नवरात्र में देवी की पूजा और व्रत कैसे करें ?

कैसे करें नवरात्र में माँ दुर्गा की पूजा और क्या है इसका व्रत विधान ?

नवरात्रि में नौ देवियों की साधना और उपासना दो मौसम के मिलने के बीच पड़ने वाले समय में मे की जाती है। यानि जब दो ऋतुएं आपस में मिल रही हो। नवरात्रि वर्ष में दो बार आती हैं, एक आश्विन मास में और दूसरी चैत्र मास में। आश्विन मास के समय मौसम कुछ इस तरह का होता है कि मौसम की गरमाहट हल्की होने लगती है और शीत ऋतु की शीतलता जोर पकड़ने लगती है। जबकि, चैत्र नवरात्रि मे इसका उल्टा होता है।

इस दौरान सूक्ष्म दुनिया में कई बदलाव होते हैं। प्रकृति की इस सूक्ष्मता में प्राणों का प्रवाह हवा की तरह बहता है। इसलिए, नवरात्रि के दौरान की गयी उपासना पूजा शरीर और मन को निर्मल करती है और साधक को दैवीय साक्षात्कार तक के अवसर उत्पन्न करती है।

हमारे वेद और पुराणों के अनुसार हमारे शरीर में नौ इंद्रियां बतायी गयी है। इन दिनों एक उपासक का उद्देश्य हर एक एक दिन अपनी इंद्रियों को संयम से वश में करके सामर्थ्यवान बनना होता है। जो साधक अपनी इन्द्रियों को संयम से वश में नहीं कर पाता है वह अपनी शारीरिक ऊर्जा अपनी इंद्रियों के छिद्रों से बहाकर नष्ट करता है।

नवरात्रि काल में देवी उपासना को अधिक बेहतर बनाने के लिए कुछ साधना सूत्रों का पूरी तरह सख्ती और अनुशासन से पालन करना चाहिए। मुख्यतः इसमें व्रत, ब्रह्मचर्य, धरती पर विश्राम व सोना, अपने कार्य स्वयं संपादित करना, नियमित दिनचर्या और अनुशासन में रहना शामिल है।

उपासना इस बहाव को रोकती है और पूरी श्रद्धा और सामर्थ्य से उपासक को अच्छे परिणाम हासिल होने लगते हैं। इसका कारण यह है कि देवी के इन नौ रूपों की साधना से शरीर में प्राण और अंतःकरण के दैवीय तत्व बढ़ने लगते हैं। इनकी उपासना से चेतना मे जड़ समाए हुए दुर्गुण नष्ट हो जाते हैं। इस दौरान आत्म चिंतन जरूर करना चाहिए।

ध्यान उपासक को मातृ सत्ता के स्नेह ऊर्जा की तरफ पहुंचाता है। ध्यान लगाते समय मन को चिंता मुक्त यानि कि विचार शून्य रखना चाहिए। उपवास, धरती पर सोना, खुद को नियमित और अनुशासित रखना, ब्रह्मचर्य का पालन और मन चित्त को निर्मल रखना साधक उपासक को सफलता की ओर ले जाता है।

उपवास का मतलब सिर्फ कम खाना ही नहीं होता

उपवास यानि व्रत शरीर और मन को एकीकृत करने की कोशिश होती है। और ऐसी कोशिश या प्रयास समय की किसी भी अवधि के लिए किया जा सकता है चाहे ये अवधि एक या एक से अधिक दिनों की हो या कितने ही माह या वर्ष की हो।

व्रत रखते समय कुछ भी ग्रहण किया जा सकता है, जैसे कि दिन में एक टाईम फलाहार भोजन आदि। इसके पीछे की अवधारणा यह है कि इससे हम खुद को अनुशासित रख पाते हैं और अपनी संकल्प की शक्ति का त्वरित विकास करते हैं। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण जी ने राजसी और तामसिक भोजन को वर्जित बताया है इसमे उदाहरण स्वरूप मांस – मदिरा, अंडा, खट्टे तले हुए या बासी भोज्य पदार्थ शामिल हैं।

यह अपेक्षित है कि नवरात्रि व्रत के समय आप इनका सेवन ना करें। व्रत उपवास के दौरान जो आप धार्मिक अनुष्ठान आदि करते हैं वह भी व्यापक परिधि के अंतर्गत आते हैं। इन क्रिया – कलापों और अनुष्ठानों से शरीर से सभी विषैले तत्वों का बहिर्गमन होता है।

इस दौरान शरीर की सुचारू रूप से शुद्धि के लिए तुलसी मिला जल, अदरक मिश्रित जल या अंगूर लिया जा सकता है। मानसिक आहार के रूप में आप जप, तप, ध्यान साधना, सत्संग, दान आदि मे भाग ले सकते हैं।

जब भी ऋतु परिवर्तन होता है तो निश्चित ही परिवर्तन काल में हमारे शरीर की रोगों से लड़ने वाली प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ जाती है। इसलिए नवरात्र काल में हल्का फुल्का पचने वाला भोजन ग्रहण करना चाहिए ताकि शरीर में पर्याप्त ऊर्जा संचित रह सके।

