पूनरासर बालाजी धाम मंदिर

पूनरासर बालाजी धाम मंदिर – राजस्थान के बीकानेर का एक उत्कृष्ट हनुमान मंदिर

हमारी संस्कृति में ईश – वन्दना की परम्परा सदियों से चली आ रही है। इसी परंपरा से जुड़ा है मंदिर निर्माण का इतिहास । कहीं अपने परम भक्त को भगवान् ने सपने में मंदिर बनाने के निर्देश दिए तो कहीं अपने विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा कर छोटा सा मंदिर बनाने के आदेश भगवान् ने अपने भक्त को दिए। कथाएं चाहे कोई भी रही हो लेकिन हर कथा की परिणति एक विशाल पावन धाम के रूप में हमारे सामने आई है। बीकानेर जिले मे स्थित पूनरासर बालाजी आज एक जागृत पीठ के रूप में अपनी पहचान बना चुका है जहां विराजमान हैं कलियुग के जागृत देव श्री राम भक्त हनुमान ।

श्री पूनरासर बालाजी मंदिर, बीकानेर ( राजस्थान )

जयपुर – बीकानेर राजमार्ग से करीब 15 किमी दूर स्थित इस पावन धाम में करीब 300 साल पहले विक्रम संवत 1775 की ज्येष्ठ सुदी पूर्णिमा पर मंदिर की नींव रखी गई थी। स्थापना के बाद से यहाँ दूर दूर से भक्त आने लगे और मंदिर भव्य और विशाल आकार लेता गया। मंदिर के पुजारी श्री बजरंग बोथार के अनुसार संवत् 1774 में बालाजी महाराज की मूर्ति पंजाब से आते हुए मिली थी और संवत 1775 में इस मूर्ति की स्थापना हुई थी और इनके पूर्वजों ने छोटा सा मंदिर बना के यहां पूजा अर्चना शुरू कर दी।

पूनरासर बालाजी धाम मंदिर

पूनरासर बालाजी मंदिर का इतिहास ( History Of Punrasar Balaji Temple )

कहा जाता है कि विक्रम संवत 1774 में यह क्षेत्र भयंकर अकाल से जूझ रहा था। ऐसे में अनाज की तलाश में गाँव के किसान जयराम दास बोथरा अपने साथियों को लेकर पंजाब की ओर चले गए। अनाज लेकर जब वो लौट रहे थे तब अचानक उनकी ऊंटनी का पांव टूट गया और वो चलने लायक नहीं रही। ऐसे में जयराम दास ने अपने सभी साथियों को गाँव भेज दिया और खुद ऊंटनी की सेवा में रात को वहीं रुक गए। उस वीरान रात में उन्हें कुछ ऐसा महसूस हुआ कि कोई उन्हें आवाज दे रहा है।

मंदिर के पुजारी जी ने बताया कि “हमारे दादा जी जो कि जयराम दास जी थे, वो एक बार यहां भयंकर अकाल पड़ा तो वो कई लोगों के साथ पंजाब साइड में गए थे कि भई, कुछ धान – वान ले आया जाए बच्चों को खिलाने के लिए। तो जब वो वापिस आ रहे थे धान आदि लेकर तो रास्ते में तो एक जगह पर उनकी जो एक ऊंटनी थी उसका पैर टूट गया। आगे वाले पैर आगे और पीछे वाले पैर पीछे की मुद्रा में ऊंटनी नीचे गिर पड़ी। फिर उन्होंने अपने साथियों से कहा, “ये बेचारी जानवर है, इसे ऐसी हालत में तो मैं इसे छोड़कर जाऊंगा नहीं। तुम लोग चलो। मै इसकी सेवा करता हूं तुम लोग आगे से इसकी दवाई वगैरह लेकर आ जाना।” तो साथ वाले आगे चल दिए।

रात्रि को ऊंटनी की सेवा करते करते जब जयराम दास जी को नींद आने लगी तो अचानक से उन्हें एक आवाज सुनायी दी। तो उन्होंने कहा कि भई, कौन है इस जंगल में। जयराम दास जी जिनके ईष्ट देव हनुमान जी थे, उनका सुमिरन करके हाथ जोड़कर कहा – ” कौन है? प्रकट होकर बताओ।” तो फिर वहां एक साधु महात्मा प्रकट हुए। उन्होंने एक तरफ जयराम दास जी को इशारा करते हुए कहा कि ये जो केजरी के वृक्ष के नीचे जो मूर्ति पड़ी हुई है, इस मूर्ति को तुम अपने साथ ले जाओ और इसकी तुम पूजा करो। जयराम दास जी ने महात्मा जी से अपनी ऊँटनी के पैर की लाचारी जतायी और उन्हें अपनी ऊँटनी के टूटे पैर के बारे में बताया। साधु ने उन्हें मूर्ति को अपने हाथ में उठाने को कहा। जयराम जी ने हाथ मे वो मूर्ति ली और जैसे वो ऊंटनी पर बैठे वो ऊंटनी तुरंत ही खड़ी हो गई और जो लोग उनसे पहले चले थे जयराम दास जी उनसे पहले गाँव में पहुंच गए।

