भंगीबाड़ा मेहंदीपुर बालाजी मंदिर से जुड़ा एक पुराना उपचार स्थल था, जहाँ प्रेत-बाधा से पीड़ित माने जाने वाले लोगों के लिए विशेष उपचार-पद्धतियाँ अपनाई जाती थीं। भैरव जी के समीप, प्रेतराज सरकार की ओर जाने वाली सीढ़ियों के नीचे स्थित इस स्थान से धुएँ, स्नान और पत्थरों से जुड़े उपचारों की पुरानी परंपराएँ जुड़ी रही हैं।
मेहंदीपुर बालाजी के मंदिर में आने वाले हर श्रद्धालु को शायद भंगीबाड़े के बारे में पता न हो। लेकिन कभी यह मंदिर परिसर से जुड़ा एक ऐसा स्थान था, जहाँ प्रेत-बाधा से पीड़ित माने जाने वाले लोगों के लिए अलग तरह की उपचार-पद्धतियाँ अपनाई जाती थीं।
भंगीबाड़े की कहानी केवल स्थानीय स्मृतियों तक सीमित नहीं है। मेहंदीपुर बालाजी पर किए गए अलग-अलग field studies में भी इस स्थान का उल्लेख मिलता है। इन शोध-विवरणों और वर्षों पुराने प्रत्यक्ष अनुभवों को साथ रखकर देखें तो भंगीबाड़े का एक ऐसा स्वरूप सामने आता है, जो आज बहुत कम दिखाई देता है।

भंगीवाड़ा कहाँ था?
भैरव जी के समीप, प्रेतराज सरकार के मंदिर की ओर जाने वाली सीढ़ियों के नीचे भंगीबाड़े का स्थान था।◉ प्रत्यक्ष अनुभव
मेहंदीपुर बालाजी पर किए गए एक field study में भी भंगीबाड़ा को भैरोंजी के समीप बताया गया है। शोधकर्ता Florence Halder के विवरण के अनुसार वहाँ भंगीबाड़ा की कोई मूर्ति नहीं थी और उसे भैरोंजी के पास स्थित माना जाता था।◉ Halder Research — p. 5
Graham Dwyer के fieldwork में भंगीवारा को लेकर एक और महत्वपूर्ण बात सामने आती है। मंदिर से जुड़े कुछ लोगों के अनुसार भंगीबाड़ा कोई देवता नहीं, बल्कि स्वयं एक स्थान था—बालाजी मंदिर के बाहर स्थित लेकिन उससे जुड़ा हुआ एक लंबा चबूतरे जैसा स्थान, जहाँ अशुद्ध माने जाने वाले प्रेतों को शुद्ध करने और दंड देने की प्रक्रिया होती थी।
◉ Dwyer Research — p. 19
भंगीबाड़े में धुएँ से होता था उपचार
भंगीबाड़े से जुड़ी सबसे उल्लेखनीय उपचार-पद्धतियों में धुएँ का प्रयोग था। Halder के fieldwork में दर्ज है कि वहाँ गोबर और चीनी जलाकर धुआँ किया जाता था और पीड़ित व्यक्ति को उस धुएँ को अधिक से अधिक साँस के साथ भीतर लेने के लिए कहा जाता था।
◉ Halder Research — p. 5
उस समय की मान्यता में यह केवल धुआँ करना नहीं था। इसे उस प्रेत को कष्ट देने और अग्नि के माध्यम से उसे शुद्ध करने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाता था।
◉ Halder Research — p. 5
मेरे अपने प्रत्यक्ष अनुभव में इस प्रक्रिया में गोबर के उपलों पर दो इलायची, लौंग, मिठाई और बताशे जलाकर धुआँ किया जाता था और रोगी को वह धुआँ सूँघाया जाता था।◉ प्रत्यक्ष अनुभव
यहाँ एक अंतर स्पष्ट रखना जरूरी है। प्रकाशित शोध में Halder ने गोबर और चीनी जलाने का उल्लेख किया है। इलायची, लौंग, मिठाई और बताशे का विवरण मेरे प्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित है। इसलिए दोनों विवरणों को एक ही प्रकाशित स्रोत की जानकारी नहीं माना जाना चाहिए।◉ Halder Research — p. 5◉ प्रत्यक्ष अनुभव
रोगी किसी को छू देता तो स्नान क्यों करना पड़ता था?
