हनुमानजी का कर्जा | एक सुंदर प्रसंग | Hanumanji Ka Karja |

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हनुमान जी का कर्जा भगवान श्रीराम और उनके परम भक्त हनुमान जी के बीच अटूट प्रेम, निस्वार्थ सेवा और समर्पण का अत्यंत भावुक प्रसंग है। इस कथा में भगवान श्रीराम स्वयं स्वीकार करते हैं कि हनुमान जी के उपकारों का ऋण चुकाना उनके लिए भी संभव नहीं है।

यदि आप Hanuman Ji Ka Karja की पूरी कथा, इसका आध्यात्मिक महत्व और इससे मिलने वाली शिक्षा जानना चाहते हैं, तो इस पोस्ट को अंत तक अवश्य पढ़ें।

विवरण जानकारी
प्रसंग हनुमान जी का कर्जा
संबंधित ग्रंथ रामायण
मुख्य पात्र श्रीराम, हनुमान जी, सीता माता
विषय भक्ति, सेवा और समर्पण

महत्वपूर्ण सूचना: हनुमान जी का कर्जा भक्तों के बीच प्रचलित एक लोकप्रिय धार्मिक प्रसंग है। इसमें रामचरितमानस की अनेक चौपाइयों का उल्लेख मिलता है। कथा का वर्तमान स्वरूप लोक परंपरा और धार्मिक प्रवचनों में व्यापक रूप से सुनाया जाता है।

हनुमान जी का कर्जा प्रसंग क्या है?

हनुमान जी का कर्जा भगवान श्रीराम और हनुमान जी के बीच प्रेम, सेवा और भक्ति का ऐसा प्रसंग है, जिसमें भगवान स्वयं अपने भक्त के उपकारों को स्वीकार करते हैं। यह कथा बताती है कि सच्ची भक्ति कभी किसी प्रतिफल की अपेक्षा नहीं करती।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान हनुमान को शिव का अंशावतार भी माना जाता है। इस विषय की विस्तृत जानकारी शिव अवतार हनुमान पोस्ट में पढ़ सकते हैं।

इस प्रसंग में श्रीराम अपने सभी सहयोगियों को सम्मानपूर्वक विदा करते हैं, लेकिन हनुमान जी को अपने पास ही रखते हैं। आगे चलकर यही प्रसंग भक्त और भगवान के अनोखे संबंध को अत्यंत भावुक रूप में प्रस्तुत करता है।

रामजी लंका पर विजय प्राप्त कर के आए तो, भगवान ने विभीषण जी, जामवंत जी, अंगद जी, सुग्रीव जी सब को अयोध्या से विदा किया।

सब ने सोचा, हनुमान जी को प्रभु बाद में विदा करेंगे, लेकिन रामजी ने हनुमान जी को विदा ही नहीं किया ।
अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात है, सब गए, परन्तु हनुमान जी नहीं गए अयोध्या से !

हनुमान जी का कर्जा

अब दरबार में काना फूसी शुरू हुई कि हनुमान जी से कौन कहे जाने के लिए? तो सब से पहले माता सीता की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमान जी चले जाएं।

सीता बोलीं मैं तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक एक दिन एक एक कल्प के समान बीत रहा था, वो तो हनुमान जी थे, जो प्रभु मुद्रिका ले के गए, और धीरज बंधवाया कि ..

कछुक दिवस जननी धरु धीरा।
कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।
तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥

“मैं तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़ कर जाने के लिए, आप किसी और से बुलावा लो।”

अब बारी आयी लक्ष्मण जी की तो लक्ष्मण जी ने कहा, मैं तो लंका की रणभूमि में वैसे ही मरणासन्न अवस्था में पड़ा था, पूरा रामदल विलाप कर रहा था।

प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।
आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।।

ये तो जो खड़ा है, वो हनुमान जी का लक्ष्मण है। मैं कैसे बोलूं, किस मुंह से बोलूं कि हनुमान जी अयोध्या से चले जाएं !