साधु ने जयराम दास जी को मूर्ति की पूजा करने को कहा था। जयराम दास जी जाति से वैश्य थे इसलिए उन्हे मंदिर बनाकर पूजा करने मे संकोच था। इसका निवारण भी उसी रात उसी साधु ने सपने में दूर कर दिया और उन्हे अपनी ओर से भंडारा करने के निर्देश दिए। तब बोथरा समाज ने छोटे से मंदिर का निर्माण कर हनुमान जी की सेवा पूजा शुरू की और मंदिर मे पूजा करने आने वाले यात्रियों के लिए प्रसाद बनाने के लिए निःशुल्क बूरा, आटा, घी, बर्तन और ईंधन देने की व्यवस्था की।

आगे बताते हुए पुजारी जी ने कहा – “ये जो मंदिर है इसके खुले मैदान में मूर्ति को रख दिया गया और जयराम दास ने उनके पिता जी को कहा कि मूर्ति की पूजा करने को कहा गया है। पिता जी ने कहा कि हम बनिए है, हम पूजा नहीं कर सकते। यदि हम ऐसा करते हैं तो हमे पुण्य की बजाए पाप लगेगा। उसी दिन सपने में जयराम दास जी को हनुमान जी ने आदेश दिया कि यहाँ जो भी कोई पूजा करने आएगा सबको तुम आटा, बूरा और घी का बना प्रसाद निःशुल्क देते रहना। ”

बालाजी महाराज की विग्रह की स्थापना के साथ ही गर्भ गृह मे बालाजी महाराज से ऊंचे स्थान पर श्री राम चन्द्र भगवान् को एक आले मे विराजमान किया गया। राम भक्त होने के कारण बालाजी महाराज का स्थान उनके चरणों में माना गया है। इसी कारण से पहले यहां श्री राम जी की पूजा की जाती है और इसके बाद श्री बालाजी महाराज की। बालाजी महाराज के दरबार में पूरे साल हजारों श्रद्धालु अपनी आरती प्रस्तुत कर मन वांछित फल प्राप्त करते हैं। भगवान् अपने भक्तों को सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति दिला कर उन्हें भय मुक्त करते हैं।

श्री पूनरासर धाम में क्या है विशेष ?

बीकानेर जिले के श्री डूंगरपुर तहसील के पूनरासर गाँव में स्थित बालाजी के पावन धाम में मंदिर ट्रस्ट द्वारा कई सेवाएं संचालित की जाती है। बीकानेर के बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए धर्मशाला बनायी गयी है जिसमें यात्रियों को निःशुल्क बिस्तर और कमरा तो दिया ही जाता है साथ में ट्रस्ट द्वारा संचालित भोजनालय से उन्हें निःशुल्क भोजन भी उपलब्ध कराया जाता है। मंदिर ट्रस्ट द्वारा श्री जयराम दास के नाम से धर्मशाला का निर्माण किया गया है जिसमे 108 कमरे, अटैच बाथरूम वगैरह है, AC कमरे है जिनका 500 रुपए किराया रखा गया है। यहां जनरल कमरे, भोजन और बिस्तर यात्रियों को फ्री दिए जाते हैं।

पूनरासर बालाजी का भोग और आरती

यहाँ श्री बालाजी महाराज को चूरमे का भोग विशेष रूप से लगाया जाता है। मंदिर ट्रस्ट द्वारा उन यात्रियों को चूरमा बनाने का सामान निःशुल्क वितरित करने की व्यवस्था मंदिर निर्माण के समय से ही चली आ रही है। बालाजी महाराज के मंदिर में प्रतिदिन प्रातः काल और सांय काल ज्योति दर्शन कर श्रद्धालु अपने आराध्य बालाजी महाराज के समक्ष अपनी परेशानियों का पिटारा खोलते हैं।

