अजा एकादशी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत और कथा का श्रवण करने से पापों का नाश होता है तथा जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस पोस्ट में अजा एकादशी व्रत कथा के साथ गोवत्स द्वादशी (बछबारस), औगद्वादश और कुशोत्पाटनी अमावस्या की जानकारी भी दी गई है।
यदि आप वर्षभर आने वाली सभी एकादशियों, उनकी तिथि, व्रत नियम और धार्मिक महत्व के बारे में जानना चाहते हैं, तो एकादशी व्रत की संपूर्ण जानकारी भी पढ़ सकते हैं।

अजा एकादशी (Aja Prabodhini Ekadashi)
अजा एकादशी भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इस एकादशी को कई नामों से पुकारा जाता है। जैसे – प्रबोधिनी एकादशी, अजा एकादशी, जया एकादशी और कामिनी एकादशी। इस दिन विष्णु भगवान की उपासना की जाती है। रात में जागरण करने और अजा एकादशी का व्रत रखने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
अजा एकादशी की व्रत कथा
एक बार सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने स्वप्न में राजा विश्वामित्र को अपना राज्य दान कर दिया। अगले दिन ऋषि विश्वामित्र जी दरबार में गये तो राजा ने वास्तव में अपना सारा राजपाट उन्हें सौंप दिया।
ऋषि विश्वामित्र जी ने उनसे दक्षिणा की 500 स्वर्ण मुद्राएँ और मांगी। दक्षिणा चुकाने के लिए राजा को अपनी पत्नी, पुत्र और स्वयं को बेचना पड़ा।
राजा हरिश्चन्द्र को एक डोम ने खरीद लिया था। डोम ने राजा हरिश्चंद्र को एक शमशान में नियुक्त किया। और उन्हें यह कार्य सौंपा गया कि वह समस्त शव दाह मृतकों के संबंधियों से कर लेकर करें।
उन्हें जब य़ह कार्य करते हुए बहुत समय बीत गया तब एक दिन अचानक ही उनकी भेंट ऋषि गौतम से हुई। राजा द्वारा ऋषि गौतम को अपनी आपबीती सुनायी गयी। तब ऋषि गौतम ने राजा हरिश्चंद्र को इसी अजा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी थी।
राजा हरिश्चंद्र जी ने यह व्रत करना प्रारम्भ कर दिया। इसी बीच उनके पुत्र रोहताश का एक साँप के डसने से स्वर्गवास हो गया। जब रोहताश की माता जी अपने पुत्र को अंतिम क्रिया हेतु शमशान पर लेकर आयी तो नियमानुसार राजा हरिश्चन्द्र ने उनसे शमशान का कर मांगा।
लेकिन, उसके पास शमशान का कर चुकाने के लिए कुछ भी उपलब्ध नहीं था। उसने अपनी चुनरी का आधा भाग देकर शमशान का कर अदा किया। तत्काल ही आकाश में एक बिजली चमकी और प्रभु जी प्रकट होकर बोले, “हे राजन! तुमने सत्य को जीवन में धारण करके उच्चतम आदर्श प्रस्तुत किया है। अतः आपकी कर्तव्यनिष्ठा धन्य है। आप इतिहास में सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के नाम से अमर रहोगे।” प्रभु की कृपा से रोहताश जीवित हो उठा। तीनों प्राणी चिर काल तक सुख भोग कर अंत में स्वर्ग चले गए।
अजा एकादशी के बाद आने वाली परिवर्तिनी एकादशी का भी सनातन धर्म में विशेष महत्व बताया गया है।
परिवर्तिनी एकादशी के बाद आने वाली इन्दिरा एकादशी विशेष रूप से पितरों की सद्गति के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
अजा एकादशी का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अजा एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत पापों के नाश, मानसिक शांति, सुख-समृद्धि तथा मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है। राजा हरिश्चंद्र की कथा इस व्रत की महिमा को दर्शाती है।
अजा एकादशी व्रत की पूजा विधि
- प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- भगवान विष्णु की पूजा करें।