अब बारी आयी भरत जी की, अरे ! भरत जी तो इतना रोए, कि रामजी को अयोध्या से निकलवाने का कलंक तो वैसे ही लगा है मुझ पर, हनुमान जी का सब मिल के और लगवा दो !
और दूसरी बात ये कि …

बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना।
अधम कवन जग मोहि समाना॥

मैंने तो नंदीग्राम में ही अपनी चिता लगा ली थी, वो तो हनुमान जी थे जिन्होंने आ कर ये खबर दी कि …

रिपु रन जीति सुजस सुर गावत।
सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥

मैं तो बिल्कुल न बोलूं हनुमान जी से अयोध्या छोड़ कर चले जाओ, आप किसी और से बुलवा लो।
अब बचा कौन ..? सिर्फ शत्रुघ्न जी। जैसे ही सब ने उन की तरफ देखा, तो शत्रुघ्न जी बोल पड़े …

मैंने तो पूरी रामायण में कहीं नहीं बोला, तो आज ही क्यों बुलवा रहे हो, और वो भी हनुमान जी को अयोध्या से निकलने के लिए, जिन्होंने माता सीता, लक्ष्मण भैया, भरत भैया सब के प्राणों को संकट से उबारा हो ! किसी अच्छे काम के लिए कहते बोल भी देता। मैं तो बिल्कुल भी न बोलूं।

अब बचे तो मेरे राघवेन्द्र सरकार …माता सीता ने कहा प्रभु ! आप तो तीनों लोकों के स्वामी हैं, और देखती हूं आप हनुमान जी से सकुचाते हैं और आप खुद भी कहते हो कि …

प्रति उपकार करौं का तोरा।
सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥

आखिर आप के लिए क्या अदेय है प्रभु !
राघवजी ने कहा देवी कर्जदार जो हूं, हनुमान जी का, इसीलिए तो …

सनमुख होइ न सकत मन मोरा

देवी ! हनुमान जी का कर्जा (Hanumanji Ka Karja) उतारना आसान नहीं है, इतनी सामर्थ्य राम में नहीं है, जो “राम नाम” में है, क्योंकि कर्जा उतारना भी तो बराबरी का ही पड़ेगा न … !

यदि सुनना चाहती हो तो सुनो हनुमान जी का कर्जा कैसे उतारा जा सकता है।

पहले हनुमान विवाह करें,
लंकेश हरें इन की जब नारी।
मुदरी लै रघुनाथ चलै,
निज पौरुष लांघि अगम्य जे वारी।
आयि कहें, सुधि सोच हरें,
तन से, मन से होई जाएं उपकारी।
तब रघुनाथ चुकायि सकें,
ऐसी हनुमान की दिव्य उधारी।।

देवी ! इतना आसान नहीं है, हनुमान जी का कर्जा चुकाना। मैंने ऐसे ही नहीं कहा था कि …

“सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं”

भगवान हनुमान की कृपा और उनकी भक्ति के महत्व को समझने के लिए हनुमान चालीसा की महिमा भी अवश्य पढ़ें।
मैंने बहुत सोच विचार कर कहा था, लेकिन यदि आप कहती हो तो कल राज्य सभा में बोलूंगा कि हनुमान जी भी कुछ मांग लें।

श्रीराम हनुमान जी का ऋण क्यों नहीं चुका सके?

हनुमान जी ने माता सीता की खोज, लंका दहन, संजीवनी लाना और युद्ध के दौरान अनेक ऐसे कार्य किए जिनके बिना श्रीराम का कार्य कठिन हो सकता था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि उन्होंने कभी अपने लिए कोई सम्मान या पुरस्कार नहीं मांगा।

इसी कारण श्रीराम स्वयं स्वीकार करते हैं कि हनुमान जी की सेवा का प्रतिदान देना संभव नहीं है। यही कारण है कि इस कथा को ‘हनुमान जी का कर्जा’ कहा जाता है।

दूसरे दिन राज्य सभा में सब एकत्र हुए, सब बड़े उत्सुक थे कि हनुमान जी क्या मांगेंगे, और रामजी क्या देंगे।

राघवजी ने कहा ! हनुमान, सब लोगों ने मेरी बहुत सहायता की और मैंने, सब को कोई न कोई पद दे दिया। विभीषण और सुग्रीव को क्रमशः लंका और किष्किन्धा का राजपद, अंगद को युवराज पद। तो तुम भी अपनी इच्छा बताओ …

हनुमान जी बोले ! प्रभु आप ने जितने नाम गिनाए, उन सब को एक एक पद मिला है, और आप कहते हो …

तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना

तो फिर यदि मैं दो पद मांगू तो … ?