जब भी हम व्रत इत्यादि रखते हैं हमारे शरीर में विषैले तत्वों का बनना बंद हो जाता है। और जो विषैले हानिकारक तत्व उपस्थित होते हैं वो बाहर निकलने शुरू हो जाते हैं। इससे शरीर में आंतरिक रूप से स्फूर्ति आने लगती है।

अधिकांश परिवारों मे बहुत से सदस्य नवरात्र में पूरे नौ दिन व्रत रहते हैं। उचित भोजन की जानकारी ना होने के कारण दो तीन दिन के बाद ही स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है। शरीर में पानी की कमी, पाचन खराब होना, सिर दर्द होने लगता है।

व्रत के दिनों में शरीर में पानी की कमी से निजात पाने के लिए तरल पदार्थ ज्यादा लेने चाहिए। नींबू पानी, नारियल पानी, फलों के जूस, छाछ, पानी आदि खूब लेना चाहिए। इससे पानी की कमी दूर होगी, थकावट, आलस भी दूर रहेंगे।

भोजन हल्का ले जिसमे आप साबू दाने की खीर, खिचड़ी सैंधा नमक के साथ ले सकते हैं जिससे बॉडी में तुरंत ऊर्जा का प्रवाह होता है। ताजे फल की चाट आदि दिन में खा सकते हैं। फलाहार में लोकी, उबले आलू ले। दूध और दूध से बनी चीजे आपको अतिरिक्त शक्ति देंगी। कोटू के आटे की रोटी या पूरी कचोरी दही के साथ ले। दही कोटू की गर्मी नष्ट करता है। चाहे तो इसके स्थान पर सिंघाड़े का आटा उपयोग मे लाया जा सकता है जो कि अपेक्षाकृत सुपाच्य होता है।

अगर आप अपने वजन के लिए ज्यादा संवेदनशील हैं तो ताजे फल और सलाद ले सकते हैं। शुगर के मरीजों को भोजन में ज्यादा अन्तर नहीं रखना चाहिए। थोड़ी थोड़ी देर में कुछ लेते रहें ताकि शरीर में ऊर्जा बनी रहे।

नवरात्रि से पूर्व इन बातों का ध्यान है बेहद जरूरी

नवरात्रि काल शुरू होने वाला है। नौ दिन तक चलने वाले इस पर्व मे माँ दुर्गा के नौ अलग – अलग रूपों की पूजा की जाती है। इस दौरान भक्त उपवास आदि रखते हैं। यदि आप भी नवरात्रि में व्रत उपवास रखना चाहते हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें।

अपने घर के पूजन स्थल की पवित्रता और साफ सफाई का शुरुआती ध्यान अवश्य रखें। सफाई के पश्चात अपने घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर स्वास्तिक का निशान जरूर बना ले क्योंकि इसे अत्यंत ही शुभ माना जाता है।

घर की उत्तर – पूर्व दिशा देवी देवताओं के लिए मानी गयी है। और इस दिशा मे पॉज़िटिव ऊर्जा समायी होती है। अतः इसी दिशा में माता दुर्गा जी की प्रतिमा या छवि स्थापित करनी चाहिए। माता के समक्ष ज्योति को दक्षिण – पूर्व दिशा मे रखना चाहिए।

नवरात्र में आपकी कुलदेवी भी रखती है मायने

हमारे पूर्वजों ने उपयुक्त स्वजन मुख्य रूप से स्त्रियों को मृत्यु के बाद पूजना शुरू किया ताकि वे दिवंगत आत्माएं अपने कुल की रक्षा करती रहे। अदृश्य शक्तियों से रक्षा और परिवार के प्रयोजन पूरे होते रहे साथ ही ये दिवंगत आत्माएं अपनी वंश बेल को सहायता और संरक्षण देती रहें।

इन प्रयोजनों हेतु पूर्वजों की पूजा का सिलसिला चलता गया और आश्विन मास की नवरात्र में सप्तमी और अष्टमी के दिन कुलदेवी की पूजा के लिए अनिवार्य बना दिया गया। परिवार में होने वाले उत्सव और वैदिक संस्कारों में भी कुलदेवी की पूजा होने लगी।

कुल की देवी परिवार में सुरक्षा का कवच बनाती है जो कि हर बाहरी बाधा और नकरात्मक ऊर्जा के प्रवेश को रोकती है।

कुलदेवी की पूजा का विधान नेगेटिव शक्तियों से रक्षा के साथ कार्यों और उत्सवों के निर्विघ्न समापन के लिए भी होता है। पूजा शुरू होने के बाद किसी आकस्मिक अवसर पर, जगह परिवर्तन पर या व्यवसाय के परिवर्तन या परिचालन पर या किसी भी प्रकार के संकट आने पर लोगों ने कुलदेवी को और अधिक धार्मिक स्थान दिया।

