आखिर क्यों क्रोधित हनुमान के लिए कृष्ण बने श्री राम?

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श्री कृष्ण बने श्री राम का यह प्रसंग भगवान हनुमान की अपने आराध्य श्रीराम के प्रति अटूट भक्ति को दर्शाता है। यह कथा भक्तों के बीच काफी लोकप्रिय है और बताती है कि हनुमान जी के लिए श्रीराम का स्थान सबसे सर्वोपरि है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय भक्त हनुमान का क्रोध शांत करने और कुछ लोगों का अहंकार दूर करने के लिए एक अद्भुत लीला रची। इसी लीला में उन्हें श्रीराम का रूप धारण करना पड़ा।

आइए इस प्रसिद्ध कथा को विस्तार से जानते हैं और समझते हैं कि इससे हमें क्या सीख मिलती है।

यही नहीं श्री कृष्ण जी की पत्नी रुक्मणी को माँ सीता बन कर हनुमान जी को अपने दर्शन देने पड़े थे।

विषय श्री कृष्ण बने श्रीराम
मुख्य पात्र भगवान श्रीकृष्ण, भगवान हनुमान, रुक्मिणी, सत्यभामा, गरुड़ और नारद जी
मुख्य संदेश भक्ति, विनम्रता और अहंकार का त्याग
धार्मिक आधार यह कथा विभिन्न धार्मिक परंपराओं और प्रचलित मान्यताओं में प्रसिद्ध है।

ध्यान दें: यह कथा विभिन्न धार्मिक परंपराओं और लोकमान्यताओं में प्रचलित है। अलग-अलग ग्रंथों और कथावाचन परंपराओं में इसके वर्णन में कुछ अंतर मिल सकते हैं।

आखिर क्यों क्रोधित हनुमान के लिए कृष्ण बने श्री राम?

भगवान श्रीकृष्ण को श्रीराम का रूप क्यों धारण करना पड़ा?

भगवान हनुमान केवल श्रीराम को ही अपना आराध्य मानते हैं। उनकी भक्ति इतनी गहरी थी कि वे हर स्थान पर श्रीराम का ही स्मरण करते थे। इसी कारण जब उन्हें द्वारका लाया गया, तब उनका क्रोध शांत करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीराम का रूप धारण किया।

यह प्रसंग भगवान के विभिन्न अवतारों की एकता और सच्चे भक्त के प्रेम को भी दर्शाता है।

श्री कृष्ण बने श्री राम की कथा

दरअसल भगवत पुराण के अनुसार यह घटना उस समय की है जब कृष्ण के भाई अपने साहस, पत्नी सत्यभामा अपनी खूबसूरती और कृष्ण जी के वाहन गरुड़ अपनी शक्ति के नशे में चूर हो गए थे।

जब श्री कृष्ण ने यह सब देखा तो उन्होंने उनके घमंड को तोड़ने के लिए एक लीला रची जिसका किसी को भी आभास नहीं था।

एक दिन नारद मुनि इन्द्र की देव सभा में आए। उनके सम्मान मे वहां उपस्थित सभी देवता खड़े हो गए गरूड को छोड़कर।

गरुड़ का ये व्यवहार इन्द्र को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने जब इसका कारण गरुड़ से पूछा तो गरुड़ ने कहा कि मै एक शक्तिशाली पक्षी हूं।

और मै ऐसे किसी भी साधु के सम्मान में खड़ा नहीं हो सकता जो केवल इधर से उधर भटक कर दुनिया भर की बाते बनाता हो।

यह सुनकर नारद मुनि को गहरा धक्का लगता है। अगले ही दिन यह बात वो श्री कृष्ण को बताने के लिए उनके महल पहुंच जाते हैं।

जैसे ही श्री कृष्ण ने नारद मुनि को देखा तो वो तुरन्त खड़े हो गए। और नारद मुनि के चरणों को धोकर आदर पूर्वक बैठाया।

इसके बाद उन्होंने नारद मुनि से देवलोक के बारे में पूछा। तभी नारद जी ने कृष्ण को पूरी घटना सुना दी।

गरुड़ के इस व्यवहार पर कृष्ण जी ने नारद मुनि से क्षमा मांगी और उनसे कहा कि वो कृपा करके सत्यभामा को बुलाए।

पहले तो नारद मुनि चौंक गए कि सत्यभामा का इससे क्या लेना देना? और आखिर वो क्यों बुलाए सत्यभामा को?