- तुलसी, धूप, दीप, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें।
- दिनभर व्रत रखें तथा यथाशक्ति फलाहार करें।
- विष्णु सहस्त्रनाम एवं अजा एकादशी कथा का श्रवण करें।
- द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक पारण करें।
अजा एकादशी व्रत के लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अजा एकादशी का व्रत करने से पापों का नाश होता है, भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है तथा जीवन में सुख, शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
बछवारस ( गोवत्स द्वादशी )
द्वादशी बछवारस भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की गोवत्स द्वादशी को मनायी जाती है। इस दिन स्त्रियां मूंग, मोठ तथा बाजरा अंकुरित करके दोपहर के समय बछड़े को खिलाती हैं। व्रती भी इस दिन इसी अन्न का ही सेवन करते हैं। इस दिन गाय का दूध दही का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन भैंस के दूध दही आदि का सेवन अच्छा माना गया है।
बछवारस व्रत कथा
भादों का महीना आया। बछवारस आयी। इन्द्र की इंद्राणी पूजा करने के लिए धरती पर आयीं तो उनको एक गाय दिखी। गाय की पूजा करने लगे। आगे से पूजा करतीं तो गाय सींग मारती और अगर पीछे से पूजा करतीं तो लातों से गाय मारती।
इंद्राणियां बोली, “हम तो तुम्हें पूज रहे हैं और तू हमे ही मारती है।” गाय बोली, “मुझ अकेली को क्या पूजती हो, बछड़ा और गाय दोनों की पूजा करो। इन्द्र की इंद्राणियों ने दर्भ का बच्चा बनाया। गाय के पास बिठाया और अमृत के छींटे दिए।
गाय के पास आते ही बछड़ा जीवित हो गया और गाय का दूध पीने लगा। इंद्राणियों ने उनकी पूजा की। फिर गाय बछड़े को लेकर घर आयी। गाय के साथ बछड़ा देखकर मालकिन ने उसे घर में घुसने नहीं दिया।
वो गाय को कहने लगी, “मेरे तो बच्चा नहीं है और तू बच्चा लायी है। यहां मेरे लिए बच्चा लाएगी तो तुझे तुझे अन्दर आने दूंगी।”
गाय बोली, “अभी तो मुझे अन्दर ले लो अगली बछबारस को मैं तुम्हें बेटा दूंगी।” अगली बछबारस आयी। गाय वन में गयी।
इंद्राणियां पूजा करने लगीं। तो गाय पूजा नहीं करने दे रहीं थीं। मार रही थी तो इंद्राणियां बोली अब क्या चाहिए? गाय बोली,”पिछले वर्ष मुझे बच्चा दिया अब मेरी मालकिन को भी बच्चा दो नहीं तो वो मुझे घर नहीं आने देंगी। तभी मैं तुम सबको पूजा करने दूंगी।”
इन्द्र की इंद्राणियों ने दर्भ का बच्चा बनाया और दर्भ का पालना बनाया। पालने को गाय के सींगों से बांधकर उसमें बच्चे को लिटाया और अमृत का छींटा दिया।
फिर इंद्राणियों ने गाय की पूजा करी। गाय बच्चे को लेकर घर गयी तो सारी औरते कहने लगी,” सेठानी गाय तेरे लिए बच्चा लायी है।”
सेठानी ने गाय को गाजे बाजे से सामने लिया। गाय माता ने सेठानी को बच्चा दिया वैसे सबको देना, भरा पूरा रखना।
खोटी की खरी, अधूरी की पूरी।
गोवत्स द्वादशी की कथा
भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की द्वादशी को पहली श्री कृष्ण को माता यशोदा ने अच्छी प्रकार से सजाकर और पूजा पाठ आदि कराकर गाय और बछड़े को चराने भेजा।
पूजा पाठ के बाद श्री कृष्ण जी ने सभी बछड़े खोल दिए। चिंता दिखाते हुए यशोदा जी ने बलराम जी से कहा, “बछड़ों को चराने दूर मत निकल जाना। श्री कृष्ण को अकेले मत छोड़ना।” श्री कृष्ण द्वारा गोवत्स चारण की इस पुण्य तिथि को पर्व के रूप में मनाया जाता है।
औगद्वादश कब और कैसे मनायी जाती है?
