शास्त्रों और वेद पुराणों में ऐसा कहा गया है कि भगवान् शंकर यानि शिव जी पैदल चलकर कांवड़ (Kanvd) में लाए गंगाजल से बहुत प्रसन्न होते हैं।
आज के वर्तमान परिवेश में एक ओर जहां लाखों की संख्या में लोग एक किलोमीटर भी रोजाना पैदल नहीं चलते वे सभी सावन और फाल्गुन के महीने में भगवान् भोले भंडारी के आशीर्वाद से कांवड़ यात्रा (Kanvd Yatra) में सौ किलोमीटर से छह सौ किलोमीटर तक का कठिन रास्ता पैदल चलकर पूरा करते हैं।
कांवड़ यात्रा (Kanvd Yatra) पूरी करके शिवलिंग पर गंगाजल से अभिषेक करते हैं। कांवड़ यात्रा में सारे रास्ते बम-बोल-बम और ओम नमः शिवाय का उच्चारण करते हुए यात्रा की जाती है।

शिवजी बहुत ही भोले हैं इसी वज़ह से इन्हें भोलेनाथ भी कहा जाता है। ये अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं तुरन्त पूरी कर देते हैं।
कांवड़ यात्रा में शिव भक्तों की श्रद्धा और निष्ठा भाव देखने लायक होता है।
जब उनके पैरों में छाले होते हैं तो ये ओम नमः शिवाय का जाप करते हुए अपनी मंजिल तक पहुंच जाते हैं।
आंधी, तेज धूप और मूसलाधार बारिश में भी ये नहीं रुकते और जाप करते हुए आगे बढ़ते जाते हैं।
जब कांवड़िए शिवरात्रि के दिन शिव मंदिर पहुंच कर लाए गए गंगाजल से अभिषेक करते हैं तो इनकी सारी पीड़ा और कष्ट दूर हो जाता है और कांवड़ यात्रा (Kanvd Yatra) सफल हो जाती है।
कांवड़ क्यों चढ़ायी जाती है क्या है इसकी पौराणिक कथा?
जब समुद मंथन हो रहा था, उस समय सबसे पहले समुद से विष उत्पन्न हुआ।
उस विष की भयंकर गर्मी से देवतागण, दैत्य और सारा संसार व्याकुल हो गया। तब शिव जी ने आगे आकर सभी के कल्याण हेतु विष का पान कर लिया।
लेकिन उन्होंने उस विष को कंठ तक ही सीमित रखा। जिससे उनका कण्ठ नीला हो गया और वे नीलकण्ठ कहलाए।
भगवान् शिव पर गर्मी का इतना असर होने लगा कि वे तीनों लोकों में घूमने लगे और राम नाम के स्थान पर उनके मुख से बम बम निकलने लगा।
तब देवताओं ने विष की गर्मी को शांत करने के लिए शिव जी के मस्तक पर बहुत सा जल चढ़ाया। कालांतर में गंगा जी की स्थापना भगवान् शिव के मस्तक पर की गई।
उसी समय से शिव जी पर जल चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है जो कि आज तक मान्य है।
पुराणों में य़ह वर्णन किया गया है कि रावण ने भी हरिद्वार से गंगाजल लाकर भगवान् शिव का अभिषेक किया था।
प्रमुख स्थान जहां से कांवड़िए गंगाजल लेकर आते हैं। ( Important Cities Of Kanvd Yatra)
कांवड़ यात्रा शुरू करने के प्रमुख स्थल निम्न हैं :-
- गोमुख
- हरिद्वार
- कोलकाता
- वैद्यनाथ धाम
- गढ़ मुक्तेश्वर (उत्तर प्रदेश)
गोमुख और हरिद्वार (Gomukh & Haridwar)