विग्यान में अधिक विश्वास रखने वाले या वैज्ञानिक सोच रखने वाले लोगों ने इन पर ध्यान नहीं दिया। कुलदेवी की आराधना पूजा को छोड़ने के बाद कुछ वर्षो तक तो कोई खास फर्क नहीं पड़ा लेकिन धीरे धीरे समय गुजरने के बाद परिवार की उन्नति धीरे पड़ने लगी और कुलदेवी का सुरक्षा कवच हटने लगा।

बहुत सोचने के बाद भी बरक्कत रुकने के कारण समझ नहीं आते। घर के बड़े वरिष्ठ सदस्यों के साथ विचार विमर्श के बाद ही कुलदेवी पूजन का महत्व समझा जा सकता है।

नवरात्र में भक्ति और रंगों की शक्ति

रंगों का महत्त्व सिर्फ जीवन में ही नहीं अपितु धार्मिक रूप से भी है। पुराणों के अनुसार विभिन्न देवी और देवताओं के लिए विशेष रंग बताए गए हैं। नवरात्र काल में प्रत्येक दिन माँ भवानी के पसंदीदा रंग के वस्त्र पहना कर उनकी उपासना करनी चाहिए।

रंगों का जुड़ाव सिर्फ उत्सव त्योहारों से ही नहीं है वरन् ये रंग हमारे ईष्ट देवी देवताओं से भी सीधे तौर पर संबंध रखते हैं। ऐसा माना जाता है कि कोई ना कोई रंग किसी ना किसी भगवान् को अत्यंत प्रिय होता है। ऐसे में यदि आपको देवी माँ की असीम कृपा चाहिए तो आपको पता होना चाहिए कि किस दिन देवी के कौन से रूप को देवी माँ को किस रंग के वस्त्र धारण कराने चाहिए।

नवरात्र के नौ दिन होते हैं और इन नौ अलग अलग दिनों में माँ को अलग अलग रंग के वस्त्रों से पूजन करने से घर में माँ की कृपा तो बरसती ही है साथ ही सौभाग्य और समृद्धि आती है। आपको इन दिनो खुद काले वस्त्र धारण नहीं करने चाहिए। काले वस्त्र पहनकर पूजा सार्थक नहीं हो पाती है।

  1. नवरात्र की शुरुआत प्रतिपदा से होती है, रोग शोक का विनाश करने वाली हिमालय की पुत्री माँ शैल पुत्री का इस दिन पूजन किया जाता है। नौ देवियों में से सबसे प्रथम रूप इन्ही का है। इस दिन माता शैल पुत्री को श्रंगार हरी साड़ी पहना कर करना चाहिए। इनकी पूजा के समय हमे पीले वस्त्र धारण करने चाहिए।
  2. नवरात्र के द्वितीय दिन माँ ब्रह्मचारिणी का पूजन करना चाहिए। इस दिन माता रानी को नारंगी रंग से श्रंगार करना चाहिए। और उपासक को हरे रंग की पोशाक पहननी चाहिए।
  3. नवरात्र का तृतीय दिवस साहस और शक्ति की देवी माँ चंद्रघंटा का है। इस दिन माँ को सफेद रंग की पोशाक धारण करानी चाहिए। इस दिन साधक के द्वारा भूरे रंग के वस्त्र पहनने से माता प्रसन्न होती है।
  4. नवरात्र का चतुर्थ दिवस माता कूष्मांडा देवी का होता है। भक्तों को लाल रंग की पोशाक से माता का श्रंगार करना चाहिए और स्वयं नारंगी कपड़े पहनकर माता का पूजन करना चाहिए।
  5. पांचवा दिन नवरात्र काल में माता स्कंदमाता जी का होता है। स्कंदमाता मोक्ष और सुख प्रदान करने वाली है। इस दिन उपासक को स्वयं सफेद रंग के कपड़े पहनने चाहिए और माता को नीले रंग के वस्त्र पहनाने चाहिये।
  6. नवरात्र में छठे दिन माता कात्यायनी की पूजा अर्चना की जाती है। इस दिन माता को पीले वस्त्र पहनावे और स्वयं लाल रंग के वस्त्र धारण करें।
  7. नवरात्र की सप्तमी यानि सातवां दिन माँ कालरात्रि के लिए निर्धारित है। इनकी तीन आँखें है, गले में माला, बिखरे हुए बाल और रंग श्याम है इसलिए साधक को माता को नीले रंग के कपड़े पहनाने चाहिए।
  8. अष्टमी के दिन माँ महागौरी की पूजा अर्चना की जाती है। इस दिन व्रत का कुछ लोग अनुष्ठान करते हैं। मोरपंख रंग से इस दिन पूजा अर्चना की जानी चाहिए और खुद गुलाबी रंग के वस्त्र पहनने चाहिए।
  9. नवमी का दिन माँ सिद्धिदात्री का होता है। इस दिन गुलाबी वस्त्र पहनना चाहिए।
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