Lalita Panchami Vrat, Puja Vidhi, Mahatv, Aarti

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उपांग ललिता पंचमी व्रत (Upang Lalita Panchami Vrat, Puja Vidhi, Mahatv, Aarti) – हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ललिता पंचमी Lalita Panchami) का पर्व मनाया जाता है। पार्वती जी को शक्ति कहा जाता है इसलिए शक्ति के स्वरुप में पार्वती जी को ललिता देवी (Lalita Devi) के रूप में पूजा जाता है। ललिता देवी को त्रिपुर सुंदरी भी कहते हैं। शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों की पूजा, महत्व और तिथियों में पांचवें दिन ललिता पंचमी की पूजा-अर्चना की जाती है।

इस दिन लोग उपवास रखते हैं। यदि आप अन्य प्रमुख व्रतों की विधि भी जानना चाहते हैं, तो सभी प्रमुख व्रत एवं पूजा की संपूर्ण जानकारी भी पढ़ सकते हैं।

मुख्य रूप से यह पर्व गुजरात और महाराष्ट्र में बहुत ही हर्षोल्लास से मनाते हैं। इस पर्व को उपांग ललिता पंचमी व्रत (Upang Lalita Panchami Vrat) और ललिता जयंती (Lalita Jayanti) भी कहते हैं।

यह व्रत पुत्रवती स्त्रियों को अवश्य ही करना चाहिए। विवाहित महिलाएं वट सावित्री व्रत की पूजा विधि और महत्व की तरह इस व्रत को भी श्रद्धापूर्वक करती हैं। कामदेव के शरीर की राख से उत्पन्न राक्षस भांडा संहार करने के लिए माता ललिता का जन्म हुआ था। इस वर्ष यह व्रत 15 अक्टूबर 2026 को है।

उपांग ललिता पंचमी व्रत (Upang Lalita Panchami Vrat, Puja Vidhi, Mahatv, Aarti)

ललिता पंचमी व्रत पूजन विधि

  • ललिता पंचमी (Lalita Panchmi) के दिन किसी भी नदी में स्नान कर किसी भी बांस के बर्तन में वहां की बालू या रेत घर लेकर आए।
  • इस बालू को देवी ललिता का रूप देकर स्थापित करें और इसका पूजन करे।
  • पुष्प और चावल से निम्न मंत्र से 28 बार पुष्पांजलि अर्पित कीजिए –

ललिते ललिते देवि सौख्यसौभाग्यदायिनी।

या सौभाग्यसमुत्पन्ना तस्यै देव्यै नमो नमः॥

  • देवी को फल अर्पित कीजिए।
  • दिन में उपवास रखे और रात्रि जागरण कर अगले दिन प्रतिमा का विसर्जन कर दें। यदि आप देवी आराधना से जुड़े अन्य व्रत भी करना चाहते हैं, तो शुक्रवार व्रत की विधि, कथा और उद्यापन भी पढ़ सकते हैं।
  • घर पर हवन कीजिए उसके बाद 15 ब्राह्मणों और 15 कन्याओं को भोजन कराएं।
  • ललिता पंचमी के दिन ललिता सहस्त्रनाम और ललिता त्रिशती का पाठ करना चाहिए।

मां ललिता देवी की कथा (Lalita Devi Ki Kahani)

नैमिषारण्य में एक बार राजा दक्ष प्रजापति के आने से सभी लोग उनके स्वागत के लिए उठे लेकिन भगवान् शिव नहीं उठे। यह राजा दक्ष को अच्छा नहीं लगा और उन्होंने इसे अपना अपमान समझा।

एक बार दक्ष ने अपने निवास पर यज्ञ का आयोजन किया तो अपमान स्वरूप राजा दक्ष ने शिव जी को आमंत्रित नहीं किया। जब ये बात माता सती को मालूम हुई तो वो बिना अनुमति के ही अपने पिता के घर आयोजन में चल दी।

अपने पिता के घर पहुंचकर माता सती ने अपने पति शिवजी का जब बहुत अपमान सुना तो उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने यज्ञ वेदी मे कूदकर अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

