दूबड़ी आठे (दुर्वाष्टमी) भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला एक प्राचीन लोकपर्व है। इसे दुर्वाष्टमी या दूबड़ी आठे के नाम से जाना जाता है। इस दिन दूर्वा (दूब) की पूजा, व्रत तथा विशेष कथा का श्रवण करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस व्रत को करने से संतान की रक्षा, परिवार की सुख-समृद्धि और दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। कई स्थानों पर यह व्रत सप्तमी तिथि को भी मनाया जाता है, जिसे दूबड़ी साते कहा जाता है।
इस पोस्ट में आप दूबड़ी आठे की कथा, दुर्वाष्टमी पूजन विधि, व्रत का महत्व, उद्यापन विधि तथा इससे जुड़ी पारंपरिक मान्यताओं के बारे में विस्तार से जानेंगे। यदि आप भाद्रपद मास में आने वाले अन्य प्रमुख व्रतों की जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो राधा अष्टमी, महालक्ष्मी व्रत तथा व्रत एवं पूजा से संबंधित अन्य लेख भी पढ़ सकते हैं।
दूबड़ी आठे की कथा और इसकी पूजन विधि क्या है? (Dubdi Aathe ki Katha) –
दूबड़ी आठे भाद्रपद शुक्ल की अष्टमी को मनायी जाती है। इसे दुर्वाष्टमी भी कहा जाता है। कहीं कहीं यह सप्तमी के दिन भी मनायी जाती है जिसे दूबड़ी साते कहा जाता है। पहले दिन रात्रि को चने – मोठ भिगो दें और अगले दिन सुबह के लिए थोड़ा सा खाना भी बनाकर रख लें। दूर्वाष्टमी यानि दूबड़ी आठे (Dubdi Aathe) के दिन सवेरे पीली मिट्टी भिगो देते हैं। इसकी पूजा भी औगद्वादश की तरह पटरा बनाकर की जाती है।
दूबड़ी आठे - खास बातें
| दूबड़ी आठे कब मनायी जाती है? | भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को |
| दूबड़ी आठे में क्या खा सकते हैं? | सबसे पहले बासी रोटी उसके बाद पूरे दिन कुछ भी। |
| दूबड़ी आठे की कहानी कब सुनते सुनाते हैं? | चने मोठ छीलते समय। |
| क्या दूबड़ी आठे कथा के अलावा कोई और कथा भी सुनते हैं? | बिनायक यानि गणेश जी की। |

औगद्वादश के समान ही थाली में सामान सजा लेते हैं। पटरे पर गौ बछड़े की जगह सात बेटे सात बहू और पांच या सात कुल्हियां व् झाड़ू की सींख का दरवाजा बना लेते हैं। चने मोठ छीलते हुए पहले दूबड़ी आठे (Dubdi Aathe) की कथा सुन लेते हैं।
फिर लोटे का दूध मिला जल सूरज को देकर व अलग पानी लेकर चने, मोठ, लड्डू और फल का दूबड़ी आठे (Dubdi Aathe) का बायना मिनसकर सासू जी को देते हैं। पानी गमले में देते हैं। जिस वर्ष घर में लड़की की शादी हो उस वर्ष उद्यापन करते हैं।
पहले दिन लड़की मायके में आ जाती है और वह अपनी मां का विशेष बायना जिसमें साड़ी ब्लाउज, मोठ, चने, फल, मिठाई और रुपये होते हैं साथ में अपना बायना जिसमें एक ढक्कन वाले भगोने में मोठ चने, फल, मिठाई और रुपये होते हैं लेकर ससुराल वापिस जाती है।
दूबड़ी आठे के दिन लड़की को साड़ी ब्लाउज और रुपये देते हैं। और एक बायना प्रति वर्ष की तरह और दूसरा बायना विशेष निकालते हैं। उद्यापन वाले दिन पटरे पर चौदह बेटे व बहू बनाते हैं। इस दिन दूबड़ी आठे की कथा और गणेश जी की कथा कहकर सुनकर फिर बायना मिनसकर सबसे पहले बासी रोटी खाते हैं उसके बाद पूरे दिन कुछ भी खा सकते हैं।
