सिन्दूर तृतीया और इसका महत्व क्या है? (Sindoor Tritiya And Its Significance) – पितृपक्ष शुरू होने के बाद और नवरात्रि के प्रारंभ में ही जो अमावस्या आती है उसे महालया कहा जाता है और इसी दिन से देवी आदि शक्ति की पूजा शुरू करने का दिन माना गया है। यूं तो नवरात्रि के छठे दिन से बंगाल राज्य में देवी के पंडाल सजाने शुरू हो जाते हैं लेकिन नवरात्रि के तीसरे दिन की महत्ता भी कम नहीं है। सिंदूर तृतीया (Sindoor Tritiya) शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन यानि हिन्दू पंचांग के अनुसार तृतीया तिथि के दिन मनायी जाती है। यह दिन देवी के नौ रूपों में से तीसरा देवी मां चंद्रघंटा का होता है।

हिंदू धर्म में सिंदूर को सुहाग की निशानी माना जाता है। इसे महिलाएं अपने पति की खुशी से जोड़ती हैं। विवाहित होकर भी सिंदूर न लगाना अशुभ माना जाता है इसलिए महिलाओं के लिए मान्यताओं और रीति रिवाज के नाम पर सिंदूर लगाना और भी जरूरी हो जाता है। महिलाये भले से छोटा लेकिन लगाती अवश्य हैं। हिन्दू परिवार की महिलाओं के लिए सिंदूर अन्य किसी भी वस्तुओं से बढ़कर है।
इस सिंदूर तृतीया (Sindoor Tritiya) के दिन माता रानी को सिंदूर चढ़ाने से सुहागिन स्त्रियों के सौभाग्य में वृद्धि होती है, घर में सुख शांति आती है और यह जीवन के क्लेश को दूर करता है। सिंदूर को देवी पूजा की विशेष सामग्रियों मे शामिल किया जाता है।
सिंदूर तृतीया (Sindoor Tritiya) को अन्य कई नामों से भी पुकारा जाता है जैसे महा तृतीया नवरात्रि दुर्गा पूजा, सौभाग्य तीज और गौरी तीज। पश्चिम बंगाल में महिलाए इस दिन एक दूसरे के सिंदूर लगाती हैं और इस दिन लाल बॉर्डर की सफेद साड़ी पहनती हैं। मान्यता है कि यह दिन मॉं चंद्रघण्टा के विवाहित रूप देवी पार्वती को दर्शाता है।
सिंदूर तृतीया (Sindoor Tritiya) के दिन सुहागिन महिलाओं को माता को सिंदूर चढ़ाकर शेष बचे सिंदूर को प्रसाद समझकर प्रतिदिन अपनी मांग में भरना चाहिए और इसी सिंदूर से अपने घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर स्वास्तिक का चिह्न बनाना चाहिए जिससे घर में सुख और समृद्धि का प्रवेश होता है।
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