उपांग ललिता पंचमी व्रत (Upang Lalita Panchami Vrat, Puja Vidhi, Mahatv, Aarti) – हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ललिता पंचमी Lalita Panchami) का पर्व मनाया जाता है। पार्वती जी को शक्ति कहा जाता है इसलिए शक्ति के स्वरुप में पार्वती जी को ललिता देवी (Lalita Devi) के रूप में पूजा जाता है। ललिता देवी को त्रिपुर सुंदरी भी कहते हैं। शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन ललिता पंचमी की पूजा अर्चना (Lalita Panchami Ki Puja) की जाती है। इस दिन लोग उपवास रखते हैं। मुख्य रूप से यह पर्व गुजरात और महाराष्ट्र में बहुत ही हर्षोल्लास से मनाते हैं। इस पर्व को उपांग ललिता पंचमी व्रत (Upang Lalita Panchami Vrat) और ललिता जयंती (Lalita Jayanti) भी कहते हैं। यह व्रत पुत्रवती स्त्रियों को अवश्य ही करना चाहिए। कामदेव के शरीर की राख से उत्पन्न राक्षस भांडा संहार करने के लिए माता ललिता का जन्म हुआ था। इस वर्ष यह व्रत 2 अक्टूबर 2019 को है।

ललिता पंचमी व्रत पूजन विधि
- ललिता पंचमी (Lalita Panchmi) के दिन किसी भी नदी में स्नान कर किसी भी बांस के बर्तन में वहां की बालू या रेत घर लेकर आए।
- इस बालू को देवी ललिता का रूप देकर स्थापित करें और इसका पूजन करे।
- पुष्प और चावल से निम्न मंत्र से 28 बार पुष्पांजलि अर्पित कीजिए –
ललिते ललिते देवि सौख्यसौभाग्यदायिनी।
या सौभाग्यसमुत्पन्ना तस्यै देव्यै नमो नमः॥
- देवी को फल अर्पित कीजिए।
- दिन में उपवास रखे और रात्रि जागरण कर अगले दिन प्रतिमा का विसर्जन कर दें।
- घर पर हवन कीजिए उसके बाद 15 ब्राह्मणों और 15 कन्याओं को भोजन कराएं।
- ललिता पंचमी के दिन ललिता सहस्त्रनाम और ललिता त्रिशती का पाठ करना चाहिए।
मां ललिता देवी की कथा (Lalita Devi Ki Kahani)
नैमिषारण्य में एक बार राजा दक्ष प्रजापति के आने से सभी लोग उनके स्वागत के लिए उठे लेकिन भगवान् शिव नहीं उठे। यह राजा दक्ष को अच्छा नहीं लगा और उन्होंने इसे अपना अपमान समझा।
एक बार दक्ष ने अपने निवास पर यज्ञ का आयोजन किया तो अपमान स्वरूप राजा दक्ष ने शिव जी को आमंत्रित नहीं किया। जब ये बात माता सती को मालूम हुई तो वो बिना अनुमति के ही अपने पिता के घर आयोजन में चल दी।
अपने पिता के घर पहुंचकर माता सती ने अपने पति शिवजी का जब बहुत अपमान सुना तो उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने यज्ञ वेदी मे कूदकर अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
इस बात की जानकारी जब शिवजी को हुई तो वह तुरन्त वहां पहुंचे और माता सती के शव को अपने कंधे पर रखकर चल दिये और क्रोध विलाप मे इधर से उधर जाने लगे। भगवान् विष्णु शिवजी की यह दशा देख अपने चक्र से सती की देह को विभाजित कर देते हैं। भगवान् शंकर को हृदय में धारण करने के कारण इन्हें ललिता कहा जाने लगा।
माता ललिता देवी का प्रादुर्भाव तब होता है जब ब्रह्मा द्वारा छोड़ा गया चक्र पाताल को समाप्त करने लगता है और पृथ्वी जलमग्न होने लगती है। जिसकी वज़ह से सभी ऋषि घबरा जाते हैं और माता ललिता देवी की उपासना करते हैं। परिणामस्वरूप देवी ललिता उस चक्र को अपने हाथों में थाम लेती है और पृथ्वी को पुनः नया जीवन प्राप्त होता है।
ललिता पंचमी व्रत का महत्व (Significance Of Lalita Panchami Vrat)
ऐसा माना जाता है कि यदि कोई भक्त इस दिन माँ ललिता का व्रत रखता है तो उसे माँ भगवती की कृपा प्राप्त होती है व अभीष्ट आशीर्वाद मिलता है। जीवन में हमेशा सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।
त्रिपुर सुंदरी माता ललिता के दर्शनों से सभी प्रकार के कष्टों का निवारण स्वतः ही हो जाता है। ललिता पंचमी व्रत सभी प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाला माना गया है। यह व्रत भक्त को शक्ति प्रदान करता है
यही सब कारण है कि ललिता पंचमी के दिन सभी मंदिरों में भक्तों का तांता लगा रहता है और इस दिन मेलों का आयोजन होता है। लाखों की संख्या में लोग इस दिन को बड़े ही हर्ष और उल्लास के साथ मनाते हैं।
ललिता माता की आरती (Lalita Mata Aarti)
श्री मातेश्वरी जय त्रिपुरेश्वरी।
राजेश्वरी जय नमो नमः॥
करुणामयी सकल अघ हारिणी।
अमृत वर्षिणी नमो नमः॥
जय शरणं वरणं नमो नमः।
श्री मातेश्वरी जय त्रिपुरेश्वरी।
राजेश्वरी जय नमो नमः॥
अशुभ विनाशिनी, सब सुख दायिनी।
खल – दल नाशिनी नमो नमः॥
भंडासुर वध कारिणी जय मां।
करुणा कलिते नमो नम:॥
जय शरणं वरणं नमो नम:।
श्री मातेश्वरी जय त्रिपुरेश्वरी॥
भव भय हारिणी कष्ट निवारिणी।
शरण गति दो नमो नम:॥
शिव भामिनी साधक मन हारिणी।
आदि शक्ति जय नमो नम:॥
जय शरणं वरणं नमो नम:।
श्री मातेश्वरी जय त्रिपुरेश्वरी॥
जय त्रिपुर सुंदरी नमो नम:।
जय राजेश्वरी जय नमो नम:॥
जय ललितेश्वरी जय नमो नम:।
जय अमृत वर्षिणी नमो नम:॥
जय करुणा कलिते नमो नम:।
श्री मातेश्वरी जय त्रिपुरेश्वरी॥
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