Shattila Ekadashi Vrat भगवान विष्णु को समर्पित माघ कृष्ण पक्ष की एक महत्वपूर्ण एकादशी है। इस व्रत में तिल का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार षट्तिला एकादशी का व्रत करने से पापों का नाश होता है, रोगों से मुक्ति मिलती है तथा भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
यदि आप वर्षभर आने वाली सभी एकादशियों, उनकी तिथि, व्रत नियम और धार्मिक महत्व के बारे में जानना चाहते हैं, तो एकादशी व्रत की संपूर्ण जानकारी भी पढ़ सकते हैं। आइए जानते हैं षट्तिला एकादशी व्रत का महत्व, पूजा विधि, कथा और व्रत के लाभ।
षटतिला एकादशी व्रत (Shattila Ekadashi Vrat)
| 01 | व्रत कब किया जाता है? | यह व्रत सनातन धर्म के पंचांग के अनुसार माघ कृष्ण पक्ष की एकादशी को किया जाता है। |
| 02 | व्रत के प्रमुख अनुयायी | हिन्दू धर्म अनुयायी। |
| 03 | व्रत का उद्देश्य | समस्त पापों से छुटकारा और धन, यश और पुत्र प्राप्ति हेतु। |
| 04 | व्रत के अधिष्ठाता देव | भगवान् विष्णु । |
| 05 | व्रत की मुख्य वस्तु | तिल, विशेष रूप से छह प्रकार के तिल। |

Shattila Ekadashi Vrat का महत्व
यह व्रत सनातन धर्म के पंचांग के अनुसार माघ कृष्ण पक्ष की एकादशी को किया जाता है। षटतिला व्रत भगवान् विष्णु जी महाराज के लिए किया जाता है।
छह प्रकार के तिलों का प्रयोग होने के कारण इस व्रत को षटतिला व्रत (Shattila Ekadashi Vrat) कहा जाता है। यह छह प्रकार के तिल हैं :-
- जल में तिल मिलाकर स्नान करना।
- तिल का उबटन।
- तिल मिले जल को ग्रहण करना।
- तिल से तिलक करना।
- तिल से हवन करना, और
- तिल से बने खाद्य पदार्थों का सेवन करना।
इस दिन जो भक्त जितने भी तिलों का दान पुण्य करता है वह उतने ही सहस्त्र वर्षों तक स्वर्ग में निवास करता है।
इस व्रत को करने से रोगी को आरोग्य मिलता है। किए गए पापों से मुक्ति मिलेगी है। यह व्रत हत्या से लगने वाले पाप को भी दूर करने का सामर्थ्य रखता है।
पुराणों के अनुसार भक्त गण नियमपूर्वक व्रत पूजा करके बैकुण्ठ लोक को प्राप्त होते हैं। धन और पुत्र की कामना करने वाले भक्त इस व्रत को करते हैं।
षटतिला एकादशी व्रत की सामग्री (Shattila Ekadashi Vrat Pujan Samagri)
| 01 | पंचामृत |
| 02 | तिल |
| 03 | धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, चावल, रोली । |
| 04 | फलाहार के लिए मौसमी फल। |
| 05 | उड़द और तिल की खिचड़ी। |
| 06 | हवन सामग्री और देसी घी। |
Shattila Ekadashi Vrat पूजा विधि
- प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहन लें।
- पंचामृत तैयार कर लें और इसमें तिल मिश्रित करके भगवान् विष्णु जी को स्नान कराएं।
- धूप, नैवेद्य, पुष्प, अक्षत, रोली से विष्णु भगवान् का पूजन अर्चन करें।
- षटतिला एकादशी से पहली रात यानि दशमी की रात्रि से व्रत शुरू कर देना चाहिए।
- एकादशी के दिन पूरे दिन व्रत रखें।
- व्रत में फलों का सेवन कर सकते हैं।
- उड़द और तिल को मिलाकर खिचड़ी बनाकर भगवान् विष्णु जी को भोग लगाना चाहिए।
- तिल से निर्मित खाद्य पदार्थों को स्वयं ग्रहण करें और ब्राह्मणों को भी खिलाएं।
- दिन में पूरे दिन विष्णु जी के भजन कीर्तन करें।
- तुलसी जी के सामने घी का दीपक अवश्य जलाये इससे भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं।
- अगर सम्भव हो सके तो रात्रि के समय हवन कीजिए और निम्न मंत्र से उच्चारण करते हुए तिल की आहुति अग्नि में 108 बार दें।
“ओम नमो भगवते वासुदेवाय नमः स्वाहा”
- रात्रि शयन भगवान् की मूर्ति या तस्वीर के सामने करना चाहिए।
Shattila Ekadashi Vrat कथा
बहुत पुरानी बात है एक बार वाराणसी नगर में एक गरीब अहीर रहा करता था। गरीबी और दीनता से बेहाल वह बेचारा कभी-कभी भूखा ही अपने बच्चों के साथ आसमान में तारे गिनता रहता था।
वह रोज गंगा से लकड़ियां काट कर लाता था और यही उसका जिंदगी गुजारने का एकमात्र सहारा था। लकड़ियां बेचकर वह बेचारा दो जून की रोटी का जुगाड़ करता था।
जिस दिन उसकी लकड़ियां नहीं बिक पाती थी उस दिन उसे भूखे पेट ही सोना पड़ता था।
एक दिन की बात है वह एक साहूकार के घर लकड़ियां पहुंचाने के लिए निकल पड़ा। वहां जाकर वह देखता है कि वहां तो किसी जश्न की तैयारी चल रही है।
उत्सुकतावश वह जानने के लिए साहूकार के निकट पहुंचा और उससे पूछा, “सेठ जी, यह किस उत्सव की तैयारी हो रही है?”