भंगीबाड़े की परंपरा में शुद्धि और अशुद्धि की धारणा भी महत्वपूर्ण थी। Halder के विवरण के अनुसार वहाँ उपचार के बाद रोगी को स्नान करना पड़ता था, ताकि उससे जुड़ी मानी जाने वाली अशुद्धि दूर हो सके।◉ Halder Research — p. 5
उसी विवरण में यह भी दर्ज है कि यदि पीड़ित व्यक्ति उपचार से पहले किसी दूसरे व्यक्ति को छू लेता था तो उसके भीतर मौजूद माना जाने वाला प्रेत दूसरे व्यक्ति में स्थानांतरित हो सकता था।◉ Halder Research — p. 5
पुराने समय में मैंने इसका प्रत्यक्ष रूप भी देखा है। यदि रोगी किसी दूसरे व्यक्ति को छू देता था तो दोनों को स्नान करना पड़ता था।◉ प्रत्यक्ष अनुभव
भारी पत्थरों से दिया जाता था दंड
धुआँ ही भंगीवाड़े से जुड़ी एकमात्र कठोर प्रक्रिया नहीं थी। Halder ने एक दूसरी प्रक्रिया का भी वर्णन किया है, जिसमें पीड़ित व्यक्ति को जमीन पर लिटाकर, बैठाकर या दूसरी अवस्था में रखकर उसके शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर भारी पत्थर रखे जाते थे।◉ Halder Research — pp. 5–6
विवरण में बताया गया है कि कुछ लोग इस दौरान कराहते या रोते थे, जबकि कुछ लोग बातचीत करते या अखबार पढ़ते दिखाई देते थे। उस उपचार को भी प्रेत को दंड देने की प्रक्रिया के रूप में समझा जाता था।◉ Halder Research — pp. 5–6
भंगीबाड़ा देवता था या एक उपचार स्थल?
यहीं से भंगी बाड़े की कहानी और दिलचस्प हो जाती है। Dwyer के अध्ययन में मंदिर से जुड़े लोगों के बीच भंगीबाड़ा की प्रकृति को लेकर अलग-अलग धारणाएँ दर्ज हुई थीं।
कुछ मंदिर-पुरोहितों के अनुसार भंगीबाड़ा पहले स्वयं एक दुष्ट प्रेत था। उसके बुरे कार्यों के कारण उसे प्रेतराज सरकार और बालाजी से दंड मिला। इसके बाद उसने दुष्टता छोड़ दी और अच्छे कार्य करने लगा।◉ Dwyer Research — p. 19
लेकिन मंदिर के कुछ अन्य कर्मचारियों की धारणा इससे अलग थी। उनके अनुसार भंगीबाड़ा कोई देवता नहीं था, बल्कि एक स्थान था—बालाजी मंदिर से जुड़ा हुआ लंबा चबूतरा—जहाँ अशुद्ध माने जाने वाले प्रेतों को शुद्ध करने और दंड देने की प्रक्रिया होती थी।◉ Dwyer Research — p. 19
इस तरह भंगीबाड़ा को लेकर उस समय भी एक ही धारणा नहीं थी। किसी के लिए वह एक सत्ता थी और किसी के लिए उस सत्ता से जुड़ा उपचार-स्थल।◉ Dwyer Research — p. 19
प्रेतराज सरकार के लिए रपट तैयार करने वाला भंगीबाड़ा
Dwyer के fieldwork में भंगीवारा को प्रेतराज सरकार से जोड़ने वाली एक और मान्यता दर्ज है। कुछ मंदिर-कर्मचारियों के अनुसार भंगीवारा प्रेतराज सरकार का संदेशवाहक या सेवक था। उसका एक काम प्रेतों के बारे में अपने स्वामी के लिए रपट तैयार करना बताया गया है।◉ Dwyer Research — p. 18
उसका दूसरा कार्य अग्नि के माध्यम से प्रेतों को शुद्ध करना माना जाता था। Dwyer ने यह भी दर्ज किया है कि कुछ तीर्थयात्री प्रेत को जलाने के उद्देश्य से केरोसिन की आग का प्रयोग करते थे। इस अग्नि को शुद्धिकरण और दंड—दोनों के रूप में देखा जाता था।◉ Dwyer Research — p. 18
समय के साथ बदल गया भंगीबाड़ा
बाद के वर्षों में भंगीबाड़े की स्थिति बदलने लगी। Anubha Sood के अध्ययन में इसे एक बहुत छोटी जगह के रूप में दर्ज किया गया है, जिसका उपयोग ऐसे लोगों द्वारा किया जाता था जिन्हें विशेष रूप से कठिन प्रेत-बाधा से पीड़ित माना जाता था। वहाँ लोग लंबे समय तक बैठे रहते या दीवारों पर प्रहार करते थे। इस प्रक्रिया को स्थानीय अवधारणा sankat baandhna से जोड़ा गया था।◉ Sood Research — p. 774