दूबड़ी आठे बायने का सामान
| क्रम संख्या | लड़की की मां के लिए बायना | लड़की की सास के लिए बायना |
|---|---|---|
| 01 | साड़ी - ब्लाउज | एक ढक्कन वाला भगोना |
| 02 | मोठ | मोठ |
| 03 | चने | चने |
| 04 | लड्डू | फल |
| 05 | पैर छूने के रुपये | मिठाई और रुपये |
दूबड़ी आठे की कथा (Durvastami/Dubdi Aathe Ki Katha)
प्राचीन काल में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे थे। वह अपने जिस बेटे का विवाह करता था उसका वही बेटा मृत्यु को प्राप्त हो जाता था। इसी तरह उसके छः पुत्र मृत्यु को प्राप्त हो गये। केवल सबसे छोटा पुत्र शेष रह गया था।
साहूकार इस बात से बहुत ही दुखी रहने लगा। कुछ समय के बाद उसके सबसे छोटे पुत्र के विवाह की चर्चा हुई और उसका रिश्ता पक्का हो गया। विवाह की तिथि भी तय हो गई।
लड़के के विवाह में शामिल होने के लिए जब लड़के की बुआ आ रही थी तो रास्ते में उसे एक बुढ़िया चक्की पीसती हुई मिली। लड़के की बुआ ने उस बुढ़िया को सारी बात कह डाली।
इस पर बुढ़िया बोली, “वह लड़का तो घर से निकलते ही दरवाजे से दबकर मर जायेगा, अगर इससे बचा तो रास्ते में बारात रुकने की जगह पर पेड़ गिरने से मर जायेगा। अगर यहां से भी बच गया तो ससुराल में दरवाजा गिरने से मर जायेगा। अगर यहां से बचा तो विवाह मंडप में सातवीं भांवर पर सर्प के काटने से मर जायेगा।”
यह सुनकर लड़के की बुआ बोली, “हे माता! यदि बचने का कोई उपाय हो तो बताओ।” बुढ़िया बोली, बचने का उपाय तो है पर है कठिन। इस पर बुआ बोली, कृपया आप बताइए, आप बताएंगी तो हम उपाय अवश्य ही करेंगे। आगे ईश्वर की इच्छा। पर प्रयास तो करना ही चाहिए।
बुढ़िया बोली, जब लड़के की बारात विदा हो तो उसे पीछे की दीवार को फोड़कर निकालना। किसी पेड़ के नीचे बारात को न रुकने देना। ससुराल में भी पीछे से दरवाजा फुडवाकर जयमाला करवाना।
भांवचर के समय एक कटोरी में दूध रख लेना। एक तांत का फांसया बनाकर रख लेना। जब साँप आकर दूध पी ले तो उसे फांसे मे फंसाकर बाँध लेना। इसके बाद नागिन आयेगी। वह साँप को छोड़ने के लिए कहेगी तब उससे अपने मृत छः भतीजों को मांगना।
वह पहले मरे हुए तुम्हारे छः भतीजों को जीवित कर देगी। इस बात को किसी से न कहना क्योंकि ऐसा करने से कहने वाले की और सुनने वाले दोनों की मृत्यु निश्चित है। इससे लड़का भी नहीं बचेगा वह भी मर जायेगा।
सारी बातें बताकर बुढ़िया ने अपना नाम दूबड़ी (Dubdi) बताया और चली गई। सारी बातें सुनकर लड़के की बुआ आयी। जब बारात जाने लगी तो लड़के की बुआ रास्ता रोककर खड़ी हो गई और बोली, “मेरे भतीजे को दीवार फोड़कर पीछे से निकालो।” ऐसा ही किया गया।
लड़का सकुशल निकल गया। उसके घर से बाहर आते ही मकान के आगे का पुराना दरवाजा भरभराकर गिर पड़ा। यह देखकर सब कहने लगे कि बुआ ने बड़ा अच्छा किया और लड़के को बचा लिया।