उसकी बात जान वह साहूकार बोला, “यह षटतिला व्रत (Shattila Ekadashi Vrat) की तैयारी हो रही है। इस व्रत से रोगों, पापों, हत्या आदि भव बंधनों से छुटकारा मिलता है तथा धन और पुत्र की प्राप्ति होती है।”
यह सब सुनकर वह गरीब साहूकार से अपनी लकडिय़ों का मूल्य लेकर अपने घर पहुंचा और उसने उस दिन के पैसों से षटतिला व्रत का समान (Shattila Ekadashi Vrat Ka Saman) खरीदा।
पूरे दिन उसने नियम विधि से षटतिला (Shattila Ekadashi Vrat) का व्रत किया। उसके यह व्रत रखने का परिणाम यह हुआ कि वह गरीबी से दूर हुआ और धन यश पाकर सम्मानित किया जाने लगा।
षट्तिला एकादशी व्रत के लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार षट्तिला एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस दिन तिल का दान, तिल से हवन, तिलयुक्त स्नान और तिल का सेवन अत्यंत शुभ माना गया है। श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत करने से पापों का नाश, आरोग्य, सुख-समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।
Shattila Ekadashi Vrat का धार्मिक महत्व
Shattila Ekadashi Vrat में तिल का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को करने से पापों का नाश होता है, रोगों से मुक्ति मिलती है तथा भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। तिल दान और तिल से जुड़े धार्मिक कार्य इस व्रत को अत्यंत पुण्यदायी बनाते हैं।
षट्तिला एकादशी के बाद आने वाली जया एकादशी का भी विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत से पापों से मुक्ति तथा भूत-प्रेत बाधाओं से छुटकारा मिलने की मान्यता है।
जया एकादशी के बाद आने वाली विजया एकादशी भी भगवान विष्णु को समर्पित महत्वपूर्ण एकादशी मानी जाती है।
निष्कर्ष
षट्तिला एकादशी भगवान विष्णु की आराधना और तिल दान का विशेष पर्व है। श्रद्धा एवं विधि-विधान से इस व्रत को करने से पापों का नाश, पुण्य की प्राप्ति तथा भगवान विष्णु की कृपा मिलने की मान्यता है। यदि आप अन्य एकादशियों की कथा, पूजा विधि और महत्व भी जानना चाहते हैं, तो हमारी अन्य एकादशी संबंधी जानकारी भी अवश्य पढ़ें।
Shattila Ekadashi Vrat FAQ
Shattila Ekadashi Vrat कब किया जाता है?
यह व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को किया जाता है।
षटतिला एकादशी व्रत में तिल का क्या महत्व है?
इस व्रत में तिल का उपयोग स्नान, दान, हवन और भोजन में किया जाता है।
षटतिला एकादशी व्रत किस भगवान को समर्पित है?
यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है।
षटतिला एकादशी व्रत का क्या फल मिलता है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार इस व्रत से पापों का नाश, पुण्य की प्राप्ति और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
षट्तिला एकादशी पर क्या खाना चाहिए?
व्रत के दौरान फल, दूध, दही, तिल से बने सात्विक व्यंजन तथा व्रत में खाए जाने वाले अन्य फलाहार का सेवन किया जा सकता है।
क्या षट्तिला एकादशी पर चावल खाना चाहिए?
एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित माना गया है। इसलिए इस दिन सात्विक व्रत भोजन करना उचित माना जाता है।
षट्तिला एकादशी का पारण कब किया जाता है?
द्वादशी तिथि में निर्धारित शुभ समय पर भगवान विष्णु की पूजा के बाद व्रत का पारण किया जाता है।
अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक ग्रंथों, पुराणों तथा प्रचलित सनातन मान्यताओं पर आधारित है। विभिन्न क्षेत्रों और परंपराओं के अनुसार पूजा-विधि एवं मान्यताओं में थोड़ा अंतर हो सकता है।