मंदिर प्रांगण में जो वृक्ष है यह वही वृक्ष है, जहां मूर्ति को सबसे पहले रखा गया था। वृक्ष पर बंधे नारियल और मन्नत के धागे उसी श्रद्धा और आस्था के प्रतीक हैं जो भक्तों ने मन्नत माँगते समय अपने ईष्ट के प्रति प्रकट की थी। इसी वृक्ष के नीचे आज बच्चों के मुंडन संस्कार होते हैं।

पूनरासर बालाजी की प्रतिमा

वैसे तो मंदिर में दो बार आरती का प्रावधान है लेकिन किसी भक्त द्वारा कोई धार्मिक अनुष्ठान किए जाने पर दिन में दो और आरतीयों की व्यवस्था की जाती है। बालाजी महाराज की आरती अन्य मंदिरों में की जाने वाली आरती से भिन्न तरीके से की जाती है। विशाल ज्योति द्वारा सधे हुए हाथों से की जाने वाली ये आरती देखते ही बनती है।

श्री पूनरासर बालाजी धाम में मनाए जाने वाले उत्सव और मेले

बीकानेर के श्री डूंगरपुर तहसील के पूनरासर में स्थित बालाजी धाम के भव्य स्थापना दिवस ज्येष्ठ सुदी पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन मंदिर में आकर्षक रोशनी और सजावट कर बालाजी महाराज की विशेष झांकी सजाई जाती है।

मंदिर प्रांगण में हर साल तीन मेलों का आयोजन किया जाता है। चैत्र सुदी पूर्णिमा और आषाढ़ सुदी पूर्णिमा को विशाल मेलों के साथ ही ऋषि पंचमी के बाद पड़ने वाले पहले शनिवार या मंगलवार के दिन मंदिर प्रांगण में विशाल मेला भरता है। इस दिन पूनरासर आने वाले श्रद्धालुओं मे पंजाब और हरियाणा से भी श्रद्धालु आकर अपने ईष्ट के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं।

पिछले 15 सालों से मंदिर परिसर में अखंड पाठ मंदिर ट्रस्ट द्वारा संचालित किया जा रहा है। अखंड पाठ के लिए ट्रस्ट ने 9 पाठीयों को नियुक्त कर रखा है। क्रमबद्ध तरीके से सभी पाठी अपनी अपनी बारी में पाठ करते हैं।

एक ओर जहां मंदिर ट्रस्ट गरीब और आर्थिक दृष्टि से कमजोर लोगों के लिए निःशुल्क एम्बुलेंस सेवा संचालित कर रहा है वहीं दूसरी तरफ निःशक्त अपंग गौ वंश के लिए निःशुल्क गौशाला भी संचालित कर रहा है।

श्री हनुमान जी कलियुग के जागृत देव माने गए हैं। कहा भी गया है कि हनुमान जी की साधना से त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश के आशीर्वाद से नव ग्रहों के दुष्प्रभाव से भी मुक्ति पायी जा सकती है। श्री पूनरासर धाम में हनुमान जी के वीर रूप की पूजा की जाती है। श्री हनुमान जी का ये रूप चमत्कारी रूप माना गया है। इनके चमत्कारों के किस्से क्षेत्र में जन श्रुति के रूप में विख्यात हैं।

ये भगवान् के प्रति आस्था ही है कि जैसे जैसे लोगों के काम सिद्ध हुए हैं, मन्नत पूरी हुई है भक्तों ने तन मन और धन से मंदिर निर्माण में अपना सहयोग दिया है। यही कारण है कि यह पावन धाम अपनी विशालता, वास्तुशिल्प और आकर्षक निर्माण के कारण बीकानेर के प्रमुख और प्रसिद्ध मंदिरों में अपनी पहचान बनाए हुए है।

कैसे पहुंचे पूनरासर बालाजी धाम ( How To Reach Punrasar Balaji Dham )

पूनरासर बालाजी मंदिर का बाहरी दृश्य

पूनरासर बालाजी धाम बीकानेर जिले में आता है और मंदिर तक पहुंचने के लिए आपको पहले बीकानेर आना पड़ेगा। बीकानेर सड़क मार्ग और रेल मार्ग द्वारा सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। यहां से मंदिर के लिए बस और टैक्सी पर्याप्त संख्या में प्रतिदिन संचालित की जाती हैं। बीकानेर से मात्र 58 किलोमीटर की दूरी पर ही ये मंदिर स्थित है और यहां बड़ी ही आसानी से पहुंचा जा सकता है।

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