फिर भी वो सत्यभामा को बुलाने पहुंच जाते हैं। लेकिन सत्यभामा तो अपने शृंगार मे खोई हुई थी।

बार बार वो अपने को शीशे मे निहार रहीं थीं। अपने आभूषणों की चमक मे उन्हें कुछ भी नजर नहीं आ रहा था।

तभी नारद मुनि ने उन्हें आवाज लगाई सुनो सत्यभामा, श्री कृष्ण आपको बुला रहे हैं।

लेकिन सत्यभामा ने कोई उत्तर नहीं दिया। वो अपनी खूबसूरती मे ही खोयी रहीं।

नारद मुनि को फिर एक बार अपमान का घूंट पीना पड़ा। वो तत्काल श्री कृष्ण के पास गए और पूरी बात बताई।

ये सुनकर उन्होंने नारद मुनि से अनुरोध किया कि वो जाए और केले के जंगल मे तपस्या कर रहे हनुमान को बुलाए।

हनुमान जी का नाम सुनकर हनुमान जी फिर चक्कर में पड़ गए कि भला अब हनुमान जी बीच में कहां से आ गए।

खैर, कृष्ण जी की बात का अनुसरण करते हुए केले के जंगल मे पहुंच गए। तभी उन्हें हनुमान नजर आए।

वो उनके पास गए और कहा, हे! वायु पुत्र आपको श्री कृष्ण बुला रहे हैं।

तपस्या मे बाधा पड़ते ही हनुमान जी को बहुत क्रोध आया परन्तु उन्होंने अपने आप को सम्भाला और फिर से तपस्या मे लीन हो गए।

लेकिन जैसे ही नारदजी ने हनुमान जी से कहा कि हे! वायु पुत्र आपको कृष्ण बुला रहे हैं तभी हनुमान जी ने गुस्से में तुरंत प्रश्न किया कि कौन कृष्ण?

मैं किसी कृष्ण को नहीं जानता। और यह कहकर वो पुनः ध्यानमग्न हो गए।

भगवान हनुमान को कई धार्मिक परंपराओं में भगवान शिव का रुद्रावतार भी माना जाता है। इसके बारे में विस्तार से जानने के लिए शिव अवतार हनुमान पोस्ट भी पढ़ें।

तब नारद मुनि को ध्यान आया कि हनुमान तो श्री राम के परम भक्त हैं।

वो केवल श्री राम की ही पूजा करते हैं और उन्हीं की आज्ञा का पालन करते हैं। राम नाम ही वो दिव्य मंत्र है जो हनुमान से कुछ भी करवा सकता है।

इसके बाद नारद मुनि राम नाम की धुन गाने लगे। राम नाम की धुन सुनकर हनुमान सम्मोहित हो गए और नारद मुनि के पीछे पीछे चलने लगे।

राम नाम की धुन का सहारा लेकर नारद जी हनुमान जी को द्वारिका तक ले गए। लेकिन वहां पहुंच कर नारद मुनि ने जैसे ही राम नाम की धुन बंद की हनुमान जी होश मे आ गए।

और जब उन्होंने देखा कि वो जंगल मे नहीं हैं बल्कि दूसरी जगह आ पहुंचे हैं तो उनको बहुत क्रोध आ गया और उन्होंने द्वारिकापुरी के बगीचे को तहस नहस करना प्रारंभ कर दिया।

वहीं दूसरी ओर जब बलराम को पता लगा कि किसी वानर ने नगर में उत्पात मचाया हुआ है तो उन्होंने हनुमान जी को पकड़ने के लिए गरुड़ को भेजा।

बलराम को तनिक भी आभास नहीं था कि गरुड़ को वो जिससे लड़ने भेज रहे हैं वो कोई साधारण वानर नहीं है बल्कि स्वयं हनुमान हैं।

हनुमान जी के सामने गरुड़ की शक्ति बहुत तुच्छ थी। हनुमान जी ने पल भर मे ही गरुड़ के घमंड को ध्वस्त कर दिया।

भगवान हनुमान के अद्भुत बल और पराक्रम से जुड़ी एक और प्रसिद्ध कथा हनुमान और बाली का युद्ध में पढ़ सकते हैं, जिसमें वानरराज बाली के अहंकार का रोचक प्रसंग मिलता है।

अब स्वयं बलराम को हनुमान जी के सामने आना पड़ा उन्हें रोकने के लिए। लेकिन हनुमान जी ने बलराम के घमंड को भी चुटकी में स्वाहा कर दिया।

अब ऐसा कोई नहीं था जो हनुमान जी के क्रोध को शांत कर सकता था।

आखिर में बलराम ने श्री कृष्ण को बुलाया। तब श्री कृष्ण ने बलराम को बताया कि वो कोई साधारण वानर नहीं है बल्कि हनुमान हैं।

और अब तो उन्हें केवल श्री राम ही रोक सकते हैं। इसके बाद उन्होंने सत्यभामा को बुलाया और कहा कि हे! सत्यभामा सीता बनकर आइए।

इसके बाद सत्यभामा वापस चली गई और सुन्दर आभूषण और वस्त्र बदलकर साधारण वस्त्र पहनकर और अपने बाल फैलाकर वापस आयीं।

सत्यभामा को लगा श्री कृष्ण शायद वनवास वाली सीता को देख कर प्रसन्न हो जाएंगे लेकिन श्री कृष्ण तो उन्हें देखकर हंसने लगे और उनसे कहा कि मेरे पास सीता बनकर आइए।