जन्माष्टमी के चार दिन बाद औगद्वादश मनायी जाती है।
औगद्वादश विधि
प्रातः लकड़ी के पटरे पर भीगी मिट्टी से सात गाय, सात बछड़े, एक तालाब, सात ढक्कन वाले पतीले से बना लेते हैं। पूजा के लिए थाली में चने मोठ भीगे हुए, खीरे, केला, हल्दी दूब यानि हरी घास, दही, चीनी, खुले पैसे, चांदी का सिक्का रख लेते हैं।
अपने माथे पर भी हल्दी से टीका कर लेते हैं। फिर कथा कहते हैं और सुनते समय अपने हाथ में मोठ लेकर छीलते रहते हैं। कहानी खत्म होने पर सातों पतीलों जैसे कुल्हड़ों में भरकर थोड़े से तालाब पर भी चढ़ा देते हैं। साथ ही खीरा, केला, चीनी पैसा भी चढ़ा देते हैं।
फिर एक परात पटरे के नीचे रखकर पटरे पर तालाब में सात सात बार लोटे से दूध मिला जल सब स्त्रियां बारी बारी से चढ़ाती हैं और गाय बछड़े को हल्दी से टीका लगाती हैं। देवरानी – जेठानी या सास – बहू मिलकर फिर परात वाला जल चांदी का सिक्का व दूब घास हाथ में लेकर पटरे पर चढ़ाती है।
इसके बाद पटरे को धूप में रखकर और सूखने पर मिट्टी जमुना जी में सिला देते हैं। बाद में पटरे का सामान काम वाली को देते हैं। परात के जल को सब स्त्रियां मिलकर सूरज को देती हैं। फिर सीधे हाथ पर ढाई छिले हुए चने मोठ, दूब घास, दही चीनी और उल्टे हाथ पर एक और आधा छिले हुए चने, मोठ, चीनी, दही, दूब रखकर उल्टे हाथ वाला खा लेते हैं।
सीधे हाथ वाला अपने पीछे फेंक देते हैं। फिर थाली में चने मोठ, बेसन के लड्डू, रुपये, फल रखकर पानी में मिनसकर बायना निकालकर देते हैं।
औगद्वादश के दिन स्त्रियां पूरा दिन गाय का दूध, गेहूं, चावल नहीं खाती बल्कि बेसन और मूंग की दाल की पकौड़ी पूडे कुछ भी बनाकर खाती हैं। इस दिन व्रत नहीं किया जाता।
औगद्वादश का उद्यापन
जिस घर में इसी वर्ष लड़का उत्पन्न हो या लड़के की शादी हो उस वर्ष पटरे पर चौदह गाय, चौदह बछड़े, और सात कुल्हियां बनती हैं। एक बड़ी थाली या अखबार पर चने, मोठ, एक खीरा, एक बेसन का लड्डू, पांच या ग्यारह रुपये रखकर चौदह जगह ढेरियां बनाते हैं।
उन पर साड़ी ब्लाउज, पैरों पड़ाई के रुपये, मिठाई, फल रखकर बायना मिनसकर सास को पैर छूकर देते हैं। सब घरों में भी एक एक ढेरी भिजवा दी जाती है।
उद्यापन वाले वर्ष एक तो प्रतिवर्ष की तरह समान्य बायना और दूसरा साड़ी ब्लाउज, पैर पड़ाई वाले रुपये, चने मोठ, खीरा, लड्डू मिठाई उद्यापन वाला बायना निकाला जाता है।
औगद्वादश की कथा
एक राजा के सात बेटे थे और एक पोता था। एक दिन रानी ने अपनी बहू से कहा कि ‘धान – धानड़े’ को सम्भाल कर रखना। धान – धानड़े उनकी गाय के बछड़े का नाम था। सास के समझाने के बाद भी बहू ने बछड़े का ध्यान नहीं रखा।
राजा के सभी कुए, तालाब सूख गये। तब रानी ने बहू को उसके पीहर भेज दिया। और उसका बेटा अपने ही पास रख लिया। एक साल तक उनके तालाब और कुओं मे पानी नहीं आया।
तब राजा ने पंडितों को बुलाकर पूछा कि इसमे पानी किस तरह से आएगा। पंडित बोले कि बड़े बेटे या इकलौते पोते की बलि देने से पानी आ जाएगा। तब राजा ने इकलौते पोते की बलि दे दी।
बलि देते ही कुएं, तालाब पानी से भर गए। रानी ने बहू को भी पीहर से वापिस बुला लिया। उसके बाद औगद्वादश आयी तो सब बोले कि अपने तालाब पर ही धोक मरने चलेंगे।
सबने मिलकर खूब गाजे बाजे के साथ तालाब पर औगद्वादश की पूजा की। पूजा के बाद बहू ने रानी से कहा कि अब तो अपने पोते को भी बुला लो। तब रानी ने कहा कि वह बाहर खेल रहा है तुम्हीं उसे आवाज लगाकर बुला लो।
बहू के आवाज लगाने पर राजा के द्वारा बलि दिया हुआ पोता तालाब में से बाहर आ गया। तालाब से बाहर आते देखकर सास बहू एक दूसरे को देखने लगी और बहू के बाहर खेलने वाली बात पूछने पर सास ने बलि वाली सारी बात बताकर बहू से कहा कि यह तेरे ही भाग्य का है।