गोमुख (Gomukh) पवित्र नदी गंगा जी का उद्गम स्थल है। गोमुख के अलावा हरिद्वार की हर की पौड़ी से लाखों करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु कांवड़िए कांवड़ में जल भरकर पैदल चलते हुए अपने शहरों की ओर निकलते हैं और शिवजी का जलाभिषेक करते हैं।
हरियाणा राज्य में बाद्यौत जिला महेन्द्रगढ़, उत्तर प्रदेश में पुरा – महादेव, जिला मेरठ में लाखों लोग कांवड़ चढ़ाते हैं।
इसके अलावा अपने अपने नगरों में जहां कांवड़िए स्थानीय शिवालयों में पूजा करते हैं जिनमे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने श्री बनखंडी महादेव मंदिर, लालकिले के समीप स्थित श्री गौरी शंकर मंदिर, कमला नगर में राधा कृष्ण मंदिर अधिक प्रमुख हैं।
कोलकाता
तारकेश्वर मंदिर कोलकाता में स्थित है। यहां श्रावण मास में लाखों की संख्या में कांवड़ चढ़ायी जाती है।
कालीघाट में तारकेश्वर की दूरी लगभग 80 किलोमीटर है। सेवड़ा पुली से तारकेश्वर की दूरी लगभग 32 किलोमीटर है।
यहां से भक्त कांवड़ में गंगाजल भरकर ले जाते हैं और तारकेश्वर महादेव व लोकनाथ पर जल चढ़ाते है।
यहां कांवड़िए तारक बम बोलते हुए आगे बढ़ते जाते हैं।
बाबा वैद्यनाथ धाम
बिहार राज्य के जे. सी. डी. रेलवे जंक्शन से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी देवघर है जहां भगवान् भोलेनाथ वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान है।
सावन और भादों के महीने में लाखों भक्त यहां कांवड़ चढ़ाते हैं। यहां कुछ भक्त डाक कांवड़ (Dak Kanvd) भी चढ़ाते है। जिन्हें डाक बम भी कहा जाता है।
ये भक्त 16 से 24 घंटों के भीतर ही सुल्तानगंज से जल भरकर 105 किलोमीटर का रास्ता बगैर रुके देवघर पहुंच जाते हैं।
बाबा वैद्यनाथ धाम की यात्रा नंगे पैर ही पूरी करनी होती है। कांवड़ में दो कलशों में गंगाजल होता है।
एक कलश का गंगाजल बाबा वैद्यनाथ पर चढ़ाते हैं और दूसरे कलश का गंगाजल देवघर से 44 किलोमीटर दूर बाबा वासुकीनाथ पर चढ़ाते हैं।
कांवड़ यात्रा का जरूरी सामान
- कांवड़ (Kanvd) जो श्रद्धा से सजी हुई हो और दो जल के पात्र।
- तीन जोड़ी कपड़े जो कि भगवा रंग के हों जिसमें तीन बनियान, तीन कच्छे, और तीन ग़मछे हो।
- एक लीटर की दूध की बाल्टी।
- तीन मीटर की प्लास्टिक की पन्नी या चटाई।
- एक कपड़े का बना थैला।
- एक टॉर्च।
- एक चादर।
- एक चाकू।
- खुल्ले पैसे इच्छानुसार।
- सुतली।
- दवाई जिसमें पेनकिलर आदि हो।
आपकी कांवड़ यात्रा में कांवड़ पूजा का सामान
- प्रसाद (मिसरी या बादाम या बताशे)
- धूप या अगरबत्ती और माचिस।
- कपूर
- आरती करने के लिए एक छोटी हाफ प्लेट स्टील की।
- कलश ढंकने के लिए छोटे लाल कपड़े।
- आरती की पुस्तक यदि आरती याद न हो तो।
कीजिए कांवड़ यात्रा के प्रमुख नियम, पूजा और विधान (Kanvd Ke Niyam)