बुआ भी बारात के साथ जाने लगी तो सबने मना किया और कहा कि महिलाये बारात के साथ नहीं जाती हैं। पर बुआ ने किसी की बात नहीं मानी और वह भी बारात के साथ गयी।
मार्ग में जब बारात एक पेड़ के नीचे रुकने लगी तो बुआ ने सबको रोका तथा लड़के को वृक्ष के नीचे न बैठाकर धूप में बिठा लिया।
लड़के के धूप में बैठते ही पेड़ भी चरमरा कर गिर गया। यह देखकर सारे बाराती बुआ की प्रशंसा करते नहीं थक रहे थे। पूरी बारात बुआ की समझदारी से काफी प्रभावित थी। इसलिए किसी ने भी उसकी बात का कोई विरोध नहीं किया।
जब बारात ससुराल पहुंची तो बुआ ने लड़के तथा बारात का गृह प्रवेश पिछले दरवाजे से कराया। ससुराल के घर में पिछले दरवाजे से लड़के तथा बारात के प्रवेश करते ही आगे का दरवाजा अपने आप भरभराकर गिर गया।
इस पर सब आश्चर्य करने लगे और आपस में कहने लगे कि यह सब बातें बुआ को किसने बतायी। जब लड़के की भांवरे पड़ने लगी तो बुआ ने कटोरी में कच्चा दूध मंगाकर तथा तांत का फांसा बनाकर रख लिया।
जब लड़के की सातवीं भांवर पड़ने लगी तभी सर्प आया। बुआ ने उसके आगे दूध कर दिया। जब साँप दूध पीने लगा तो बुआ ने तांत के फांसे मे फंसाकर सांप को बाँध लिया।
इस पर नागिन ने उसके भतीजे जीवित कर दिए और सर्प को अपने साथ लेकर चली गई। इस प्रकार साहूकार के सातों बेटे जीवित हो गये। बारात सकुशल घर वापस आ गयी। साहूकार के मृत बेटों को जीवित करने वाली उस अज्ञात दूबड़ी नाम की वृद्धा का नाम दूबड़ी आठे पड़ गया। हे दूबड़ी माता! जैसे तुमने साहूकार की बहन के सातों भतीजे लौटाये ऐसे ही सबकी रक्षा करना।
विनायक जी की कथा
प्राचीन समय की बात है कि एक बुढ़िया रोज मिट्टी के गणेश जी बनाकर रोज पूजा करती थी। बेचारी बुढ़िया माई के द्वारा बनाए गणेश जी रोज गल जाते थे और वह रोज बनाती थी। उसके घर के सामने एक सेठ का मकान बन रहा था।
वह बुढ़िया वहां पर गयी और बोली, राजगीर भाई मेरे मिट्टी के बनाये गणेशजी रोज गल जाते हैं इसलिए तुम मेरे पत्थर के गणेश जी बना दो। गणेशजी की आप पर बड़ी कृपा होगी।
राजगीर बोला, बुढ़िया माई जितनी देर तुम्हारे पत्थर के गणेशजी बनाने में लगेगी उतनी देर मे तो हम सेठ जी की एक दीवार बना लेंगे। बुढ़िया य़ह सुनकर बहुत ही दुखी मन के साथ अपने घर वापिस आ गयी।
राजगीर जो दीवार बना रहे थे उस दीवार में उन्हें पूरा दिन बीत गया। वह जब भी दीवार बनाने की शुरुआत करते वह पहले ही टेढ़ी हो जाती थी।
शाम को सेठ जी आए और पूछा कि आज कुछ काम नहीं किया? तब राजगीर ने बुढ़िया वाली बात बतायी। इस पर सेठ जी ने बुढ़िया माई से जाकर क्षमा मांगते हुए कहा कि बुढ़िया माई तुम हमारी दीवार सीधी कर दो हम तुम्हें सोने के गणेशजी बनवा देंगे।
गणेश जी ने यह सुनते ही सेठ जी की दीवार सीधी कर दी। सेठ जी ने बुढ़िया माई को पूजा के लिए सोने के गणेशजी बनवाकर दिए। गणेशजी को पाकर बुढ़िया माई बहुत ही खुश हुई।
हे बिंदायक जी! जैसे सेठ जी की दीवार सीधी करी वैसे ही सभी जन पर कृपा करना। कहने वालों का भी और सुनने वालों का भी भला करना।