औगद्वादश माता ने सत्त रखकर तेरा बेटा वापिस दे दिया। अपना पोता वापिस पाकर राजा ने सारे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि सब बेटों की माँ को औगद्वादश करनी चाहिए। बेटे होने का, बेटे के ब्याह का उद्यापन करना है औगद्वादश माता! जैसा फल पीछे बहू को दिया वैसा ही फल सब किसी को मिले। कहने वाले को, सुनने वाले को, हुंकारा भरने वाले को, सारे परिवार को मिले। इस कहानी के बाद बिनायक बाबा की कहानी भी सुन लेते हैं।
बिन्दायक जी की कहानी
विष्णु भगवान् लक्ष्मी जी से विवाह रचने जा रहे थे। उन्होंने सारी सभा इकट्ठी करी और सभी देवतागण को भी बुलाया। देवता लोग बोले कि हम तो चलेंगे ही किन्तु गणेशजी को साथ लेकर नहीं जाएंगे। क्योंकि इसे तो एक मन मूंग, सवा मन चावल, खूब सारा घी नाश्ता करने के लिए चाहिये और खाने के लिए दुबारा चाहिये।
इसके सूंड और लंबे लंबे कान और ऊंचा माथा देखकर सभी मज़ाक बनाएंगे। इसको साथ ले जाकर क्या करेंगे। इसको देखकर कुण्डिनपुर की नारियां देख कर शर्माएंगी। इसको तो घर की रखवाली करने के लिए यहीं छोड़कर जाएंगे।
सभी भगवान् विष्णु जी की बारात में सम्मिलित होने चले गए। इतने में नारदजी आकर गणेशजी से बोले, “सबने तुम्हारा बहुत ही अपमान किया है और तुम्हें घर की रखवाली के लिए भी छोड़ गए हैं। तुम्हें ले जाने से बारात अच्छी नहीं लगती, इसलिए तुम्हें नहीं ले गए है।”
गणेशजी बोले, “अब क्या करें?” तब नारदजी बोले, “धरती थोथी कर दो।” इससे भगवान् के रथ का पहिया धरती में धस गया। सबने निकालने की बहुत कोशिशें की। लेकिन पहिया नहीं निकल पाया। उनमें से कोई बढ़ई को बुलाकर लाया।
बढ़ई ने हाथ लगाते ही कहा,” जय बिन्दायक जी ।जय गणेशजी!” कोई बोला, “तूने बिन्दायक जी को क्यों याद किया?” तब वह बोला कि बिन्दायक जी को याद किए बिना कोई भी कार्य नहीं होता।
तब एक व्यक्ति बोला कि हम तो बिन्दायक जी को घर छोड़ आये। बाद में सब बिन्दायक जी को बुलाने गये। तब वह बोले कि मैं तो नहीं चलू। सबके मनाने पर रिद्धि सिद्धि के साथ विवाह में सम्मिलित हुए।
बाद में विष्णु जी ने लक्ष्मी जी से विवाह किया और घर आ गए। हे! बिन्दायक जी महाराज जैसा भगवान् के कार्य सिद्ध किए। इसी प्रकार सभी के कार्य सिद्ध करना।
कुशोत्पाटनी अमावस्या
भाद्रपद की अमावस्या को पितरों को धोक मार कर पूजा करते हैं और सामग्री चढ़ाते है। रानी सती जी के मंदिर में जाकर जल, मोली, प्रसाद, पूरी, फूल, रोली, मेहंदी, काजल, चूडी, सिंदूर, लड्डू, नारियल, दक्षिणा सती जी पर चढ़ाओ।
निष्कर्ष
अजा एकादशी भगवान विष्णु की आराधना का अत्यंत पुण्यदायी व्रत माना जाता है। श्रद्धा और विधि-विधान से इस व्रत को करने तथा कथा का श्रवण करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है। यदि आप अन्य एकादशियों की कथा, पूजा विधि और महत्व भी जानना चाहते हैं, तो हमारी अन्य एकादशी संबंधी जानकारी भी अवश्य पढ़ें।
अजा एकादशी से जुड़े प्रश्न
अजा एकादशी किस माह में आती है?
अजा एकादशी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में आती है।
अजा एकादशी किस भगवान को समर्पित है?
यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है।
क्या अजा एकादशी पर चावल खाना चाहिए?
एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित माना गया है।
अजा एकादशी का पारण कब किया जाता है?
द्वादशी तिथि में शुभ समय पर व्रत का पारण किया जाता है।
अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक ग्रंथों, पुराणों तथा प्रचलित सनातन मान्यताओं पर आधारित है। विभिन्न क्षेत्रों और परंपराओं के अनुसार पूजा-विधि एवं मान्यताओं में थोड़ा अंतर हो सकता है।