- ब्रह्मचर्य का पालन करें। सीधी जमीन और तख्त पर सोना वर्जित माना गया है।
- रास्ते में बोल बम बोल बम का उच्चारण करें और सांयकाल को भजन कीर्तन करें।
- अपने साथ जाने वाले संगी-साथी कांवड़ियों की सहायता करें।
- कांवड़ को हमेशा ऊंचे और साफ स्थान पर ही रखना चाहिए।
- प्रातःकाल और सांयकाल को कांवड़ की आरती करनी चाहिए।
- बोल बम का नारा लगाते हुए कांवड़ उठाते समय हमेशा कांवड़ दाहिने कंधे पर ही रखें।
- कांवड़ को दायें कंधे से बायें कंधे पर रखते समय कांवड़ को पीछे से ले जाए। सिर के ऊपर से नहीं ले जाना चाहिये।
- भोजन, नींद और शौच के बाद स्नान जरूर करना चाहिए।
- कांवड़ियों को अपना मन शुद्ध रखना चाहिए और मन में सच्ची श्रद्धा और लगन होनी चाहिए।
- कांवड़ियों को चाहिए कि वो रास्ते में तेल, कंघी, साबुन का उपयोग बिल्कुल न करें।
- चारपाई पर न बैठे और न सोये।
- चमड़े का समान भी साथ न रखें।
- मदिरापान और नशा न करें।
- किसी की बुराई नहीं करनी चाहिए।
गोमुख से हरिद्वार तक कांवड़ पदयात्रा
| क्रम संख्या | स्थान | कि.मी. | क्रम संख्या | स्थान | कि.मी. |
|---|---|---|---|---|---|
| 01 | गोमुख से गंगोत्री | 18 | 13 | भल्डियाना से स्याशू | 12 |
| 02 | गंगोत्री से भैरो घाटी | 10 | 14 | स्याशू से टिहरी | 7 |
| 03 | भैरो घाटी से लंका | 4 | 15 | टिहरी से नैहल | 12 |
| 04 | लंका से हरिसिल | 13 | 16 | नैहल से चंबा | 12 |
| 05 | हरसिल से झाला | 6 | 17 | चंबा से खाड़ी तल्ला नागनी | 8 |
| 06 | झाला से गंगनानी | 17 | 18 | खाड़ी तल्ला नागनी से खाड़ी नल्ला | 2 |
| 07 | गंगनानी से मनेरी | 12 | 19 | खाड़ी तल्ला नागनी से फकोट | 10 |
| 08 | मनेरी से उत्तरकाशी | 17 | 20 | फकोट से आगरा खाल | 5 |
| 09 | उत्तरकाशी से धरासू | 25 | 21 | आगरा खाल से नरेंद्र नगर | 6 |
| 10 | धरासू से चिल्याडी सौड | 5 | 22 | नरेन्द्र नगर से ऋषिकेश | 16 |
| 11 | चिल्याडी सौड से छाम | 12 | 23 | ऋषिकेश से हरिद्वार | 21 |
| 12 | छाम से भल्डियाना | 13 |
हरिद्वार से गौरी शंकर मंदिर दिल्ली तक कांवड़ पदयात्रा
| क्रम संख्या | स्थान | कि.मी. | क्रम संख्या | स्थान | कि.मी. |
|---|---|---|---|---|---|
| 01 | हरिद्वार से ज्वालापुर | 7 | 18 | सकोती से बलीदपुर | 5 |
| 02 | ज्वालापुर से बहादराबाद | 8 | 19 | बलीदपुर से दौराला | 3 |
| 03 | बहादराबाद से रुड़की | 15 | 20 | दौराला से मोदीपुरम | 8 |
| 04 | रुड़की से मंगलौर | 9 | 21 | मोदीपुरम से मेरठ शहर | 8 |
| 05 | मंगलौर से मंडावली | 8 | 22 | मेरठ शहर से परतापुर | 12 |
| 06 | मंडावली से गुरुकुल नारसन | 4 | 23 | परतापुर से मोहदीनपुर | 3 |
| 07 | गुरुकुल नारसन से पुरकाजी | 5 | 24 | मोहदीनपुर से मोदीनगर | 8 |
