क लें।
  • स्नान के बाद साफ़ कपड़े पहने।
  • व्रत की पूजा घर में पूर्व दिशा की ओर बैठ करे।
  • एक साफ सी चौकी पर नया सवा मीटर पीला कपड़ा बिछाकर उसपर कलश और विष्णुजी की तस्वीर स्थापित कीजिए।
  • स्वयं के बैठने के लिए भी पीला ही आसन लें।
  • इस तिथि को भगवान् श्री कृष्ण और विष्णुजी की फूल, चावल, जल, रोली तथा धूप-दीप से पूजन करके आरती करनी चाहिए।
  • इस व्रत को रखने वाले व्यक्ति को चाहिए कि दशमी तिथि से वह एक समय ही आहार ले।
  • दशमी तिथि को सूर्यास्त के बाद कुछ न खाए।
  • आहार सात्विक ही ग्रहण करें।
  • भोग लगाकर प्रसाद व्रती स्वयं ग्रहण करें।
  • शाम के समय घर के बाहर दरवाजे पर गाय के घी का दीपक जलाये।
  • जया एकादशी व्रत की रात्रि को भगवान् श्री विष्णु जी का सुमिरन करे और सोये नहीं।
  • द्वादशी के दिन ही व्रत खोले।
  • द्वादशी को ब्राह्मण को भोजन कराए और उसे दान दक्षिणा भेंट दें।

जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha In Hindi)

एक समय की बात है। इन्द्र की सभा में माल्यवान नामक गंधर्व गीत गा रहा था। परन्तु उसका मन अपनी नव यौवन सुन्दरी में आसक्त था।

अतः एव स्वर लय भंग हो रहा था। यह लीला इन्द्र को बहुत बुरी तरह खटकी। तब उन्होंने क्रोधित होकर कहा, “हे दुष्ट गंधर्व! तू जिसकी याद में मस्त है वह और तू पिशाच हो जाए।

इन्द्र के श्राप से वह हिमालय पर पिशाच बनकर दुःख पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे। दैव योग से एक दिन माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन उन्होंने कुछ भी नहीं खाया।

वह दिन फल फूल खाकर उन्होंने व्यतीत किया। दूसरे दिन सुबह होते ही व्रत के प्रभाव से उनकी पिशाच देह छूट गई और अति सुन्दर देह धारण कर स्वर्ग लोक को चले गए।

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