सत्यभामा को कुछ समझ नहीं आया। वो वापस गई और फिर खूब सारे आभूषण और बढ़िया सी साड़ी पहनकर आयी।

श्री कृष्ण ने उन्हें देखा और जोर जोर से हंसते हुए कहा कि आप तो सीता की जगह आभूषण की दुकान बनकर आ गयी।

मैंने आपसे सीता बनकर आने को कहा था। यह सुनते ही सत्यभामा का घमंड चूर चूर हो गया।

इसके बाद श्री कृष्ण ने रुक्मणी को आवाज लगायी और कहा कि हे रुक्मणी! सीता बनकर आईए।

यह सुनते ही रुक्मणी श्री कृष्ण के पास भाव विभोर होकर दौड़ी चली आई और अपने पुत्र जैसे हनुमान के बारे में जानकर उनकी आंखों में आंसू झलक आए। क्योंकि हनुमान उन्हें अपनी माता मानते थे।

यह देख कर सत्यभामा की आंखे शर्म से नीची हो गई। इसके बाद श्री कृष्ण बने श्री राम और रुक्मिणी सीता बनकर हनुमान जी के समक्ष गए।

और, जैसे ही हनुमान जी ने श्री राम और माता जानकी को देखा वो बच्चे की तरह रोने लगे और उनके पैरों में गिर गए।

भगवान श्रीराम के प्रति ऐसी ही अटूट भक्ति का अनुभव हनुमान चालीसा में भी मिलता है। इसके धार्मिक महत्व और पाठ के नियम जानने के लिए हनुमान चालीसा की महिमा पोस्ट भी जरूर पढ़ें।

श्री राम ने उनसे कहा कि मेरे प्रिय हनुमान मै तुमसे मिलने आया हूं।

मैं तुम्हारा त्रेतायुग वाला राम हूं लेकिन द्वापर युग मे मैं केवल कृष्ण हूं और इस समय मैं तुम्हारे सामने राम और कृष्ण दोनों ही रूप मे हूं।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

यह कथा सिखाती है कि अहंकार चाहे शक्ति का हो, सौंदर्य का हो या ज्ञान का, अंत में उसका नाश निश्चित है। दूसरी ओर सच्ची भक्ति, विनम्रता और भगवान के प्रति समर्पण व्यक्ति को महान बनाते हैं।

निष्कर्ष

श्री कृष्ण बने श्रीराम की यह कथा भगवान हनुमान की अटूट रामभक्ति और भगवान की दिव्य लीलाओं का सुंदर उदाहरण है। यह हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति में अहंकार का कोई स्थान नहीं होता और भगवान अपने भक्तों की भावनाओं का सदैव सम्मान करते हैं।

भगवान हनुमान की भक्ति, कथाओं, चालीसा, साधना और उनसे जुड़े अन्य धार्मिक प्रसंगों को विस्तार से जानने के लिए हनुमान भक्ति, कथा और साधना: सम्पूर्ण मार्गदर्शिका भी जरूर पढ़ें।

FAQs

क्या श्रीकृष्ण ने वास्तव में श्रीराम का रूप धारण किया था?

यह प्रसंग विभिन्न धार्मिक परंपराओं और लोकमान्यताओं में प्रचलित है।

रुक्मिणी ने माता सीता का रूप क्यों धारण किया?

हनुमान जी की श्रीराम और माता सीता के प्रति अटूट भक्ति का सम्मान करने के लिए।

इस कथा का मुख्य संदेश क्या है?

अहंकार का त्याग, सच्ची भक्ति और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण।

भगवान हनुमान अपार बल होने के बाद भी स्वयं को हमेशा श्रीराम का सेवक मानते हैं। यही उनका सबसे बड़ा गुण है और प्रत्येक भक्त के लिए प्रेरणा भी।

यह सुनकर हनुमान भगवान् श्री राम के गले लगकर रोने लगते हैं। तो भक्तों आपको यह हनुमान जी की कथा कैसी लगी हमे अवश्य बताईयेगा।

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॥ जय श्री राम ॥

। जय हनुमान ।

॥ जय श्री बालाजी महाराज॥

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PUNIT NAGAR
पुनीत नागर JSBJM.org के संस्थापक और लेखक हैं। वे मेहंदीपुर बालाजी धाम, मंदिर से जुड़ी धार्मिक परंपराओं, दर्शन, अर्जी-दरखास्त, हनुमान भक्ति और सनातन धर्म से संबंधित विषयों पर हिंदी में लेख लिखते हैं। उनका प्रयास उपलब्ध आधिकारिक एवं विश्वसनीय स्रोतों, शोध सामग्री, पुस्तकों तथा संबंधित धार्मिक और स्थानीय परंपराओं के संदर्भ में जानकारी को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है। जहाँ किसी जानकारी का आधार धार्मिक मान्यता या स्थानीय परंपरा होता है, उसे उसी संदर्भ में स्पष्ट करने का प्रयास किया जाता है।

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