| 08 | पुरकाजी से बरला | 6 | 25 | मोदीनगर से मुरादनगर | 7 |
| 09 | बरला से छपार | 6 | 26 | मुरादनगर से मोरठा | 7 |
| 10 | छपार से सिसौना | 5 | 27 | मोरठा से गाजियाबाद | 7 |
| 11 | सिसौना से मुजफ्फरनगर | 11 | 28 | गाजियाबाद से हिंडन नदी | 2 |
| 12 | मुजफ्फरनगर से घासीपुरा | 5 | 29 | हिंडन नदी से मोहन मिकीन्स | 3 |
| 13 | घासीपुरा से नावला कोठी | 3 | 30 | मोहन मिकीन्स से बॉर्डर | 6 |
| 14 | नावला कोठी से भैसी | 3 | 31 | बॉर्डर से शाहदरा | 4 |
| 15 | भैसी से खतौली | 3 | 32 | शाहदरा से सीलमपुर | 3 |
| 16 | खतौली से तिगाई | 4 | 33 | सीलमपुर से गौरी शंकर मंदिर | 5 |
| 17 | तिगाई से सकोती | 7 | 34 | गौरी शंकर से राधा कृष्ण मंदिर कमला नगर | 6 |
श्री वैद्यनाथ धाम कांवड़ यात्रा सुल्तानगंज से बाबा धाम
| क्रम संख्या | स्थान | कि.मी. |
|---|---|---|
| 01 | सुल्तानगंज से असरगंज | 11 |
| 02 | असरगंज से तारापुर | 7 |
| 03 | तारापुर से रामपुर | 10 |
| 04 | रामपुर से कुमरसार नदी | 8 |
| 05 | कुमरसार नदी से जलेबिया | 11 |
| 06 | जलेबिया से सुईया | 12 |
| 07 | सुईया से बोल बम समिति | 8 |
| 08 | बोल बम समिति से कांवड़िया धर्मशाला | 5 |
| 09 | कांवड़िया धर्मशाला से इनारावन | 10 |
| 10 | इनारावन से गोडियारी नदी | 8 |
| 11 | गोडियारी नदी से कलकत्तिया | 8 |
| 12 | कलकत्तिया से दार्शनीया | 6 |
कहां कहां से भक्त आते हैं कांवड़ लेने-
बाबा धाम का नजारा बहुत ही सुंदर और आनंदकारी होता है।
यहां पर अलग अलग राज्यों से भक्त कांवड़ चढ़ाने के लिए आते हैं।
भक्त, यहां पर नेपाल, सिक्किम, गया, कोलकाता, रांची, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा आदि अन्य स्थानो से भक्त कांवड़ चढ़ाने के लिए आते हैं।
यहां पर आकर एक ही रंग भगवा रंग में रंग जाते हैं। और बम बम में रम जाते हैं।
पंचाक्षरी मंत्र ओम नमः शिवाय की तरह दो अक्षर का नाम बम एक महामंत्र है।
बोल बम बोलने से बाबा वैद्यनाथ अपने भक्तों के कष्टों को दूर करते हैं। और उन्हें मनवांछित फल प्रदान करते हैं।
सारे रास्ते कांवड़िये बोल बम का नारा लगाते हैं। ऐसा लगता है मानो कांवड़ियो को बोल बम के अलावा कुछ आता ही नहीं।
इस नारे से सारे शरीर में चुस्ती स्फूर्ति की लहर दौड़ जाती है।
बोल बम का नारा है, बाबा एक सहारा है।
बाबा नगरीया दूर है, जाना जरूर है।।शिव शंकर तेरी जटाओं में बहती है गंगधारा।
बाबा अमरनाथ बर्फानी – भूखे को अन्न, प्यासे को पानी।।
शिव योगी राखियो बाबा निरोगी।
बाबा के दर पर जो आते, वो लोग निराले होते हैं।
सावन में जो कांवड़ चढ़ाते, वो लोग किस्मत वाले होते हैं।।
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