सब लोग सोचने लगे बात तो हनुमान जी भी ठीक ही कह रहे हैं।
राम जी ने कहा ! ठीक है, मांग लो ।

सब लोग बहुत खुश हुए कि आज हनुमान जी का कर्जा चुकता हुआ।

हनुमान जी ने कहा ! प्रभु जो पद आप ने सब को दिए हैं, उन के पद में राजमद हो सकता है, तो मुझे उस तरह के पद नहीं चाहिए, जिस में राजमद की शंका हो,

तो फिर … ! आप को कौन सा पद चाहिए ?

हनुमान जी ने रामजी के दोनों चरण पकड़ लिए, प्रभु … ! हनुमान को तो बस यही दो पद चाहिएं।

हनुमत सम नहीं कोउ बड़भागी।
नहीं कोउ रामचरण अनुरागी।।

जानकी जी की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए राघवजी बोले, लो उतर गया हनुमान जी का कर्जा !

और अभी तक जिस को बोलना था, सब बोल चुके हैं, अब जो मैं बोलता हूं उसे सब सुनो, रामजी भरत भैया की तरफ देखते हुए बोले …

हे ! भरत भैया’ कपि से उऋण हम नाही

हनुमान जी का कर्जा प्रसंग से क्या शिक्षा मिलती है?

यह प्रसंग हमें सिखाता है कि निस्वार्थ सेवा, विनम्रता और भगवान के प्रति समर्पण सबसे बड़ा धर्म है। हनुमान जी ने कभी किसी पद या पुरस्कार की इच्छा नहीं की, बल्कि केवल भगवान श्रीराम की सेवा को ही अपना जीवन माना।

आज भी यह कथा भक्तों को प्रेरणा देती है कि यदि सेवा निष्काम भाव से की जाए तो उसका मूल्य संसार की कोई वस्तु नहीं चुका सकती।

हम चारों भाई चाहे जितनी बार जन्म लेे लें, हनुमान जी से उऋण नही हो सकते।
यदि आप जानना चाहते हैं कि हनुमान चालीसा की रचना कब और कैसे हुई, तो हनुमान चालीसा की उत्पत्ति की जानकारी भी पढ़ें।

Frequently Asked Questions

हनुमान जी का कर्जा प्रसंग क्या है?

यह प्रसंग भगवान श्रीराम और हनुमान जी के बीच प्रेम, सेवा और समर्पण को दर्शाता है।

श्रीराम ने हनुमान जी को उऋण क्यों नहीं माना?

क्योंकि हनुमान जी ने श्रीराम और उनके परिवार के लिए अनेक महान कार्य किए थे जिनका प्रतिदान संभव नहीं था।

हनुमान जी ने श्रीराम से क्या मांगा?

हनुमान जी ने श्रीराम के चरणों में भक्ति और सेवा का अवसर मांगा।

Hanuman Ji Ka Karja कहानी का संदेश क्या है?

यह कथा निस्वार्थ सेवा, भक्ति और समर्पण का महत्व बताती है।

क्या हनुमान जी का कर्जा रामचरितमानस में मिलता है?

इस प्रसंग में प्रयुक्त कई चौपाइयां रामचरितमानस से ली गई हैं, जबकि पूरी कथा भक्तों के बीच लोक परंपरा और धार्मिक प्रवचनों में प्रचलित रूप में सुनाई जाती है।

हनुमान जी का कर्जा प्रसंग हमें क्या प्रेरणा देता है?

यह प्रसंग भगवान के प्रति निस्वार्थ सेवा, विनम्रता और सच्ची भक्ति का संदेश देता है।

अगर आप भगवान हनुमान की भक्ति, कथाओं, पूजा विधियों और धार्मिक मान्यताओं के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं, तो हनुमान भक्ति, कथा और साधना: सम्पूर्ण मार्गदर्शिका भी अवश्य पढ़ें।

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PUNIT NAGAR
पुनीत नागर JSBJM.org के संस्थापक और लेखक हैं। वे मेहंदीपुर बालाजी धाम, मंदिर से जुड़ी धार्मिक परंपराओं, दर्शन, अर्जी-दरखास्त, हनुमान भक्ति और सनातन धर्म से संबंधित विषयों पर हिंदी में लेख लिखते हैं। उनका प्रयास उपलब्ध आधिकारिक एवं विश्वसनीय स्रोतों, शोध सामग्री, पुस्तकों तथा संबंधित धार्मिक और स्थानीय परंपराओं के संदर्भ में जानकारी को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है। जहाँ किसी जानकारी का आधार धार्मिक मान्यता या स्थानीय परंपरा होता है, उसे उसी संदर्भ में स्पष्ट करने का प्रयास किया जाता है।

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