इसी अध्ययन के अनुसार 2009–2010 के दौरान मंदिर प्रशासन ने भंगीवाड़े के इस्तेमाल को नियंत्रित करना शुरू किया। वहाँ जाने की अनुमति कुछ निश्चित दिनों और निश्चित समय तक सीमित की जाने लगी।◉ Sood Research — p. 774
2012 तक स्थिति और बदल चुकी थी। Sood ने भंगीबाड़े के टिन की चादर वाले दरवाजे पर ताला लगे होने का उल्लेख किया है। मंदिर से जुड़े लोगों ने ऐसी गतिविधियों में चोट लगने की आशंका को भी इसका एक कारण बताया था।◉ Sood Research — p. 774
एक भूला-बिसरा उपचार स्थल
भंगीबाड़े की कहानी को अलग-अलग स्रोतों में पढ़ने पर उसका बदलता हुआ स्वरूप सामने आता है। Dwyer के अध्ययन में यह कभी प्रेतराज सरकार से जुड़ी सत्ता के रूप में सामने आता है और कभी प्रेतों को शुद्ध तथा दंडित करने वाले स्थान के रूप में।◉ Dwyer Research — pp. 18–19
Halder के fieldwork में इसके धुएँ, स्नान और पत्थरों से जुड़े उपचारों का प्रत्यक्ष विवरण मिलता है, जबकि बाद के Sood अध्ययन में इसके इस्तेमाल पर बढ़ते प्रशासनिक नियंत्रण और अंततः बंद किए जाने का उल्लेख मिलता है।
◉ Halder Research — pp. 5–6
◉ Sood Research — p. 774
और इन शोध-विवरणों के साथ उन लोगों की स्मृतियाँ भी जुड़ी हैं जिन्होंने भंगीवाड़े को उसके पुराने स्वरूप में देखा था। भैरव जी के समीप प्रेतराज सरकार की ओर जाती सीढ़ियों के नीचे स्थित वह स्थान, वहाँ किया जाने वाला धुएँ का उपचार और स्पर्श के बाद स्नान की परंपरा—ये सब उस समय की जीवित स्मृतियों का हिस्सा हैं।◉ प्रत्यक्ष अनुभव
आज भंगीबाड़ा अपने पुराने स्वरूप में दिखाई देता हो या नहीं, उसके बारे में बचे हुए शोध और प्रत्यक्ष अनुभव मेहंदीपुर बालाजी की उस उपचार-परंपरा का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं, जो समय के साथ धीरे-धीरे स्मृतियों में सिमट गई।
भंगीवाड़ा की कहानी के साथ मेहंदीपुर के एक दूसरे पुराने स्थान कुण्डीवाले बाबा का उल्लेख भी जरूरी है। दोनों को एक ही स्थान मानना सही नहीं है; शोध में दोनों के अलग-अलग विवरण मिलते हैं।
भंगीबाड़ा की कहानी को मेहंदीपुर बालाजी के व्यापक इतिहास और यहां विकसित हुई पारंपरिक उपचार-परंपराओं के संदर्भ में समझना जरूरी है। इस पूरे विषय की पृष्ठभूमि के लिए मेहंदीपुर बालाजी का इतिहास भी पढ़ें।
स्रोत और संदर्भ
1. Graham Dwyer — The Divine and the Demonic: Supernatural Affliction and Its Treatment in North India
Routledge, 2003. भंगीबाड़ा से संबंधित विवरण पुस्तक के pp. 18–19 में है।
2. Florence Halder — Appréhension de la possession et des vertus thérapeutiques du temple hindou de Balaji Mehendipur (Rajasthan)
Mehndipur Balaji पर किए गए fieldwork पर आधारित अध्ययन। भंगीबाड़ा से संबंधित मुख्य विवरण pp. 5–6 में है।
3. Anubha Sood — The Global Mental Health movement and its impact on traditional healing in India: A case study of the Balaji temple in Rajasthan
Transcultural Psychiatry, 53(6), 2016, pp. 766–782. भंगीबाड़े से संबंधित विवरण p. 774 में है।
Sood — मूल Research Article देखें
प्रत्यक्ष अनुभव और प्रकाशित शोध में अंतर
इस पोस्ट में जहाँ प्रकाशित research से प्राप्त जानकारी दी गई है, वहाँ संबंधित research chip लगाया गया है। वहीं भंगीबाड़े का सटीक स्थानीय स्थान, गोबर के उपलों पर इलायची, लौंग, मिठाई और बताशे जलाने तथा स्पर्श के बाद दोनों के स्नान से संबंधित विवरण को प्रत्यक्ष अनुभव के रूप में अलग चिह्नित किया गया है।