इस बात की जानकारी जब शिवजी को हुई तो वह तुरन्त वहां पहुंचे और माता सती के शव को अपने कंधे पर रखकर चल दिये और क्रोध विलाप मे इधर से उधर जाने लगे। भगवान् विष्णु शिवजी की यह दशा देख अपने चक्र से सती की देह को विभाजित कर देते हैं। भगवान् शंकर को हृदय में धारण करने के कारण इन्हें ललिता कहा जाने लगा।

माता ललिता देवी का प्रादुर्भाव तब होता है जब ब्रह्मा द्वारा छोड़ा गया चक्र पाताल को समाप्त करने लगता है और पृथ्वी जलमग्न होने लगती है। जिसकी वज़ह से सभी ऋषि घबरा जाते हैं और माता ललिता देवी की उपासना करते हैं। परिणामस्वरूप देवी ललिता उस चक्र को अपने हाथों में थाम लेती है और पृथ्वी को पुनः नया जीवन प्राप्त होता है।

ललिता पंचमी व्रत का महत्व (Significance Of Lalita Panchami Vrat)

ऐसा माना जाता है कि यदि कोई भक्त इस दिन माँ ललिता का व्रत रखता है तो उसे माँ भगवती की कृपा प्राप्त होती है। इसी प्रकार महालक्ष्मी व्रत का महत्व और पूजा विधि भी धन-समृद्धि के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। जीवन में हमेशा सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।

त्रिपुर सुंदरी माता ललिता के दर्शनों से सभी प्रकार के कष्टों का निवारण स्वतः ही हो जाता है। ललिता पंचमी व्रत सभी प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाला माना गया है। यह व्रत भक्त को शक्ति प्रदान करता है

यही सब कारण है कि ललिता पंचमी के दिन सभी मंदिरों में भक्तों का तांता लगा रहता है और इस दिन मेलों का आयोजन होता है। लाखों की संख्या में लोग इस दिन को बड़े ही हर्ष और उल्लास के साथ मनाते हैं।

ललिता माता की आरती (Lalita Mata Aarti)

श्री मातेश्वरी जय त्रिपुरेश्वरी।

राजेश्वरी जय नमो नमः॥

करुणामयी सकल अघ हारिणी।

अमृत वर्षिणी नमो नमः॥

जय शरणं वरणं नमो नमः।

श्री मातेश्वरी जय त्रिपुरेश्वरी।

राजेश्वरी जय नमो नमः॥

अशुभ विनाशिनी, सब सुख दायिनी।

खल – दल नाशिनी नमो नमः॥

भंडासुर वध कारिणी जय मां।

करुणा कलिते नमो नम:॥

जय शरणं वरणं नमो नम:।

श्री मातेश्वरी जय त्रिपुरेश्वरी॥

भव भय हारिणी कष्ट निवारिणी।

शरण गति दो नमो नम:॥

शिव भामिनी साधक मन हारिणी।

आदि शक्ति जय नमो नम:॥

जय शरणं वरणं नमो नम:।

श्री मातेश्वरी जय त्रिपुरेश्वरी॥

जय त्रिपुर सुंदरी नमो नम:।

जय राजेश्वरी जय नमो नम:॥

जय ललितेश्वरी जय नमो नम:।

जय अमृत वर्षिणी नमो नम:॥

जय करुणा कलिते नमो नम:।

श्री मातेश्वरी जय त्रिपुरेश्वरी॥

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PUNIT NAGAR
पुनीत नागर JSBJM.org के संस्थापक और लेखक हैं। वे मेहंदीपुर बालाजी धाम, मंदिर से जुड़ी धार्मिक परंपराओं, दर्शन, अर्जी-दरखास्त, हनुमान भक्ति और सनातन धर्म से संबंधित विषयों पर हिंदी में लेख लिखते हैं। उनका प्रयास उपलब्ध आधिकारिक एवं विश्वसनीय स्रोतों, शोध सामग्री, पुस्तकों तथा संबंधित धार्मिक और स्थानीय परंपराओं के संदर्भ में जानकारी को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है। जहाँ किसी जानकारी का आधार धार्मिक मान्यता या स्थानीय परंपरा होता है, उसे उसी संदर्भ में स्पष्ट करने का प्रयास किया जाता है।

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