जानिए क्यों चढ़ता है मेहंदीपुर बालाजी मंदिर में सवामणि का प्रसाद? Savamani Prasad Ki Katha :-
सवामणि प्रसाद की प्राचीन कथा ( Savamani )
कथा बहुत ही प्राचीन काल की है। राजस्थान के जिसे अब जयपुर के नाम से जाना जाता है, नगर की है। जयपुर के एक बड़े सेठ जी थे जिनका नाम हीरालाल था। वे नगर के एक बहुत बड़े स्वर्णकार हुआ करते थे।
विवाह के बारह वर्षों के बाद बमुश्किल उन्हें एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई थी। जिसे उन्होंने काफी लाड़ प्यार से पाला था।
एक दिन की बात है, उनका पुत्र छत पर खेल रहा था। छत पर खेलते खेलते अचानक उसका पैर फिसल गया और वह छत से नीचे गिर गया और फलस्वरूप बेहोश हो गया।
यह जानकर सेठ हीरालाल की पत्नी अत्यधिक परेशान होकर विलाप करने लगी। जब यह समाचार सेठ हीरालाल तक पहुंचा तो उन्होंने वैद्य, नीम, हकीमों को उपचार हेतु बुलाना शुरू कर दिया। चिकित्सा हेतु बहुत से नामी-गिरामी वैद्य आए और इलाज किया गया।
वैद्यों के द्वारा शारीरिक निरीक्षण और चिकित्सीय कृत्य किए गए परंतु तीन दिन बीत जाने के बावजूद वह बालक मूर्छित अवस्था से बाहर नहीं आया।
इकलौता पुत्र था इसी कारण से सेठ हीरालाल जी अपने पुत्र को बहुत प्रेम करते थे। दूसरी ओर, पत्नी की पीड़ा भी नही देखी जा रही थी।
एक महात्मा जी जो कि मेहंदीपुर बालाजी धाम में तपस्या करते किया करते थे। वह एक तपस्वी और अंतर्यामी महात्मा थे। इसी बीच वह उस सेठ जी के नगर में भिक्षा मांगने पहुंच गए।
जैसे ही महात्मा जी ने हीरालाल सेठ को देखा उन्होंने कहा कि क्या हुआ तेरे बेटे को अभी तक होश नहीं आया? तब हीरालाल सेठ महात्मा जी के चरणों में गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा।
उसने अपनी सारी व्यथा उन महात्मा जी को सुनाई कि कैसे विवाह के बारह वर्षों के उपरांत उसे एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी और अब वही एकमात्र पुत्र मूर्छित अवस्था में चला गया है।
बड़े-बड़े वैद्य नीम हकीम भी उसे ठीक नहीं कर पा रहे हैं। कृपया करके मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे मेरा पुत्र मूर्छा से निकल पावे और बिलकुल स्वस्थ हो जाए।
महात्मा जी ने थोड़ी देर सोच विचार करने के बाद सेठ हीरालाल से कहा कि आप मेहंदीपुर बालाजी दरबार में जाकर अर्जी लगाइए और श्री बालाजी महाराज को अपने हृदय की सारी व्यथा सारी पीड़ा सुना डालिए जिस प्रकार से मुझे सुनाई है। बालाजी महाराज आप का कल्याण अवश्य करेंगे। ऐसा कहते हुए वह वहां से चले गए।
तत्काल ही सेठ हीरालाल अपनी पत्नी के साथ मेहंदीपुर बालाजी धाम पहुंचे व वहां पर श्री बालाजी महाराज को अर्जी लगाई और अपने हृदय की सारी पीड़ा बालाजी महाराज के सम्मुख रखी।
और कहा कि “हे बालाजी महाराज! मेरा केवल एक ही सहारा मेरा पुत्र है और मैं आप के दरबार में एक भिखारी की हैसियत से आया हूं। हे बालाजी महाराज! अगर मेरा पुत्र पूर्णतः स्वस्थ हो गया, तो मैं आपको सवामन (पचास किलो) सोने का सिंहासन चढ़ाऊंगा।”
तीनों देवताओं (बालाजी,भैरवजी, प्रेतराज सरकार) की अर्जी लगाने के बाद वह सेठजी घर आ गए। दरबार से आने के बाद उन्होंने संध्या के समय बाला जी महाराज की ज्योत जगाई। और बालाजी के समक्ष अत्यधिक पुत्र पीड़ा से व्यथित होकर रोने लगे।
सेठ हीरालाल रोते रोते वहीं पर बालाजी की ज्योत के सम्मुख ही सो गए। स्वप्न में उसे एक हाथ में भारी सोटा, दूसरे हाथ में कड़ताल, सुंदरता ऐसी कि मानो करोड़ों कामदेव उस बाबा के सामने नतमस्तक हो रहे हो। मस्तक पर केसरी सिंदूर, गले में श्री सीताराम नाम की दुशाला, एवं कंठ में मोतियों व सोने के हार, होठों पर मधुर मुस्कान, सिर पर स्वर्ण मुकुट तथा शरीर में लाल लंगोट पहने हुए श्री बालाजी महाराज उसके समक्ष खड़े हुए थे।
स्वप्न में श्री बालाजी महाराज ने बोला कि “हे सेठ हीरालाल! मैंने आपकी अर्जी स्वीकार कर ली है। आपने सच्चे हृदय से मेरे दरबार में अर्जी लगाई है। परिणाम स्वरूप आपका पुत्र मूर्छित अवस्था से जग गया है।
पर आपने यह मन्नत मांगी है कि यदि मेरा पुत्र सही हो गया तो मैं सवामन(पचास किलो) सोने का सिंहासन चढ़ाऊंगा। तू तो मुझे सवामन सोने का सिंहासन चढ़ा देगा लेकिन मेरे बाकी भक्त जो इतने सक्षम नहीं है मैं उनके साथ अन्याय नहीं कर सकता।
इसलिए तू मुझे सवामन सोने की सिंहासन की जगह सवा मन लड्डू का भोग लगा दे।”
वह इतना स्वप्न देख ही रहा था कि उसका पुत्र वहां पर आया और सेठ हीरालाल का हाथ पकड़ लिया। यह चमत्कार को देखकर हीरालाल अत्यधिक प्रसन्न हो गया। साथ ही उसकी पत्नी भी स्वस्थ हो गई।
उसकी पत्नी ने कहा कि आपने जो सवामन सोने के सिंहासन की मन्नत मांगी थी, उसे तुरंत बनवाकर हम सब चलकर बालाजी महाराज को चढ़ा दें।
तब उस सेठ हीरालाल ने कहा कि बालाजी महाराज ने मुझे सवामन सोने के सिंहासन की जगह सवामन मोतीचूर के लड्डू चढ़ाने का आदेश दिया है। अतः मैं उनके आदेश का पालन करूंगा।
सेठ हीरालाल अपने परिवार के साथ व गांव वालों के साथ श्री बालाजी धाम पहुंचा और उसने सवा मन मोतीचूर के लड्डू बनवा कर श्री बालाजी महाराज को अर्पित किए।
सेठ हीरालाल के द्वारा चढ़ाया गया सवामन मोतीचूर का लड्डू ही सवामणी प्रसाद के रूप में जाना जाता है। आज भी जो भक्त श्री बालाजी महाराज के दरबार में अर्जी लगाते हैं। वे अपनी मनोकामना पूर्ण होने के बाद बालाजी महाराज को सवामनी का भोग (Savamani ka Bhog) लगाते हैं।
आज भी श्री बालाजी महाराज की प्रातः कालीन आरती से पूर्व ही लगने वाला छप्पन भोग हीरालाल सेठ के ही वंशजों के द्वारा लगाया जाता है। जो सुबह 4:00 बजे जयपुर से श्री बालाजी छप्पन भोग प्रसाद वाहन में भरकर लाया जाता है।
नोट :- यदि आप सभी भक्त श्री बालाजी महाराज को सवामणी (Savamani) प्रसाद का भोग लगाना चाहते हैं। तो श्री बालाजी महाराज मंदिर कार्यालय में संपर्क कर सकते हैं इससे संबंधित समस्त जानकारी वहां कार्यालय पर मिल जाएगी। धन्यवाद!
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